Bihar MLC Election Process: बिहार विधान परिषद की आठ सीटों पर मतदान के बीच आम लोगों के मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा है। विधायक (MLA) तो सीधे जनता चुनती है, लेकिन विधान पार्षद (MLC) कैसे बनते हैं? दोनों पदों के वेतन-भत्ते लगभग समान बताए जाते हैं, फिर भी उनके चुनाव का तरीका, कार्यकाल और असली ताकत में बड़ा अंतर है। बिहार समेत देश के सिर्फ छह राज्यों में ही विधान परिषद मौजूद है। बाकी जगह सिर्फ विधानसभा काम करती है। इस चुनाव के दौरान दोनों सदनों की भूमिका को समझना जरूरी हो गया है, क्योंकि सरकार बनाने और गिराने से लेकर कानून बनाने तक दोनों की ताकत अलग-अलग है।
विधानसभा को निचला सदन और विधान परिषद को ऊपरी सदन कहा जाता है। हर राज्य में विधानसभा जरूर होती है, लेकिन परिषद सिर्फ बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में ही है। बिहार में फिलहाल आठ सीटों पर चुनाव चल रहा है। इनमें से कुछ सीटों के लिए स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि वोट डाल रहे हैं, कुछ के लिए स्नातक और शिक्षक मतदाता, और कुछ के लिए मौजूदा विधायक। आम जनता इन सभी सीटों पर सीधे वोट नहीं देती। यही दोनों पदों के बीच सबसे बुनियादी फर्क है।
MLA और MLC किस सदन के सदस्य होते हैं और उनका चुनाव कैसे होता है?
विधायक राज्य की विधानसभा का सदस्य होता है। उसका चुनाव 18 साल या उससे ज्यादा उम्र के मतदाता सीधे करते हैं। उम्मीदवार की न्यूनतम उम्र 25 साल होनी चाहिए। विधान पार्षद विधान परिषद का सदस्य होता है। परिषद के सदस्यों का चुनाव अलग-अलग तरीके से होता है। संविधान के अनुसार करीब एक-तिहाई सदस्य विधायकों द्वारा चुने जाते हैं, एक-तिहाई स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों द्वारा, और स्नातक तथा शिक्षक वर्ग के मतदाता मिलकर करीब एक-बारहवां हिस्सा चुनते हैं। बाकी सदस्यों को राज्यपाल नामित करते हैं। MLC बनने के लिए उम्मीदवार की उम्र कम से कम 30 साल होनी चाहिए। बिहार की मौजूदा आठ सीटों के चुनाव में भी यही व्यवस्था लागू है। कोई सीट स्थानीय निकायों से भरी जा रही है, तो कोई शिक्षक या स्नातक मतदाताओं के जरिए।
विधानसभा भंग हो सकती है, विधान परिषद क्यों नहीं?
विधानसभा का सामान्य कार्यकाल पांच साल का होता है। इससे पहले भी इसे भंग किया जा सकता है और नए चुनाव कराए जा सकते हैं। विधान परिषद एक स्थायी सदन है। इसे भंग नहीं किया जाता। इसके लगभग एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में रिटायर होते हैं और उनकी जगह नए सदस्य आ जाते हैं। MLC का कार्यकाल छह साल का होता है, न कि पांच साल। अगर कोई सीट बीच में खाली हो जाए और उपचुनाव हो, तो नया सदस्य बाकी बचे समय के लिए ही चुना जाता है। इस स्थायी व्यवस्था की वजह से परिषद में निरंतरता बनी रहती है, जबकि विधानसभा हर पांच साल में पूरी तरह बदल सकती है।
सैलरी लगभग बराबर, लेकिन असली ताकत किसके पास ज्यादा है?
बिहार में विधायक और विधान पार्षद के वेतन-भत्ते राज्य के नियमों के मुताबिक तय होते हैं और दोनों के लिए लगभग समान स्तर के हैं। लेकिन विधायी शक्ति में साफ अंतर है। राज्य की सरकार विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है। विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है। अगर यह पारित हो जाए, तो मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ता है। विधान परिषद में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। MLC सवाल पूछ सकते हैं, बहस में हिस्सा ले सकते हैं और सरकार के कामकाज पर चर्चा कर सकते हैं, लेकिन सरकार को गिराने का अधिकार उनके पास नहीं है।
धन विधेयक और कानून बनाने में किस सदन का फैसला अंतिम होता है?
राज्य का धन विधेयक सिर्फ विधानसभा में ही पेश किया जा सकता है। विधान परिषद इसे न तो खारिज कर सकती है और न ही अपने स्तर पर कोई बदलाव लागू कर सकती है। परिषद सुझाव देकर विधेयक को अधिकतम 14 दिनों के अंदर विधानसभा को वापस भेज सकती है। विधानसभा उन सुझावों को मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र है। अगर 14 दिनों में विधेयक वापस नहीं आता, तो उसे दोनों सदनों से पारित माना जाता है। साधारण विधेयकों पर परिषद चर्चा कर सकती है और सुझाव दे सकती है, लेकिन अंतिम फैसला कई मामलों में विधानसभा के पास रहता है। इसलिए वित्तीय मामलों और सरकार की जवाबदेही में विधानसभा की भूमिका कहीं ज्यादा मजबूत है।
राष्ट्रपति और राज्यसभा चुनाव में MLC वोट क्यों नहीं डालते?
राष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य और राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक वोट डालते हैं। विधान परिषद के सदस्य इस चुनाव में हिस्सा नहीं लेते। राज्यसभा के चुनाव में भी राज्यों के निर्वाचित विधायक ही वोट देते हैं। MLC को राज्यसभा सदस्यों के चुनाव में मतदान का अधिकार नहीं है। यह व्यवस्था इसलिए है क्योंकि विधानसभा सीधे जनता का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि परिषद का चुनाव अप्रत्यक्ष तरीके से होता है। बिहार जैसे राज्य में जहां परिषद मौजूद है, वहां भी राष्ट्रपति और राज्यसभा चुनाव में सिर्फ विधायकों की ही भूमिका रहती है।
बिहार में चल रहे विधान परिषद चुनाव ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि विधायक और विधान पार्षद दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी भूमिका अलग-अलग है। जनता सीधे विधायक चुनती है और उसी पर सरकार निर्भर करती है। MLC का चुनाव अलग मतदाताओं के जरिए होता है और वे ऊपरी सदन में संतुलन का काम करते हैं। वेतन समान होने के बावजूद असली शक्ति, जवाबदेही और चुनाव की प्रक्रिया में बड़ा अंतर है। आने वाले दिनों में जब नए सदस्य परिषद में पहुंचेंगे, तब यह समझना और भी जरूरी होगा कि दोनों सदन किस तरह एक-दूसरे के पूरक हैं, न कि प्रतिस्पर्धी।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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