Punjab Politics: पंजाब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने अपना इस्तीफा आलाकमान को भेज दिया है। यह जानकारी सूत्रों के हवाले से आई है। आलाकमान की लिखित पुष्टि अभी सार्वजनिक नहीं हुई है। इसलिए खबर को सूत्र आधारित मानकर पढ़ना ठीक रहेगा।
राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं। उससे पहले संगठन में महीनों से कलह चल रही थी। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने वड़िंग से फोन पर प्रदेश इकाई की स्थिति पर बात की। इस्तीफे का फैसला बुधवार को हुआ बताया जा रहा है।
नए चेहरे का ऐलान 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती पर हो सकता है। विजय इंदर सिंगला इस चर्चा में सबसे आगे हैं। राणा केपी, सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रगट सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के नाम भी रेस में गिनाए जा रहे हैं।
राजा वड़िंग के इस्तीफे की खबर कितनी पक्की है?
उपलब्ध सामग्री के अनुसार सूत्र कह रहे हैं कि राजा वड़िंग ने पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा भेज दिया। पार्टी मुख्यालय से प्रेस नोट इस रिपोर्ट में नहीं है। ऐसे मामलों में दिल्ली पुष्टि के बाद तस्वीर साफ होती है। फिलहाल दो बातें एक साथ हैं। इस्तीफा भेजने का दावा, और आलाकमान द्वारा पद बदलने की तैयारी का अनुमान।
पंजाब कांग्रेस इकाई में लंबे समय से अंदरूनी मतभेद चल रहे थे। उसी माहौल में बुधवार वाला फैसला जोड़ा जा रहा है। वेणुगोपाल का फोन इस बात का संकेत है कि दिल्ली स्थिति देख रही थी। फोन पर क्या तय हुआ, उसका पूरा ब्योरा सामने नहीं आया। सिर्फ इतना कहा गया कि मौजूदा स्थिति पर चर्चा हुई।
अध्यक्ष पद छूटने के बाद कई समितियों में भी बदलाव हो सकता है। यह अनुमान है, घोषित पुनर्गठन नहीं। चुनाव साल में समिति का मतलब बूथ से लेकर प्रत्याशी सूची तक की कड़ी होता है। इसलिए कार्यकर्ता सिर्फ नाम नहीं, पूरी टीम का इंतजार कर रहे हैं।
नए पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष की रेस में कौन हैं?
सूची में सबसे अधिक वजन विजय इंदर सिंगला के नाम पर बताया जा रहा है। वे ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सह कोषाध्यक्ष हैं और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य हैं। पीटीआई के मुताबिक उन्हें 1 जुलाई को पार्टी की चुनाव प्रबंधन एवं समन्वय समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। जुलाई वाली जिम्मेदारी को कई सूत्र अब प्रदेश अध्यक्ष वाले कदम से जोड़ रहे हैं।
बाकी चर्चा में राणा केपी हैं। गुरदासपुर सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा हैं। प्रगट सिंह का नाम है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भी सूची में हैं। चन्नी के पास चुनावी पहचान है। रंधावा संसदीय चेहरा हैं। सिंगला संगठन और चुनाव प्रबंधन वाले दायरे में हाल में आगे आए। तीनों प्रोफाइल अलग हैं। आलाकमान किसे संगठन चलाने लायक मानता है, वही फैसला होगा।
एक और कोण यह है कि कांग्रेस इस बार हिंदू चेहरा आगे कर सकती है। सिंगला का नाम इसी नजरिए से भी पढ़ा जा रहा है। यह रणनीतिक पढ़ाई है। आधिकारिक शॉर्टलिस्ट जारी नहीं हुई। 2 अक्टूबर की तारीख संभावना के रूप में आई है। गांधी जयंती पर प्रतीकात्मक घोषणा हो सकती है। देरी भी हो सकती है।
केसी वेणुगोपाल की भूमिका क्यों देखी जा रही है?
केसी वेणुगोपाल कांग्रेस के महासचिव हैं। राज्यों के संगठन और समन्वय से उनका नाम जुड़ा रहता है। पंजाब जैसे चुनावी राज्य में प्रदेश अध्यक्ष से उनकी बातचीत सामान्य औपचारिकता से बड़ी मानी जाती है। दिल्ली जब फोन करती है तो स्थानीय कलह केंद्र तक पहुंच चुकी होती है।
वड़िंग के इस्तीफे और वेणुगोपाल के संपर्क का समय एक जैसा बताया गया है। इससे यही लगता है कि बदलाव अचानक टेलीविजन पर नहीं टूटा। भीतर तैयारी चल रही थी। कितने दिन से चल रही थी, यह स्रोत में नहीं है। जो है वह इतना है कि फोन हुआ, स्थिति पर चर्चा हुई, और इस्तीफा भेजने की खबर आई।
पंजाब कांग्रेस विपक्ष में है। इकाई बिखरी दिखे तो विधानसभा चुनाव में नुकसान होता है। आलाकमान का दबाव इसी डर से समझा जा सकता है। नया अध्यक्ष आए तो उसे पहले घर संभालना होगा, फिर सरकार पर हमला। दोनों काम एक साथ भारी पड़ते हैं।
सिंगला को आगे क्यों माना जा रहा है?
सिंगला को आगे बताने की दो वजह स्रोत में हैं। पहली, जुलाई में मिली चुनाव प्रबंधन वाली कमान। दूसरी, सह कोषाध्यक्ष और कार्यसमिति सदस्य जैसी केंद्रीय भूमिका। प्रदेश अध्यक्ष पद अक्सर उसी नेता को जाता है जिसे दिल्ली पहले से किसी चुनावी ढांचे से जोड़ चुकी हो। सूत्र यही जोड़ रहे हैं।
यह जोड़ पक्की नियुक्ति नहीं है। कांग्रेस में अंतिम समय पर नाम बदलते रहे हैं। चन्नी जैसे चुनाव लड़े चेहरे की दावेदारी खत्म नहीं मानी जा सकती। रंधावा का संसदीय आधार भी बातचीत में रह सकता है। फिर भी इस समय सबसे अधिक दोहराया गया नाम सिंगला ही है। संबंधित अन्य खबरों में भी उन्हें जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा है।
संगठन का चेहरा और चुनावी चेहरा हमेशा एक नहीं होते। प्रबंधन समिति चलाना अलग काम है, रैली में भीड़ खींचना अलग। पंजाब कांग्रेस को दोनों चाहिए। आलाकमान यदि सिंगला चुनता है तो संकेत यह जाएगा कि अभी प्राथमिकता संगठन सुधार की है। यदि चन्नी या रंधावा चुने गए तो चुनावी पहचान आगे होगी। फिलहाल केवल संकेत हैं।
विधानसभा चुनाव से पहले यह फेरबदल क्यों मायने रखता है?
पंजाब में विधानसभा चुनाव अगले वर्ष हैं। प्रदेश अध्यक्ष बूथ कमेटी, जिलाध्यक्ष और प्रचार कैलेंडर का केंद्र होता है। कुर्सी खाली या विवादित रही तो कार्यकर्ता दिशा नहीं देख पाते। इस्तीफा और संभावित 2 अक्टूबर वाली घोषणा इसी शून्य को भरने की कोशिश लगती है।
समितियों में उठापटक का अनुमान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल अध्यक्ष बदलने से कलह खत्म नहीं होती। पुरानी टीम नई कमान से न जुड़ी तो वही शिकायतें दोबारा उठेंगी। कांग्रेस को एक संदेश देना होगा कि गुट नहीं, चुनाव प्राथमिकता है। वह संदेश नाम के साथ टीम से जाएगा।
2 अक्टूबर को ऐलान हुआ तो गांधी जयंती का प्रतीक संगठन परिवर्तन से जुड़ जाएगा। नहीं हुआ तो अटकलें और चलेंगी। राजा वड़िंग के बाद पंजाब कांग्रेस की कमान किसके हाथ में जाती है, यही अगला पड़ाव है। तब तक सूत्र सिंगला को आगे बता रहे हैं और बाकी नेता रेस में बने हुए हैं।
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