
डेस्क: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संगठन की विचारधारा और भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण बातें कही। उन्होंने कहा कि परिवार और समाज को एकजुट बनाए रखने के लिए अपनी भाषा, परंपरा, वेशभूषा और संस्कृति का संरक्षण करना आवश्यक है।
शिक्षा और नई नीति पर विचार
भागवत ने स्पष्ट किया कि तकनीक और आधुनिकता शिक्षा के विरोधी नहीं हैं। उनके अनुसार शिक्षा केवल जानकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने का माध्यम है। उन्होंने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को सही दिशा में कदम बताया और कहा कि इसमें पंचकोसीय शिक्षा का प्रावधान समाज निर्माण के लिए उपयोगी होगा।
समाज में समरसता और एकता
संघ प्रमुख ने जोर देकर कहा कि परिवार और समाज में एकजुटता बनाए रखने के लिए एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में शामिल होना चाहिए। इससे सामाजिक दूरियां कम होंगी, विश्वास बढ़ेगा और प्रेम-करुणा की भावना पनपेगी। उन्होंने कहा कि आपसी सहभागिता से समाज में समरसता आती है और भेदभाव घटते हैं।
कानून व्यवस्था पर भरोसा जरूरी
भागवत ने लोगों से अपील की कि विवाद या तनाव की स्थिति में कानून को अपने हाथ में न लें। उन्होंने कहा कि देश की विविधता में सभी जातियों, पंथों और समुदायों को जोड़ने के लिए कानूनी व्यवस्था पर भरोसा करना चाहिए।
“कहीं कोई झगड़ा नहीं”
संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि आरएसएस का सरकारों के साथ अच्छा तालमेल है, लेकिन कई व्यवस्थाएं अभी भी अंग्रेजों के जमाने की सोच पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ बदलाव और नवाचार जरूरी है। उन्होंने साफ कहा कि कहीं कोई झगड़ा नहीं है और हमें हर सरकार को स्वतंत्रता देनी होगी ताकि वह अपनी जिम्मेदारी निभा सके।
“हम भाजपा के लिए फैसले नहीं लेते”
मोहन भागवत ने भाजपा से आरएसएस के संबंधों को लेकर उठने वाले सवालों पर भी जवाब दिया। उन्होंने कहा,
“यह सच नहीं है कि आरएसएस भाजपा के लिए फैसले लेता है। हम केवल सुझाव देते हैं, निर्णय सरकार को ही करना होता है। अगर फैसले हम लेते, तो इसमें इतना समय नहीं लगता।”
उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस और भाजपा के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं। भागवत ने याद दिलाया कि जेपी नारायण से लेकर प्रणब मुखर्जी तक, कई बड़े नेताओं ने संघ के प्रति अपना दृष्टिकोण बदला है। इसलिए बदलाव की संभावना को कभी नकारा नहीं जाना चाहिए।