
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकारें राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा विधानसभा से पारित विधेयकों पर लिए गए फैसलों के खिलाफ याचिका दायर नहीं कर सकतीं। केंद्र का तर्क है कि राज्य के पास कोई मौलिक अधिकार नहीं होता, उसकी भूमिका केवल नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने तक सीमित है।
केंद्र सरकार की दलील
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ के सामने यह दलील रखी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति जानना चाहती हैं कि—
-
क्या राज्य सरकारें अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर कर सकती हैं?
-
अनुच्छेद 361 का दायरा कितना है, जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल अपने अधिकारों व कर्तव्यों के निर्वहन में अदालत के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे।
मेहता ने बताया कि इस विषय पर पहले भी चर्चा हो चुकी है, लेकिन भविष्य में विवाद से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट राय जरूरी है। उनका कहना था कि अनुच्छेद 32 केवल तभी लागू होता है, जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो, जबकि राज्य सरकार स्वयं कोई मौलिक अधिकार नहीं रखती।
सीजेआई ने क्या कहा?
इस दौरान सीजेआई गवई ने टिप्पणी की कि राज्यपाल का किसी विधेयक को छह महीने तक लंबित रखना उचित नहीं है। उन्होंने उदाहरण दिया कि अगर अदालत ही किसी मामले को दस साल तक नहीं सुलझाए, तो क्या राष्ट्रपति को कोर्ट को आदेश देने का अधिकार होगा?
पूरी कहानी
-
8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि राज्यपाल समयसीमा के भीतर विधेयकों पर निर्णय नहीं लेते, तो राज्य सीधे शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
-
26 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया था कि यदि राज्यपाल किसी विधेयक पर अनिश्चितकाल तक निर्णय नहीं लेते, तो क्या अदालत के पास कोई उपाय नहीं होगा?
-
यह भी आशंका जताई गई कि ऐसी स्थिति में बजट जैसे महत्वपूर्ण विधेयक भी अटक सकते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है ये मामला ?
मई 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी थी। सवाल यह है कि क्या अदालत राष्ट्रपति और राज्यपाल को यह निर्देश दे सकती है कि वे विधानसभा से आए विधेयकों पर तय समयसीमा में निर्णय लें। फिलहाल इस संवैधानिक मुद्दे पर सुनवाई जारी है।