डेस्क – अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अमेरिका को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड की सख्त जरूरत है। ट्रंप ने लुइसियाना के गवर्नर जेफ लैंड्री को ग्रीनलैंड का विशेष दूत नियुक्त किया है। इस नियुक्ति और ट्रंप के बयानों से डेनमार्क और ग्रीनलैंड में हलचल मच गई है। साथ ही, रूस और चीन भी सतर्क हो गए हैं, क्योंकि ट्रंप ने सीधे तौर पर इन दोनों देशों के जहाजों का जिक्र किया है। ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड के तटों के पास रूसी और चीनी जहाज घूम रहे हैं, जो अमेरिका के लिए खतरा हैं। यह मुद्दा अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गरमा गया है।
ग्रीनलैंड क्यों इतना महत्वपूर्ण है?
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। इसकी आबादी सिर्फ करीब 57 हजार है, लेकिन इसका स्थान बहुत रणनीतिक है। यह उत्तरी अटलांटिक महासागर में स्थित है और आर्कटिक क्षेत्र का हिस्सा है। जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, जिससे नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं। इन रास्तों से व्यापार और सैन्य गतिविधियां बढ़ सकती हैं। ग्रीनलैंड में अमेरिका का एक बड़ा सैन्य अड्डा भी है, जिसका नाम पिटुफिक स्पेस बेस है। यह मिसाइलों की निगरानी और अंतरिक्ष सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। ट्रंप का मानना है कि डेनमार्क ग्रीनलैंड की रक्षा ठीक से नहीं कर पा रहा है। उन्होंने कहा, “डेनमार्क वहां पैसे खर्च नहीं करता और सैन्य सुरक्षा नहीं देता।” लेकिन ट्रंप ने साफ कहा कि उन्हें ग्रीनलैंड खनिजों या तेल के लिए नहीं चाहिए, बल्कि सिर्फ सुरक्षा के लिए।
ट्रंप के नए बयान और विशेष दूत की नियुक्ति
22 दिसंबर 2025 को ट्रंप ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, “हमें ग्रीनलैंड राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चाहिए। तटों के पास रूसी और चीनी जहाज हर जगह हैं। हमें इसे हासिल करना ही होगा।” उन्होंने जेफ लैंड्री को विशेष दूत बनाया, जो “चार्ज का नेतृत्व” करेंगे। लैंड्री ने खुद कहा कि वे ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने के लिए काम करेंगे। ट्रंप ने पहले भी 2019 में ग्रीनलैंड खरीदने की बात कही थी, लेकिन अब वे और आक्रामक हैं। उन्होंने डेनमार्क पर दबाव बनाने के लिए कुछ ऑफशोर विंड प्रोजेक्ट्स भी रोक दिए हैं। ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड की छोटी आबादी है और अमेरिका उनका अच्छे से ख्याल रखेगा।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड की प्रतिक्रिया
डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेता बहुत नाराज हैं। डेनिश प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नील्सेन ने संयुक्त बयान में कहा, “ग्रीनलैंड ग्रीनलैंडवासियों का है। अमेरिका इसे नहीं ले सकता। सीमाएं और संप्रभुता अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित हैं। सुरक्षा के नाम पर भी किसी देश को कब्जा नहीं किया जा सकता।” डेनमार्क ने अमेरिकी राजदूत को तलब किया और विदेश मंत्री ने लैंड्री की नियुक्ति को “पूरी तरह अस्वीकार्य” बताया। ग्रीनलैंड के नेता ने कहा कि वे अपना भविष्य खुद तय करेंगे। दोनों देशों ने अमेरिका से अपनी क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की मांग की है।
रूस और चीन क्यों टेंशन में हैं?
ट्रंप ने सीधे रूस और चीन पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड के आसपास रूसी और चीनी जहाज “हर जगह” हैं। आर्कटिक क्षेत्र में रूस की मजबूत मौजूदगी है। रूस ने वहां सैन्य अड्डे बनाए हैं और नए हथियार तैनात किए हैं। चीन खुद को “नियर आर्कटिक देश” कहता है और वहां निवेश और शोध बढ़ा रहा है। ट्रंप के इरादे से रूस और चीन को लग रहा है कि अमेरिका आर्कटिक में अपना दबदबा बढ़ाना चाहता है। इससे नए समुद्री रास्तों और संसाधनों पर नियंत्रण की होड़ बढ़ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप का यह कदम रूस और चीन की आर्कटिक महत्वाकांक्षाओं को रोकने का प्रयास है। इससे दोनों देशों की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर पूरा नियंत्रण पा लेता है, तो आर्कटिक में पश्चिमी देशों की ताकत मजबूत हो जाएगी।
अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और चुनौतियां
यह मुद्दा नाटो गठबंधन को भी प्रभावित कर रहा है, क्योंकि डेनमार्क नाटो का सदस्य है। यूरोपीय देश ट्रंप के बयानों से चिंतित हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप डेनमार्क पर दबाव डालकर ग्रीनलैंड में ज्यादा सैन्य और आर्थिक सहयोग चाहते हैं। लेकिन अगर बात बढ़ी तो संबंध खराब हो सकते हैं। ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज हैं, जो बैटरी और तकनीक के लिए जरूरी हैं। लेकिन ट्रंप ने कहा कि उनका फोकस सिर्फ सुरक्षा पर है। फिर भी, यह विवाद आर्कटिक की भू-राजनीति को बदल सकता है।
निष्कर्ष :
ट्रंप के ग्रीनलैंड पर इरादे स्पष्ट हैं – वे इसे अमेरिकी सुरक्षा का हिस्सा बनाना चाहते हैं। इससे डेनमार्क और ग्रीनलैंड नाराज हैं, तो रूस और चीन सतर्क हो गए हैं। यह मुद्दा सिर्फ एक द्वीप का नहीं, बल्कि आर्कटिक के भविष्य और वैश्विक शक्ति संतुलन का है। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जबरन कब्जा मुश्किल है, इसलिए ट्रंप शायद बातचीत और दबाव से आगे बढ़ेंगे। लेकिन यह विवाद लंबा चल सकता है और दुनिया की नजरें आर्कटिक पर टिकी रहेंगी। अंत में, ग्रीनलैंडवासियों की इच्छा सबसे महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि वे अपना फैसला खुद लेंगे।



