CID ने दूसरी पूरक चार्जशीट क्यों दाखिल की और इसमें क्या सबूत शामिल हैं?
CID की जांच टीम ने यह चार्जशीट तब दाखिल की जब डिजिटल और वित्तीय जांच से आरोपियों के बीच स्पष्ट साजिश के संकेत मजबूत हुए। चार्जशीट में मुख्य रूप से परीक्षा व्यवस्था में हस्तक्षेप, अभ्यर्थियों से अवैध वसूली और सिंडिकेट को संसाधन उपलब्ध कराने के आरोप शामिल हैं। जांच एजेंसी के अनुसार बुद्धेश्वर भगत के लैपटॉप से रिजल्ट जारी होने से पहले 24 अभ्यर्थियों की एक सूची बरामद हुई थी। इनमें से 11 अभ्यर्थी 14वीं प्रारंभिक परीक्षा में सफल घोषित हुए थे। CID ने कोर्ट को बताया कि इन 11 अभ्यर्थियों से एडवांस में कुल एक करोड़ रुपये वसूले गए थे। अभ्यर्थियों के मूल शैक्षणिक प्रमाणपत्र और नकद राशि सिंडिकेट तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी इन्हीं पर थी। लेन-देन नकद, RTGS, UPI और अन्य माध्यमों से हुए थे। कुछ मामलों में अभ्यर्थियों से मूल दस्तावेज और हस्ताक्षरित खाली चेक भी लिए गए थे, जिन्हें गारंटी के रूप में इस्तेमाल किया गया। ये सबूत चार्जशीट में संलग्न हैं और अदालत में पेश किए गए हैं। शेष आरोपियों के खिलाफ दिसंबर में और चार्जशीट आने की संभावना जताई जा रही है।
लैपटॉप से मिली सूची और वसूली के आंकड़े क्या बताते हैं?
बुद्धेश्वर भगत को परीक्षा व्यवस्था के तकनीकी तंत्र का जानकार बताया गया है। जांच में पता चला कि वह मुख्य सरगना से सीधे संपर्क में था और अभ्यर्थियों से संपर्क कर रकम तय करने में सक्रिय भूमिका निभाता था। लैपटॉप फॉरेंसिक जांच से मिली 24 अभ्यर्थियों की सूची को आधिकारिक परिणाम से मिलाने पर 11 नाम मेल खाए। CID का कहना है कि अभ्यर्थियों से पैसे लेने और बकाया राशि की वसूली का काम भी उसी के जिम्मे था। कुछ रिपोर्टों में हजारीबाग के दो भाइयों से 20-20 लाख रुपये में सौदा तय होने का जिक्र भी आया है। ये आंकड़े सिंडिकेट की व्यवस्थित कार्यशैली को दर्शाते हैं, जिसमें परीक्षा पास कराने के नाम पर पहले से रेट तय कर लिया जाता था। डिजिटल साक्ष्य और बैंक लेन-देन की रिपोर्ट ने इन आरोपों को मजबूत किया है।
प्रमुख आरोपियों पर क्या-क्या आरोप लगाए गए हैं?
चार्जशीट में शामिल आरोपियों की भूमिकाएं अलग-अलग बताई गई हैं। धर्मेंद्र कुमार पर तत्कालीन अध्यक्ष के साथ 73 बार बातचीत के रिकॉर्ड मिले हैं। आरोप है कि वह अयोग्य अभ्यर्थियों को मेरिट लिस्ट में शामिल कराने के लिए सौदेबाजी करता था और टीडीपीएल तथा बिसीन एस को इंपैनल कराने में अहम भूमिका निभाता था। अरुण कुमार अभ्यर्थियों को सफलता की गारंटी देकर एडवांस रकम वसूलता था और सिंडिकेट को आर्थिक मदद पहुंचाता था। रमेश कुमार परीक्षा माफिया और अभ्यर्थियों के बीच तालमेल बैठाता था। उस पर ओएमआर शीट में हेरफेर और भारी नकद वसूली का आरोप है। उमेश कुमार पूरे सिंडिकेट के धन लेन-देन और गोपनीय कागजात संभालता था। उसने साक्ष्य मिटाने और मूल दस्तावेज छिपाने की साजिश रची थी। उमाकांत उरांव खुद मेरिट लिस्ट में सफल घोषित हुआ था और अन्य अभ्यर्थियों को सिंडिकेट से जोड़ता था। ब्रज कुमार राम, जो पूर्व सदस्य डॉ. अजिता भट्टाचार्य के पीए थे, उनके नाम पर अभ्यर्थियों से पास कराने का आश्वासन देकर वसूली करता था। इन सभी पर डिजिटल और वित्तीय साक्ष्य के आधार पर आरोप तय किए गए हैं। अगस्त 2026 में इनकी गिरफ्तारी हुई थी।
मामले की पृष्ठभूमि क्या है और अब तक क्या कार्रवाई हुई है?
यह मामला 14वीं JPSC सिविल सेवा परीक्षा में पेपर लीक, ओएमआर शीट में हेरफेर और मेरिट सूची में अनियमितता से जुड़ा है। CID ने जुलाई-अगस्त 2026 में कई आरोपियों को गिरफ्तार किया था। कुल 34 गिरफ्तारियों के साथ जांच अभी भी जारी है। जांच एजेंसी ने बैंक खातों, CDR और डिजिटल डिवाइसेस की गहन जांच की है। कुछ रकम पेपर कंपनियों के खातों में निवेश किए जाने के संकेत भी मिले हैं। यह घोटाला झारखंड में सरकारी नौकरियों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है, क्योंकि JPSC राज्य के महत्वपूर्ण पदों पर भर्ती का मुख्य माध्यम है। अभ्यर्थियों और आम लोगों में यह भावना है कि मेहनत से ज्यादा रसूख और पैसे का प्रभाव पड़ता है। पूर्व में अभय तिवारी को मास्टरमाइंड बताया गया था, जिनके खातों में करोड़ों रुपये के लेन-देन का खुलासा हुआ था।
इस घोटाले का अभ्यर्थियों और परीक्षा प्रणाली पर क्या असर पड़ सकता है?
ऐसे मामले से ईमानदार अभ्यर्थियों का मनोबल गिरता है। जो अभ्यर्थी बिना किसी मदद के तैयारी करते हैं, वे सिस्टम पर भरोसा खो देते हैं। CID की कार्रवाई से कुछ हद तक जवाबदेही का संदेश जाता है, लेकिन लंबे समय में परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने, डिजिटल निगरानी मजबूत करने और बाहरी एजेंसियों की भूमिका सीमित करने की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि OMR शीट और मेरिट सूची से जुड़ी प्रक्रियाओं की स्वतंत्र ऑडिट होनी चाहिए। अदालत में दाखिल चार्जशीट के आधार पर आगे की सुनवाई होगी, जिसमें आरोपियों को अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा। फिलहाल जांच एजेंसी और अधिक साक्ष्य जुटाने में लगी है। यह मामला झारखंड की भर्ती परीक्षाओं में सुधार की मांग को और मजबूत करता है। पारदर्शी और निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली से ही योग्य अभ्यर्थियों को न्याय मिल सकता है। CID की मौजूदा कार्रवाई इस दिशा में एक कदम है, लेकिन अंतिम नतीजा अदालत के फैसले पर निर्भर करेगा। राज्य सरकार और आयोग को अब ठोस सुधारों पर ध्यान देना होगा ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न दोहराई जाएं।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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