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सिंगूर फिर बना चुनावी रणभूमि, जिस जमीन ने ममता को सत्ता दिलाई, अब BJP उसे हथियार बना रही है उनके खिलाफ

West Bengal Election: पश्चिम बंगाल की राजनीति में सिंगूर एक ऐसा नाम है जिसने ममता बनर्जी को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया। लगभग दो दशक पहले खेती की उपजाऊ जमीन पर टाटा नैनो प्रोजेक्ट के खिलाफ छेड़े गए आंदोलन ने राज्य की राजनीति का नक्शा ही बदल दिया था। आज वही सिंगूर फिर से चर्चा में है लेकिन इस बार इसे ममता बनर्जी के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक आते देख भाजपा ने सिंगूर को केंद्र में लाकर एक नई राजनीतिक रणनीति अपनाई है। पार्टी का तर्क है कि ममता की सबसे बड़ी राजनीतिक जीत दरअसल बंगाल का सबसे बड़ा औद्योगिक नुकसान बन गई।

प्रधानमंत्री मोदी की रैली से बढ़ा तनाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 18 जनवरी को सिंगूर के सिंहभेरी मौजा में एक विशाल रैली को संबोधित करने वाले हैं। यह वही जमीन है जिसे कभी टाटा नैनो फैक्ट्री के लिए चुना गया था। भाजपा ने इस रैली को ममता सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का जरिया बनाया है। पार्टी का दावा है कि अगर 2026 के चुनाव में वह सत्ता में आती है तो टाटा को वापस सिंगूर लाएगी। यह घोषणा महज एक चुनावी जुमला नहीं बल्कि एक सोची समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है जिसमें सिंगूर को खोए हुए औद्योगिक अवसर के प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा है।

समय में जमी हुई जमीन

जब से टाटा मोटर्स ने 2008 में सिंगूर छोड़ा तब से प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहित लगभग 1000 एकड़ जमीन का बड़ा हिस्सा बेकार पड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार अधिकांश जमीन झाड़ियों से ढकी है और खेती के लायक नहीं रही। केवल करीब 300 एकड़ जमीन को खेती के लिए बहाल किया जा सका है। छोड़ी गई कंक्रीट संरचनाएं और अधूरा बुनियादी ढांचा आज भी इस इलाके पर हावी है। भाजपा ने इस ठहराव की तस्वीर का भरपूर फायदा उठाते हुए अपने संदेश को मजबूत किया है कि सिंगूर इस बात का जीता जागता सबूत है कि उद्योगों के राज्य छोड़ने के बाद बंगाल ने क्या कुछ खोया।

सिंगूर विवाद की शुरुआत

सिंगूर का विवाद 2006 में शुरू हुआ जब तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्जी के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने टाटा ग्रुप के साथ नैनो कार बनाने का समझौता किया। हुगली जिले में लगभग 1000 एकड़ बहुफसली कृषि भूमि इस परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई। यह जमीन अत्यंत उपजाऊ थी और यहां के किसान साल में तीन फसलें उगाते थे।

इसके तुरंत बाद किसानों का विरोध शुरू हो गया। उस समय विपक्ष में रहीं ममता बनर्जी ने इस स्थानीय मुद्दे को राज्यव्यापी आंदोलन में बदल दिया। उन्होंने इसे जबरन जमीन अधिग्रहण करार दिया और किसानों के हक की लड़ाई के रूप में पेश किया। विरोध प्रदर्शनों में पुलिस की कार्रवाई गिरफ्तारियां और अंततः कोलकाता में ममता बनर्जी की 21 दिन की भूख हड़ताल शामिल रही। आंदोलन इतना तीव्र हो गया कि 2008 तक टाटा मोटर्स को सिंगूर से हटकर प्रोजेक्ट को गुजरात शिफ्ट करना पड़ा।

गुजरात की जीत और मोदी का स्वागत

उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ने रतन टाटा को एक शब्द के संदेश के साथ मशहूर तरीके से स्वागत किया था। 2010 में सानंद में नैनो प्लांट का उद्घाटन करते हुए मोदी ने कहा था जब रतन टाटा ने कोलकाता में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वे पश्चिम बंगाल छोड़ रहे हैं तो मैंने उन्हें एक छोटा एसएमएस भेजा जिसमें सिर्फ स्वागत है लिखा था। अब आप देख सकते हैं कि एक रुपये का एसएमएस क्या कर सकता है। यह घटना आज भी गुजरात के औद्योगिक विकास और बंगाल की औद्योगिक गिरावट के प्रतीक के रूप में याद की जाती है।

सिंगूर और ममता का राजनीतिक उदय

West Bengal Election: West Bengal CM Mamata Banerjee
West Bengal Election: West Bengal CM Mamata Banerjee

सिंगूर आंदोलन नंदीग्राम आंदोलन के साथ मिलकर ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्थान की नींव बना। 2011 में उन्होंने पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के 34 साल के शासन को समाप्त कर दिया और मुख्यमंत्री बनीं। बाद में तृणमूल कांग्रेस को कानूनी समर्थन भी मिला जब सुप्रीम कोर्ट ने अनिच्छुक किसानों को जमीन वापस करने का आदेश दिया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अधिग्रहण अवैध था। पार्टी इस फैसले को इस बात के सबूत के रूप में पेश करती रहती है कि सिंगूर किसानों के अधिकारों की लड़ाई थी न कि औद्योगिक विफलता की कहानी।

भाजपा की नई रणनीति

भाजपा अब उस पूरी कहानी को पलटने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि सिंगूर बंगाल के औद्योगिक पतन की शुरुआत थी और इसने निवेशकों को डरा दिया। केंद्रीय मंत्री और राज्य भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने कहा जिस दिन टाटा को जाने के लिए मजबूर किया गया उसी दिन औद्योगीकरण ने बंगाल छोड़ दिया। प्रधानमंत्री मोदी अब आ रहे हैं और भविष्य में टाटा भी वापस आएंगे। लेकिन इसके लिए बंगाल में सरकार बदलने की जरूरत है।

एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने बताया कि मोदी औद्योगीकरण पर सिंगूर से बोलेंगे जहां से ममता बनर्जी के कारण टाटा को जाने के लिए मजबूर किया गया था। एक अन्य भाजपा सूत्र ने बताया कि जिन किसानों ने कभी बनर्जी के आंदोलन का समर्थन किया था उन्हें 18 जनवरी की रैली में आमंत्रित किया गया है। जो किसान अब सिंगूर में उद्योग चाहते हैं उन्हें रैली में आगे की पंक्तियों में बिठाया जाएगा।

तृणमूल का पलटवार

तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के अभियान को चुनिंदा याददाश्त और तथ्यों की अनदेखी करार देकर खारिज कर दिया है। पार्टी के प्रवक्ता कुणाल घोष ने भाजपा पर किसानों के संघर्ष की वास्तविकता को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा ये पुराने सीपीआई एम के चेहरे हैं जो अब भाजपा में शामिल हो गए हैं। वे उन गांवों में नहीं गए जहां लोगों ने वास्तव में जमीन की लड़ाई लड़ी थी।

राज्य मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की ओर इशारा करते हुए कहा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिंगूर में जमीन अधिग्रहण गलत था। जब किसानों को पीटा जा रहा था और जमीन जबरदस्ती छीनी जा रही थी तब ये नेता कहां थे। तृणमूल का तर्क है कि भाजपा किसानों के दर्द को भूलकर केवल औद्योगिक राजनीति कर रही है।

सिंगूर आज क्या है?

आज सिंगूर एक उदास और उजड़ी हुई जगह है। जो जमीन कभी हरी भरी फसलों से लहलहाती थी वह अब बंजर पड़ी है। जो जमीन औद्योगिक क्रांति का केंद्र बनने वाली थी वह अधूरी इमारतों और टूटे सपनों का प्रतीक बन गई है। स्थानीय किसान आज भी बंटे हुए हैं। कुछ का मानना है कि अगर फैक्ट्री लग जाती तो उन्हें रोजगार मिलता। कुछ अब भी अपनी जमीन वापस पाने पर संतुष्ट हैं। यह द्वंद्व भाजपा के लिए एक राजनीतिक अवसर है।

West Bengal Election: चुनावी रणभूमि फिर तैयार

2026 के विधानसभा चुनाव से पहले सिंगूर फिर से केंद्रीय मुद्दा बन गया है। भाजपा इसे औद्योगिक विकास बनाम किसान हितों की बहस में बदलने की कोशिश कर रही है। तृणमूल इसे किसानों के अधिकारों की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है। 18 जनवरी की रैली इस नई राजनीतिक लड़ाई का आगाज होगी। सिंगूर जो कभी ममता बनर्जी की ताकत का प्रतीक था अब उनकी कमजोरी के रूप में पेश किया जा रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बंगाल के मतदाता सिंगूर को किस नजरिए से देखते हैं किसानों की जीत के रूप में या खोए हुए औद्योगिक अवसर के रूप में।

Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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