डेस्क: बिहार की राजनीति हमेशा से ही जाति, विकास और वादों की जंग रही है, लेकिन 2025 विधानसभा चुनावों में एक नई ताकत उभर रही है – महिलाएं। ये ‘साइलेंट फ़ोर्स’ न तो रैलियों में चिल्लाती हैं, न सोशल मीडिया पर ट्रोल करती हैं, लेकिन उनके वोटों की चुप्पी चुनावी समीकरणों को पलट सकती है। पहले चरण के मतदान (6 नवंबर) में रिकॉर्ड 65.08% वोटर टर्नआउट हुआ, जिसमें महिलाओं का योगदान सबसे ज्यादा रहा। कुल 7.51 करोड़ वोटर्स में 3.5 करोड़ महिलाएं हैं, और 2010 से लगातार उनका टर्नआउट पुरुषों से ज्यादा रहा है। 2020 में 59.7% महिलाओं ने वोट डाला, जबकि पुरुषों का 54.5%। क्या ये महिलाएं NDA की नीतीश कुमार सरकार को बचा लेंगी या महागठबंधन को सत्ता की कुंजी सौंप देंगी? इस लेख में हम विश्लेषण करेंगे कि कैसे महिलाएं बिहार के राजनीतिक परिदृश्य को बदल रही हैं, उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं और पार्टियां उन्हें कैसे ललचा रही हैं।
महिलाओं का उदय: आंकड़ों की कहानी
बिहार में महिलाओं का राजनीतिक सफर लंबा रहा है, लेकिन 2010 के बाद यह एक क्रांति बन गया। 1990 के दशक में महिलाओं का टर्नआउट 53.3% था, जबकि पुरुषों का 69.6%। लेकिन 2010 से उलट फेर हो गया – महिलाएं आगे निकल गईं। 2015 में 60.5% महिलाओं ने वोट डाला, 2020 में 59.7%। 2025 के पहले चरण में भी महिलाओं की कतारें लंबी दिखीं, खासकर ग्रामीण इलाकों में। इलेक्शन कमीशन के आंकड़ों के अनुसार, 45,341 पोलिंग स्टेशनों में 926 महिलाओं द्वारा संचालित थे, जो महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करने का प्रयास था।
यह बदलाव संयोग नहीं, नीतियों का नतीजा है। नीतीश कुमार की ‘महिला सशक्तिकरण’ योजनाओं ने महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाया। जीविका जैसे सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स में 1.40 करोड़ महिलाएं जुड़ी हैं, जो न केवल आय का स्रोत हैं बल्कि राजनीतिक जागरूकता का माध्यम भी। एक सर्वे (Outlook India) बताता है कि 70% महिलाएं अब फैसले खुद लेती हैं, जो पहले पितृसत्तात्मक बंधनों में कैद थीं। लेकिन सवाल यह है – क्या ये साइलेंट वोटर वाकई चुप हैं? या उनकी चुप्पी ही सबसे बड़ा संदेश है?
नीतीश का ‘महिला मॉडल’: सफलता या दिखावा?
नीतीश कुमार को ‘महिला मित्र’ कहा जाता है। उनकी सरकार ने साइकिल योजना, यूनिफॉर्म, शराबबंदी और अब कर्ज माफी जैसी स्कीम्स चलाईं, जिनसे महिलाओं का NDA से लगाव बढ़ा। 2020 चुनावों में पीएम मोदी ने खुद कहा था कि महिलाओं ने NDA को जिताया। 2025 में भी NDA महिलाओं पर दांव लगा रहा है। कैश ट्रांसफर (महिलाओं को 1,000 रुपये मासिक), फ्री बिजली और पेंशन वृद्धि जैसी योजनाएं एंटी-इनकंबेंसी को काउंटर कर रही हैं।
ग्रामीण महिलाएं, जैसे मधुबनी की नीशा (32 वर्षीय कारीगर), कहती हैं, “नीतीश जी ने हमें स्वावलंबी बनाया।” लेकिन आलोचक कहते हैं कि ये योजनाएं चुनावी स्टंट हैं। महागठबंधन का आरोप है कि बिहार में महिला अपराध 20% बढ़ा है, और रोजगार की कमी महिलाओं को प्रभावित कर रही है। फिर भी, महिलाओं का 60% टर्नआउट NDA के पक्ष में जा सकता है, जैसा कि 2015-2020 में हुआ।
महागठबंधन का जवाब: युवा महिलाओं पर फोकस
महागठबंधन (RJD-कांग्रेस-लेफ्ट) महिलाओं को नजरअंदाज नहीं कर रहा। तेजस्वी यादव की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ और रोहिणी आचार्य की सरण सीट से उम्मीदवारी महिलाओं को लुभा रही है। प्रियंका गांधी की रैलियां ‘महिलाओं की सुरक्षा’ पर केंद्रित हैं। तेजस्वी कहते हैं, “यह चुनाव बदलाव का है – रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा।” महागठबंधन युवा महिलाओं (18-35 वर्ष) को टारगेट कर रहा है, जो बेरोजगारी से त्रस्त हैं।
एक अध्ययन (News18) दिखाता है कि 40% युवा महिलाएं महागठबंधन की ओर झुक रही हैं, क्योंकि वे नीतीश की ‘पुरानी राजनीति’ से ऊब चुकी हैं। लेकिन चुनौती है – RJD का ‘जंगल राज’ इमेज महिलाओं को डराता है। फिर भी, पहले चरण के एग्जिट पोल्स में महागठबंधन का दावा है कि महिलाओं का 45% वोट उनके पक्ष में।
चुनौतियां: साइलेंट क्यों रहती हैं महिलाएं?
महिलाएं साइलेंट फ़ोर्स हैं, लेकिन उनकी आवाज दबाई जाती है। पितृसत्ता, प्रवासी पति (75 लाख बिहारी बाहर काम करते हैं) और डर उन्हें चुप रखते हैं। विकिपीडिया के अनुसार, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में कई महिलाओं के नाम कटे, जो वोटर सप्रेशन का आरोप लगा रही हैं। SC महिलाओं (20% आबादी) में गरीबी (72% घरों में 10,000 से कम आय) उन्हें प्रभावित करती है। फिर भी, वे ‘किंगमेकर’ बन रही हैं – 2024 लोकसभा में महिलाओं के वोट ने विपक्ष को मजबूत किया।
अन्य फैक्टर: प्रवासी और युवा वोटर्स का रोल
महिलाओं के अलावा, प्रवासी पुरुष और युवा वोटर्स (1 करोड़ नए वोटर) असर डालेंगे। जन सुराज पार्टी (प्रशांत किशोर) महिलाओं पर फोकस कर रही है। गूगल ट्रेंड्स दिखाते हैं कि BJP-RJD डोमिनेंट हैं, लेकिन ग्राउंड पर अनिश्चितता।
निष्कर्ष: महिलाएं तय करेंगी भविष्य-बिहार 2025 चुनावों में महिलाएं न केवल वोट डाल रही हैं, बल्कि दिशा बदल रही हैं। 14 नवंबर को नतीजे बताएंगे कि क्या नीतीश का मॉडल जीतेगा या तेजस्वी का बदलाव। लेकिन एक बात साफ – साइलेंट फ़ोर्स अब चुप नहीं रहेगी। पार्टियों को महिलाओं की प्राथमिकताओं (सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा) पर ध्यान देना होगा। बिहार की राजनीति अब ‘नारी शक्ति’ की हो गई है। क्या ये क्रांति पूरी होगी? समय बताएगा।
बिहार 2025: 3.5 करोड़ महिलाएं बदलेंगी सत्ता का खेल – साइलेंट फ़ोर्स का कमाल!”



