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UDISE+ Report 2025-26: बिहार और झारखंड के स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के लिए शौचालय और सुविधाओं की भारी कमी

23 अक्टूबर 2026
UDISE+ Report 2025-26
UDISE+ Report 2025-26

UDISE+ Report 2025-26: शिक्षा मंत्रालय की ताजा UDISE+ 2025-26 रिपोर्ट में देश भर के स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाओं की स्थिति चिंताजनक सामने आई है। खासकर बिहार और झारखंड में चालू शौचालयों की कमी ने सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश के केवल 38.1 प्रतिशत स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के अनुकूल चालू शौचालय उपलब्ध हैं। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में स्कूलों में यह सुविधा या तो नहीं है या काम नहीं कर रही।

दिव्यांग बच्चों को स्कूल में बिना किसी बाधा के पढ़ाई करनी चाहिए। लेकिन जब शौचालय जैसी जरूरी सुविधा नहीं मिलती तो उनकी नियमित उपस्थिति और पढ़ाई दोनों प्रभावित हो सकती है। रिपोर्ट ने इस मुद्दे को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है।

देश भर में दिव्यांग बच्चों के लिए शौचालयों की स्थिति क्या है?

UDISE+ 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक देश के 9,07,876 स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के अनुकूल चालू शौचालय नहीं हैं। केवल 38.1 प्रतिशत स्कूलों में यह सुविधा कामकाजी हालत में उपलब्ध है। यह आंकड़ा बताता है कि शौचालय बनवाना ही पर्याप्त नहीं है। उनका नियमित रखरखाव, सफाई और उपयोग के लायक होना भी उतना ही जरूरी है।

कई स्कूलों में शौचालय बने हुए हैं लेकिन वे बंद पड़े रहते हैं या खराब हालत में हैं। ऐसे में दिव्यांग बच्चे उनका इस्तेमाल नहीं कर पाते। रिपोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि सुविधा का निर्माण और उसके बाद का रखरखाव दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

बिहार और झारखंड में स्थिति कितनी चिंताजनक है?

बिहार में केवल 21.1 प्रतिशत स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के अनुकूल चालू शौचालय हैं। झारखंड में यह आंकड़ा और कम, मात्र 8.5 प्रतिशत है। दोनों राज्यों में शौचालय की कमी अन्य सुविधाओं की तुलना में अधिक गंभीर है।

रैंप की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। बिहार के 88.6 प्रतिशत स्कूलों में रैंप बने हुए हैं और 58.6 प्रतिशत स्कूलों में रैंप के साथ हैंडरेल भी उपलब्ध हैं। झारखंड में 67.6 प्रतिशत स्कूलों में रैंप और 41.7 प्रतिशत में हैंडरेल की सुविधा है। फिर भी शौचालय की कमी के कारण रैंप का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।

देश में रैंप और हैंडरेल की स्थिति क्या है और केंद्रीय स्कूलों में फर्क क्यों है?

राष्ट्रीय स्तर पर 79.7 प्रतिशत स्कूलों में रैंप उपलब्ध हैं जबकि 58.2 प्रतिशत स्कूलों में रैंप के साथ हैंडरेल भी हैं। रैंप होने से बच्चों का स्कूल तक पहुंचना आसान हो जाता है। लेकिन अगर शौचालय तक पहुंच नहीं है या वहां व्हीलचेयर के साथ जाना मुश्किल है तो रैंप का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

केंद्रीय विद्यालयों में स्थिति बेहतर है। वहां 93.1 प्रतिशत स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के अनुकूल चालू शौचालय हैं। नवोदय विद्यालयों में यह आंकड़ा 96.1 प्रतिशत है। इसके मुकाबले राज्य सरकार के स्कूलों में केवल 35.7 प्रतिशत स्कूलों में यह सुविधा उपलब्ध है। यह अंतर बजट, रखरखाव और संसाधनों की उपलब्धता से जुड़ा हो सकता है।

शौचालय की कमी से दिव्यांग बच्चों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?

जब स्कूल में दिव्यांग बच्चों के लिए सही शौचालय नहीं होता तो उनकी रोजमर्रा की पढ़ाई प्रभावित होती है। कई बच्चे पूरे दिन स्कूल में सहज महसूस नहीं कर पाते। कुछ बच्चे शौचालय जाने से बचने के लिए पानी कम पीते हैं या लंबे समय तक पेशाब रोकते हैं। इससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।

कई बार बच्चों को शौचालय इस्तेमाल करने के लिए दूसरों की मदद लेनी पड़ती है। किशोरियों के लिए मासिक धर्म के दौरान साफ और सुरक्षित शौचालय की जरूरत और बढ़ जाती है। इन समस्याओं के कारण कुछ बच्चे स्कूल जाने से भी हिचक सकते हैं।

सुधार के लिए क्या कदम जरूरी हैं?

UDISE+ रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि दिव्यांग बच्चों के लिए स्कूलों को बेहतर बनाने की दिशा में अभी काफी काम बाकी है। सिर्फ सुविधाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। उनका नियमित रखरखाव भी सुनिश्चित करना होगा। बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में विशेष ध्यान देने की जरूरत है जहां शौचालयों की उपलब्धता बहुत कम है।

स्कूल प्रशासन और स्थानीय स्तर पर रखरखाव की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। हर बच्चे को सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल मिलना चाहिए। दिव्यांग बच्चों के लिए शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा भी इसी का हिस्सा है। जब तक ये सुविधाएं कामकाजी हालत में उपलब्ध नहीं होंगी, तब तक समावेशी शिक्षा का लक्ष्य अधूरा रहेगा।

रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सुविधाओं का निर्माण और उनका सही इस्तेमाल दोनों जरूरी हैं। बिहार और झारखंड के आंकड़े सुधार की तात्कालिक जरूरत को रेखांकित करते हैं।

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Netsha Singh
Author: Netsha Singh

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कवरेज: Netsha Singh, News Media Kiran

Netsha Singh

News Media Kiran के लिए लिखते हैं।

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