वाराणसी: Every opinion can be contradicted-ये एक छोटा सा वाक्य जिद्दू कृष्णमूर्ति ने 1960 के दशक में बोला था। सुनने वाले सन्न रह गए। क्योंकि उस एक लाइन ने सारी राजनीति, धर्म, विचारधारा, सोशल मीडिया की बहसें – सबको नंगा कर दिया। आज जब हम एक-दूसरे को गाली देकर “सही” साबित करने में लगे हैं, ये वाक्य सीधे सीने में घुस जाता है।
वो पल जब कृष्णमूर्ति ने सारी बहसें खत्म कर दीं
1966, स्विट्जरलैंड। एक युवक जोश में बोला – “सर, समाजवाद ही दुनिया बचा सकता है!” कृष्णमूर्ति शांत बैठे रहे। फिर मुस्कुराए और बोले – “Every opinion can be contradicted. हर राय का खंडन हो सकता है।” हॉल में सन्नाटा छा गया। कोई जवाब न दे सका। आज भी कोई नहीं दे पाता।
तुम जो “मानते” हो, वो सचमे तुम्हारा है भी नहीं
हम रोज़ कहते हैं – “मेरा मानना है…”, “मुझे लगता है…” मनोविज्ञान कहता है – 95% रायें हमने खुद नहीं बनाईं, माँ-बाप, टीवी, दोस्तों, किताबों ने डाली हैं। कृष्णमूर्ति पूछते थे – “तुम्हारी राय तुम्हें कौन सी राय दी गई है, और तुम उसे अपना मानकर क्यों जी रहे हो?”
सोशल मीडिया ने इस वाक्य को और खतरनाक साबित कर दिया
आज तुम ट्वीट करते हो – “ये बात 100% सच है” 10 मिनट बाद कोई दूसरा स्क्रीनशॉट डालकर तुम्हारी धज्जियाँ उड़ा देता है। दोनों तरफ़ लाइक्स, गालियाँ, ब्लॉक। कृष्णमूर्ति हँस रहे होंगे – “रायें टकरा रही हैं। दोनों गलत हो सकती हैं। तो तुम किसके साथ लड़ रहे हो?”
रिश्ते क्यों टूटते हैं? क्योंकि हम इंसान से नहीं, राय से प्यार करते हैं
तुम्हारी गर्लफ्रेंड कहती है – “मुझे लेट नाइट पार्टी पसंद है” तुम कहते हो – “नहीं, ये गलत है” तुम उससे प्यार नहीं कर रहे, अपनी राय से कर रहे हो। जब राय टकराती है, रिश्ता टूट जाता है। “जब तुम बिना राय के किसी को देखते हो, तभी तुम उसे सचमे देखते हो।”
राजनीति और धर्म भी इसी जाल में फँसे हैं
हिंदुत्ववादी चिल्लाता है – “मेरा देश सबसे महान” लिबरल जवाब देता है – “ये सोच पिछड़ी है” दोनों की राय टकरा रही है। दोनों का खंडन हो सकता है। तो लड़ाई किस बात की? “जब तुम किसी राय से चिपके हो, तुम सच से दूर हो।”
आखिर सच कहाँ है फिर?
लोग पूछते थे – “तो हम कुछ मानें ही नहीं?” कृष्णमूर्ति मुस्कुराते और कहते – “जब तुम कुछ नहीं मानते, जब तुम्हारा दिमाग पूरी तरह खाली और खामोश होता है – तभी सच आता है। वो सच जिसका कोई खंडन नहीं हो सकता।”
आज रात सिर्फ़ एक छोटा सा प्रयोग करो:
कोई एक राय चुन लो जिसके लिए तुम रोज़ लड़ते हो। 10 मिनट तक उसका उल्टा सोचकर देखो। और फिर देखो – तुम्हारा दिमाग कितना हल्का हो जाता है। शायद पहली बार तुम्हें पता चलेगा कि तुम वो राय नहीं हो। तुम उससे कहीं ज़्यादा हो।



