Yakshagana: भारत की सांस्कृतिक और कलात्मक धरोहर में पारंपरिक लोकनाट्यों और नृत्य-नाटिकाओं का स्थान सदैव अद्वितीय रहा है। देश के विभिन्न अंचलों में जन्मी कलाएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे समाज के इतिहास, धार्मिक मान्यताओं, दार्शनिक चिंतन और जनमानस की आस्था को सजीव रूप में अभिव्यक्त करती हैं। इसी समृद्ध परंपरा का सबसे ओजस्वी, भव्य और विस्मयकारी स्वरूप कर्नाटक के तटीय और मलनाड क्षेत्रों में प्रचलित लोकनाट्य ‘यक्षगान’ में देखने को मिलता है। यक्षगान केवल एक साधारण मंच प्रदर्शन या नृत्य शैली नहीं है, बल्कि यह रंगमंच, शास्त्रीय एवं लोक संगीत, ओजपूर्ण नृत्य, तात्कालिक संवाद और अलौकिक वेशभूषा का ऐसा अद्भुत समागम है जो दर्शकों को एक काल्पनिक और दिव्य संसार की यात्रा पर ले जाता है। मध्यकाल में विजयनगर साम्राज्य के स्वर्ण युग से जुड़े इसके ऐतिहासिक सूत्र आज भी दक्षिण भारत के सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बने हुए हैं।
क्या है यक्षगान और विजयनगर साम्राज्य से इसका ऐतिहासिक संबंध?
‘यक्षगान’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों ‘यक्ष’ (प्रकृति की अर्ध-दैवीय शक्तियां अथवा आकाशीय गायक) और ‘गान’ (संगीत या गीत) से मिलकर हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ प्रकृति के देवदूतों का दिव्य संगीत माना जाता है। इस लोकनाट्य की जड़ें कई शताब्दियों पूर्व की मानी जाती हैं, जिनका पोषण दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन और वैष्णव परंपराओं के माध्यम से हुआ। यद्यपि इसका प्रारंभिक रूप जनपदीय गीतों और कथावाचन के रूप में अस्तित्व में आया, किंतु इसे शास्त्रीय अनुशासन और संगठित नाट्य रूप विजयनगर साम्राज्य के दौर में प्राप्त हुआ।
चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के मध्य विजयनगर साम्राज्य के शासकों ने कला, साहित्य और रंगमंच को अभूतपूर्व राजकीय संरक्षण दिया। उस कालखंड में मंदिरों और राजदरबारों में रामायण और महाभारत के आख्यानों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए इस नाट्य विधा को परिष्कृत किया गया। बेल्लारी और तटीय कर्नाटक के शिलालेखों में इस कला के प्राचीन संदर्भ मिलते हैं। समय बीतने के साथ यह कला दक्षिण कन्नड़, उडुपी, उत्तर कन्नड़ और कासरगोड के क्षेत्रों में दो मुख्य शैलियों—’बडुगुतिट्टू’ (उत्तरी शैली, जिसमें उच्च ऊर्जा और उछालभरे नृत्य होते हैं) और ‘तेंकुतिट्टू’ (दक्षिणी शैली, जिसमें वेशभूषा और तालबद्ध घुमाव की विशिष्टता होती है)—के रूप में पल्लवित और पुष्पित हुई।
पौराणिक आख्यानों का सजीव मंचन: रामायण, महाभारत और भागवत की कथाएं
यक्षगान का संपूर्ण वैचारिक और आख्यानात्मक ताना-बाना भारतीय सनातन महाकाव्यों पर आधारित ‘प्रसंगों’ के इर्द-गिर्द बुना जाता है। इसमें रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत और विभिन्न पुराणों के धर्मयुद्ध, वीरता, त्याग और भक्ति से जुड़े प्रसंगों को मंच पर जीवंत किया जाता है। चाहे वह कर्ण-अर्जुन का निर्णायक संग्राम हो, सुदर्शन चक्र का आह्वान हो, या फिर महिषासुर वध की गाथा, यक्षगान के कलाकार अपने अभिनय से ऐसे दृश्यों की रचना करते हैं कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
इस पूरी प्रस्तुति का मुख्य सूत्रधार ‘भागवत’ कहलाता है, जो मंच पर एक पार्श्वगायक, निर्देशक और कथावाचक की केंद्रीय भूमिका निभाता है। भागवत छंदबद्ध पद्य गाता है और मंच के कलाकार उसी लय पर जटिल नृत्य मुद्राएं रचते हुए उस पद्य को गद्य संवादों में विस्तार देते हैं। यक्षगान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके संवाद पहले से रटे हुए नहीं होते; कलाकार अपनी विद्वत्ता, तात्कालिक बुद्धि और प्रसंग के मर्म के आधार पर मंच पर ही धाराप्रवाह और प्रभावशाली संवादों की रचना करते हैं। संवादों में मुख्य रूप से कन्नड़ और तुलु भाषा का ओजपूर्ण प्रयोग इसे स्थानीय जनमानस की आत्मा से जोड़ता है।
अद्भुत वेशभूषा, विशाल मुकुट और रंगों का जादुई संसार
यक्षगान को पहली बार देखने वाले दर्शक के लिए इसकी वेशभूषा किसी जादुई और सम्मोहक अनुभव से कम नहीं होती। पात्रों की साज-सज्जा और मेकअप की प्रक्रिया अत्यंत जटिल, श्रमसाध्य और घंटों चलने वाली कला है। मंच पर उतरने वाले प्रत्येक पात्र के स्वभाव—सात्विक (देवता व ऋषि), राजसिक (पराक्रमी राजा व योद्धा), और तामसिक (राक्षस व दुष्ट शक्तियां)—के अनुसार चेहरे के रंगों और रेखाओं का चयन किया जाता है।
पात्रों के सिर पर सजे विशाल और नक्काशीदार ‘मुकुट’, जिन्हें ‘किरीट’ या ‘पगड़ी’ कहा जाता है, इतने विशाल और अलंकृत होते हैं कि वे पात्र के कद को कई गुना बड़ा और प्रभावशाली बना देते हैं। इसके साथ ही भारी लकड़ी और धातु के आभूषण, पंखों की तरह फैले हुए कंधे के गहने (भुजकीर्ति), और लाल, पीले व काले रंगों से रंगे पारंपरिक वस्त्र कलाकारों को एक अलौकिक योद्धा का रूप प्रदान करते हैं। इस भारी-भरकम वेशभूषा और दर्जनों किलो वजन के आभूषणों को धारण करके घंटों तक तीव्र शारीरिक नृत्य करना कलाकारों की असाधारण शारीरिक क्षमता, योगिक संतुलन और वर्षों के कठोर अभ्यास को प्रमाणित करता है।
पारंपरिक वाद्ययंत्र और धड़कती हुई ताल का रोमांच
यक्षगान का संगीत शास्त्रीय कर्नाटक संगीत और विशुद्ध लोक धुनों का एक अद्भुत मिश्रण है। प्रस्तुति में ऊर्जा और रोमांच का संचार करने वाले पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप दर्शकों की धड़कनों को थामने का कार्य करती है। इसमें सबसे प्रमुख वाद्य ‘चेंडे’ (एक ऊंचे स्वर वाला ड्रम) होता है, जिसकी तेज, गूंजती और युद्धघोष जैसी आवाज सीधे दर्शकों के रोंगटे खड़े कर देती है।
चेंडे के साथ ‘मद्दले’ (एक प्रकार का मृदंग जैसा तालवाद्य) की गंभीर और भारी थाप संगीत को संतुलित विस्तार देती है। इसके अलावा भागवत द्वारा बजाई जाने वाली छोटी धातु की झांझ (ताला) संपूर्ण लय को बांधकर रखती है। जब युद्ध के दृश्य या तीव्र भावनात्मक प्रसंग मंचित होते हैं, तो चेंडे और मद्दले की जुगलबंदी मंच के वातावरण को इस कदर आविष्ट कर देती है कि दर्शक स्वयं को कुरुक्षेत्र या लंका के रणक्षेत्र में उपस्थित महसूस करने लगते हैं।
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