वाराणसी: मंगलवार सुबह करीब 9 बज रहे थे। टेरा ड्रोन इंडोनेशिया की 7 मंजिला बिल्डिंग में सब सामान्य था। अचानक पहली मंजिल पर रखी लिथियम बैटरी में शॉर्ट सर्किट हुआ। कर्मचारियों ने खुद आग बुझाने की कोशिश की, लेकिन बैटरी दोबारा भड़क उठी। देखते-देखते आग पूरे वेयरहाउस में फैल गई। “जो आग 2 मिनट में बुझ सकती थी, उसे बुझाने में 2 घंटे लग गए – और 20 जिंदगियाँ चली गईं।”
मिनटों में कैसे बन गया मौत का जाल
पहली मंजिल पर वेयरहाउस था, ऊपर ऑफिस। आग लगते ही घना काला धुआँ ऊपर की मंजिलों में फैल गया। ज्यादातर कर्मचारी महिलाएँ थीं, छठी और सातवीं मंजिल पर फंस गईं। एक गर्भवती महिला भी थी। पुलिस चीफ सुसात्यो पुर्नोमो कोंद्रो ने बताया – 5 पुरुष और 15 महिलाएँ। सभी का शव क्रामत जाती पुलिस अस्पताल भेजा गया। कई लोग अभी भी लापता हैं, रेस्क्यू जारी है। “धुआँ आग से ज़्यादा खतरनाक था – ज्यादातर मौतें दम घुटने से हुईं।”
बैटरी ब्लास्ट – आज की सबसे बड़ी छुपी हुई आफत
जांच में पता चला कि पहली मंजिल पर ड्र रखी लिथियम-आयन बैटरियों में शॉर्ट सर्किट हुआ। आज हर ऑफिस, गोदाम, घर में ये बैटरियाँ हैं। एक छोटी सी चिंगारी मिनटों में तबाही ला सकती है। फायर एक्सपर्ट्स कहते हैं – बैटरी को ठंडी, हवादार जगह पर रखना चाहिए, ओवरचार्ज नहीं करना चाहिए। लेकिन ज्यादातर जगहों पर ये नियम सिर्फ़ कागजों में हैं। “हम नई टेक्नोलॉजी तो ला रहे हैं, सुरक्षा के पुराने सबक भूल गए।”
मनोवैज्ञानिक रूप से हम “इट विल नॉट हैपन टू मी” में जी रहे हैं
मनोविज्ञान में इसे “ऑप्टिमिज़्म बायस” कहते हैं – हमें लगता है हमारे साथ कभी कुछ नहीं होगा। इसी सोच ने जकार्ता के उन 20 लोगों की जान ले ली। फायर ड्रिल, इमरजेंसी एग्जिट, स्मोक डिटेक्टर – सब थे, लेकिन इस्तेमाल कोई नहीं जानता था। जब आग लगी तो लोग भागे, एक-दूसरे पर गिरे, दरवाजे बंद थे। “सुरक्षा वो नहीं जो दीवार पर लिखी हो, वो वो है जो दिमाग में बसी हो।”
भारत के लिए भी ये एक बड़ा अलार्म है
हमारे यहाँ भी हर शहर में हज़ारों ऑफिस बिल्डिंग्स हैं। लिथियम बैटरी, सर्वर रूम, जनरेटर – सब एक साथ। फायर सेफ्टी ऑडिट साल में एक बार होता है, वो भी कागजों में। मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु की कई बिल्डिंग्स में तो फायर एग्जिट भी बंद रहते हैं। जकार्ता की ये त्रासदी हमें चेता रही है – कल हमारी बारी हो सकती है। “दूसरों की आग से सबक न लो तो अपनी आग में जलना पड़ेगा।”
उन परिवारों का दर्द जो शब्दों में नहीं समाता
20 शवों में से एक गर्भवती महिला का भी था। उस बच्चे का क्या कसूर था जो अभी दुनिया में आया भी नहीं था? एक पति अपनी पत्नी का इंतज़ार कर रहा होगा, एक माँ अपने बेटे का। आज उनके घर में सिर्फ़ खामोशी होगी। हम दूर बैठकर दुआ कर सकते हैं, लेकिन वो दर्द कोई नहीं समझ सकता। “जिंदगी एक पल में बदल जाती है – और हम अभी भी “कल देखेंगे” बोल रहे हैं।”



