Bihar Politics: बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़े उलटफेर की तैयारी हो रही है। नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए की शानदार जीत के महज दो महीने बाद राज्य की राजनीति में दलबदल और पाला बदलने की खबरें तेज हो गई हैं। सबसे बड़ा सियासी घटनाक्रम यह है कि कांग्रेस के सभी छह विधायक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड से संपर्क में बताए जा रहे हैं। अगर यह सच साबित होता है तो 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
कांग्रेस विधायकों की बढ़ती दूरी
राज्य में कांग्रेस ने कुल 61 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन केवल छह सीटों पर जीत हासिल कर सकी। ये विधायक हैं मनहारी से मनोहर प्रसाद सिंह वाल्मीकि नगर से सुरेंद्र प्रसाद चनपटिया से अभिषेक रंजन अररिया से आबिदुर रहमान किशनगंज से मोहम्मद कामरुल होदा और फारबिसगंज से मनोज बिस्वान। सूत्रों के अनुसार इन सभी विधायकों में पार्टी की कार्यप्रणाली को लेकर गहरा असंतोष है।
जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया है कि कांग्रेस विधायक राज्य में पार्टी के काम करने के तरीके से बेहद नाखुश हैं और उनके संपर्क में हैं। उनका कहना है कि विधायकों के दलबदल में अब बस कुछ ही दिनों की देरी है। यदि ऐसा होता है तो विधानसभा में जदयू की संख्या 91 हो जाएगी जो भाजपा की 89 सीटों से अधिक होगी। यह नीतीश कुमार के लिए एनडीए के भीतर अपनी स्थिति मजबूत करने का बड़ा अवसर होगा।
पार्टी कार्यक्रमों से गायब विधायक
हाल की घटनाओं ने इन अटकलों को और हवा दी है। 8 जनवरी को प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम द्वारा आयोजित मनरेगा बचाओ अभियान की बैठक से दो विधायक सुरेंद्र प्रसाद और अभिषेक रंजन गायब रहे। इसके बाद पारंपरिक दही चूड़ा भोज में भी ये विधायक शामिल नहीं हुए। कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि रंजन पिछले कुछ हफ्तों से पार्टी के लगभग सभी कार्यक्रमों से दूरी बना रहे हैं।
हालांकि कांग्रेस नेतृत्व इन अटकलों को राजनीतिक षड्यंत्र करार दे रहा है। पूर्व विधायक दल के नेता शकील अहमद खान ने कहा कि इन अटकलों में कोई सच्चाई नहीं है। उन्हें पूरा विश्वास है कि कोई भी विधायक कहीं नहीं जा रहा। विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्रों में व्यस्त थे इसलिए कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके। बिहार के लिए एआईसीसी सचिव शाहनवाज आलम ने भी इन खबरों को पूरी तरह गलत बताया और एनडीए पर मनरेगा मुद्दे से ध्यान भटकाने का आरोप लगाया।
आरएलएम में भी असंतोष की लहर

कांग्रेस ही नहीं बल्कि एनडीए के भीतर भी तनाव के संकेत मिल रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा आरएलएम के चार में से तीन विधायक भाजपा के संपर्क में बताए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार रामेश्वर महतो माधव आनंद और आलोक कुमार सिंह भाजपा नेताओं से बातचीत कर रहे हैं। चौथी विधायक उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता हैं।
आरएलएम में असंतोष की मुख्य वजह कुशवाहा का अपने बेटे दीपक को नीतीश कैबिनेट में मंत्री बनाने का फैसला है जबकि वे विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं। 20 नवंबर को मंत्रिमंडल गठन के तुरंत बाद से ही पार्टी में असंतोष की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी। हाल ही में तीनों विधायकों ने कुशवाहा द्वारा नाराज नेताओं को मनाने के लिए आयोजित लिट्टी पार्टी में जाने के बजाय भाजपा के नए राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन से मिलना पसंद किया।
विधायकों का पक्ष
हालांकि आरएलएम विधायक पार्टी टूटने की खबरों को खारिज कर रहे हैं। मधुबनी से विधायक माधव आनंद ने स्वीकार किया कि विधायक इस बात से नाराज हैं कि कुशवाहा जी ने अपने परिवार को आगे बढ़ाने का फैसला लिया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पार्टी टूट जाएगी। वे आरएलएसपी के दिनों से कुशवाहा के साथ हैं और पार्टी के भीतर इन मुद्दों पर बात हो रही है।
दिनारा से विधायक आलोक कुमार सिंह ने भी लिट्टी पार्टी से अपनी अनुपस्थिति को महज व्यस्तता बताया। उनका कहना है कि सिर्फ इसलिए कि वे भोज में शामिल नहीं हो सके लोगों ने टूट की अटकलें लगानी शुरू कर दीं। जो भी मुद्दे हैं उन्हें पार्टी के भीतर सुलझाया जाएगा। उन्हें अपने अध्यक्ष पर पूरा भरोसा है।
आरसीपी सिंह की वापसी की अटकलें
इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री और नीतीश कुमार के कभी करीबी रहे आरसीपी सिंह की जदयू में वापसी की भी चर्चा है। 2022 में सिंह को भाजपा से नजदीकी बढ़ाने और जदयू तोड़ने की कोशिश के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। बाद में वे प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी में शामिल हो गए थे।
हाल ही में बिहार में आयोजित एक कुर्मी सम्मेलन में सिंह को आमंत्रित किया गया जहां नीतीश कुमार भी मौजूद थे। हालांकि सिंह मुख्यमंत्री के जाने के बाद पहुंचे लेकिन दोनों का एक ही कार्यक्रम में शामिल होना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जदयू सूत्रों का कहना है कि सिंह की वापसी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
एनडीए की मजबूत स्थिति
नवंबर 2025 के चुनावों में एनडीए ने 243 सीटों में से 202 सीटें जीतकर जबरदस्त जीत हासिल की थी। इसमें भाजपा को 89 और जदयू को 85 सीटें मिली थीं। महागठबंधन को केवल 35 सीटें मिलीं जिनमें राजद को 25 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं। इतनी मजबूत बहुमत के बावजूद एनडीए के भीतर वर्चस्व की लड़ाई जारी है।
भाजपा और जदयू दोनों ही अपनी संख्यात्मक ताकत बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं। कांग्रेस विधायकों को जदयू में शामिल करना नीतीश कुमार के लिए एक बड़ा राजनीतिक दांव है जो उन्हें गठबंधन के भीतर मजबूत स्थिति देगा। वहीं भाजपा आरएलएम विधायकों को अपने साथ लाकर अपनी संख्या बढ़ाने की कोशिश में है।
Bihar Politics: राजनीतिक अस्थिरता की आशंका
ये सभी घटनाक्रम दर्शाते हैं कि एनडीए के भारी बहुमत के बावजूद बिहार की राजनीति अस्थिरता के एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। दलबदल और पाला बदलने की ये खबरें आने वाले समय में नए राजनीतिक समीकरण बना सकती हैं। विपक्षी महागठबंधन के लिए यह बड़ा झटका होगा खासकर कांग्रेस के लिए जिसका विधानसभा में प्रतिनिधित्व पूरी तरह खत्म हो सकता है।
एनडीए के भीतर भाजपा और जदयू के बीच शक्ति संतुलन भी इन घटनाक्रमों से प्रभावित होगा। अगले कुछ हफ्तों में बिहार की राजनीति में कई बड़े उलटफेर देखने को मिल सकते हैं जो 2029 के लोकसभा चुनाव तक की राजनीति को प्रभावित करेंगे।



