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Jharkhand News: झारखंड की 1,680 करोड़ की 10 जलापूर्ति योजनाओं पर रोक, अधूरे काम पर विभाग ने कसा शिकंजा

Jharkhand News: झारखंड पेयजल एवं स्वच्छता विभाग ने राज्य के पांच डिवीजन में चल रही करीब 1,680 करोड़ रुपये की 10 बहुग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं पर रोक लगा दी है। विभाग को ये योजनाएं अधूरी मिली थीं। एडवोकेट जनरल की सिफारिशों के आधार पर यह फैसला लिया गया। सभी योजनाओं का जिम्मा चेन्नई की कंपनी मेसर्स श्रीराम ईपीसी के पास था। ये योजनाएं चाईबासा, चतरा, हजारीबाग, धनबाद और मधुपुर में चल रही थीं। कई योजनाओं की समय-सीमा वर्षों पहले खत्म हो चुकी है, फिर भी काम पूरा नहीं हुआ। अब विभाग शेष कार्य के लिए नए सिरे से निविदा निकालेगा। साथ ही देरी करने वाली अन्य कंपनियों को दिसंबर 2026 तक काम पूरा करने का अल्टीमेटम दिया गया है।

Jharkhand News: एडवोकेट जनरल की सलाह पर विभाग का फैसला

पेयजल एवं स्वच्छता विभाग ने जब इन योजनाओं की प्रगति की समीक्षा की, तो कई जगह काम तय समय से बहुत पीछे मिला। इसके बाद एडवोकेट जनरल की सिफारिशों पर 10 योजनाओं को रोकने का निर्णय हुआ। विभाग का कहना है कि अब शेष कार्य के लिए नई निविदा प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

इन 10 योजनाओं की फंडिंग अलग-अलग स्रोतों से होनी थी। इनमें से पांच का निर्माण जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट यानी डीएमएफटी फंड से होना था। चार योजनाएं राज्य मद से बननी थीं, जबकि एक योजना जल जीवन मिशन के तहत प्रस्तावित थी।

दिसंबर 2026 तक काम पूरा नहीं तो ब्लैकलिस्ट

श्रीराम ईपीसी पर कार्रवाई के साथ विभाग ने एक और कदम उठाया है। अब उन सभी कंपनियों की सूची तैयार की जा रही है, जो अपने कार्यों में लगातार देरी कर रही हैं। ऐसी कंपनियों को सख्त निर्देश मिला है कि वे दिसंबर 2026 तक हर हाल में काम पूरा करें।

तय समय में काम खत्म नहीं हुआ तो संबंधित कंपनियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा। विभाग के इस रुख से साफ है कि अब ढिलाई की गुंजाइश कम है। यह चेतावनी उन सभी ठेकेदारों के लिए संदेश मानी जा रही है, जिनकी परियोजनाएं लंबे समय से लटकी हैं।

समीक्षा बैठक में मंत्री योगेंद्र प्रसाद की दो टूक

पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री योगेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में बुधवार को नेपाल हाउस में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक हुई। बैठक में विभागीय सचिव अबु इमरान, जल जीवन मिशन के निदेशक शशि रंजन, अभियंता प्रमुख और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

मंत्री ने कहा कि आम लोगों को पेयजल और स्वच्छता से जुड़ी सेवाएं समय पर उपलब्ध कराना विभाग की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने सभी अधिकारियों से अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा और जवाबदेही से निभाने को कहा। साथ ही स्पष्ट किया कि लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

चाईबासा में तीन साल बाद भी अधूरी योजनाएं

विभागीय रिपोर्ट के मुताबिक चाईबासा की योजनाओं का हाल भी अच्छा नहीं है। डीएमएफटी मद से 2022 में पूरी होने वाली चाईबासा आइता एवं पुराना चाईबासा जलापूर्ति योजना की भौतिक प्रगति तीन साल में 30 से 95 प्रतिशत के बीच दर्ज की गई है। यानी अलग-अलग हिस्सों में काम की रफ्तार काफी असमान रही।

इस योजना की स्वीकृत राशि 94.38 करोड़ रुपये है। इसमें से 88.09 करोड़ रुपये आवंटित किए गए और 36.40 करोड़ रुपये खर्च हुए। आवंटन के मुकाबले खर्च की यह तस्वीर परियोजना की धीमी गति को दिखाती है।

इसी जिले की तांतनगर फुल ब्लॉक कवरेज योजना में करीब 67 प्रतिशत काम हुआ है, जबकि इसकी समय-सीमा अगस्त 2022 थी। एग्रीमेंट राशि 92.75 करोड़ रुपये थी। इसमें 87.69 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ और 59.77 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

धनबाद में गोविंदपुर-निरसा योजना की स्थिति सबसे खराब

धनबाद प्रमंडल एक और दो के अंतर्गत पांच योजनाएं हैं, जबकि मधुपुर के अंतर्गत एक योजना चल रही है। इन सभी की स्थिति काफी लेटलतीफी वाली बताई गई है। इनमें सबसे खराब हालत गोविंदपुर-निरसा ब्लॉक मल्टी विलेज जलापूर्ति योजना की है।

डीएमएफटी से पूरी होने वाली इस योजना की स्वीकृत राशि 616.93 करोड़ रुपये है। इसमें से 116.63 करोड़ रुपये आवंटित हुए और 116.28 करोड़ रुपये खर्च किए गए। कार्य प्रगति 75 प्रतिशत दर्ज हुई, लेकिन मार्च 2026 में तय निर्माण समय पर पूरा नहीं हो पाया।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि योजना के तहत 77,875 घरों तक पानी पहुंचाने का लक्ष्य था। विभागीय रिपोर्ट के अनुसार अब तक एक भी घर में पानी नहीं पहुंचा है। यानी करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद लाभार्थियों को राहत नहीं मिली।

आगे क्या, नई निविदा पर टिकी नजर

अब सबकी नजर नई निविदा प्रक्रिया पर है। विभाग को इन योजनाओं का शेष कार्य किसी नई एजेंसी से पूरा कराना होगा। नई निविदा कब तक जारी होगी और काम कब शुरू होगा, इस बारे में अभी विभाग की ओर से कोई समय-सीमा सामने नहीं आई है।

फिलहाल इतना तय है कि विभाग ने कार्रवाई का रास्ता चुन लिया है। दिसंबर 2026 की समय-सीमा देरी करने वाली दूसरी कंपनियों के लिए भी अंतिम मौके की तरह है। अगर वे तय अवधि में काम पूरा नहीं करतीं, तो ब्लैकलिस्ट होने का खतरा उनके सामने होगा।

Jharkhand News: ग्रामीण आबादी को पानी का इंतजार

बहुग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं का मकसद कई गांवों को एक साथ पाइपलाइन से पेयजल उपलब्ध कराना है। इन योजनाओं में देरी का सीधा असर उन परिवारों पर पड़ता है, जो नल से जल मिलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। गोविंदपुर-निरसा जैसी योजना में तो अब तक एक भी घर तक पानी नहीं पहुंचा है।

विभाग और मंत्री के सख्त रुख के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि रुकी हुई योजनाएं नई व्यवस्था में गति पकड़ेंगी। हालांकि यह इस पर निर्भर करेगा कि निविदा प्रक्रिया कितनी जल्दी पूरी होती है और नई एजेंसी जमीन पर कितनी तेजी से काम शुरू करती है।

झारखंड पेयजल एवं स्वच्छता विभाग का यह फैसला राज्य की जलापूर्ति व्यवस्था में जवाबदेही तय करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। श्रीराम ईपीसी के जिम्मे चल रही 1,680 करोड़ रुपये की 10 योजनाओं पर रोक लगाकर विभाग ने साफ संकेत दिया है कि समय-सीमा की अनदेखी अब भारी पड़ेगी। मंत्री योगेंद्र प्रसाद की चेतावनी और दिसंबर 2026 की डेडलाइन ने ठेकेदारों पर दबाव बढ़ा दिया है। अब असली परीक्षा नई निविदा और उसके बाद जमीन पर होने वाले काम की है। जब तक पाइपलाइन से पानी घरों तक नहीं पहुंचता, तब तक इन योजनाओं की सफलता पर सवाल बने रहेंगे।

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Author: Sanjna Gupta

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