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एनडीए में सीट बंटवारे के बाद बढ़ी बेचैनी! मांझी और कुशवाहा की नाराजगी से सियासी हलचल तेज, क्या बिगड़ जाएगा गठबंधन का गणित?

एनडीए के भीतर सीट बंटवारे की घोषणा के बाद जो तस्वीर सामने आई है, उसने बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। रविवार को जब एनडीए की बैठक के बाद यह कहा गया कि सीट शेयरिंग का फार्मूला तय हो गया है और सभी दल संतुष्ट हैं, तब लग रहा था कि गठबंधन ने चुनावी जंग से पहले एकजुटता का मजबूत संदेश दे दिया है। लेकिन कुछ ही घंटों में घटनाक्रम ने करवट ले ली। सबसे पहले हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने नाराजगी जताई, उसके बाद राष्ट्रीय लोक जनता दल (RLJD) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा का भावनात्मक सोशल मीडिया संदेश सामने आया। इन दोनों बयानों ने एनडीए की अंदरूनी एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मांझी की नाराजगी से बढ़ी बेचैनी

सीट बंटवारे के बाद जीतन राम मांझी ने खुलकर कहा कि उनके दल की ताकत को कम करके आंका गया है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि इस फैसले का खामियाजा एनडीए को चुनाव में भुगतना पड़ सकता है। मांझी का बयान सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई कि क्या यह असंतोष आने वाले दिनों में गठबंधन के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
मांझी का जनाधार मुख्य रूप से बिहार के मगध और दक्षिणी इलाकों में मजबूत माना जाता है। ऐसे में उनका नाराज होना एनडीए के वोट बैंक पर सीधा असर डाल सकता है।

कुशवाहा का ‘खुला संदेश’ — भावनात्मक अपील में छिपी नाराजगी

मांझी के बयान के कुछ ही घंटों बाद उपेंद्र कुशवाहा ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक खुला संदेश पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से माफी मांगी। कुशवाहा ने लिखा, “प्रिय मित्रों, आप सभी से क्षमा चाहता हूं। आपके मन के अनुकूल सीटों की संख्या नहीं हो पायी। मैं समझ रहा हूं, इस निर्णय से हमारी पार्टी के हजारों-लाखों समर्थक निराश हैं। लेकिन कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं जो दिखती नहीं हैं। मैं आप सबसे आग्रह करता हूं कि गुस्सा शांत होने दीजिए, आने वाला समय सबकुछ स्पष्ट कर देगा।”

यह भावनात्मक पोस्ट जहां एक ओर कुशवाहा की असहायता को दर्शाता है, वहीं यह संकेत भी देता है कि सीट बंटवारे को लेकर उन्हें पूरी तरह न्याय नहीं मिला।

चिराग पासवान पर नाराजगी का केन्द्र

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि एनडीए में बढ़ते असंतोष की जड़ में लोजपा (रामविलास) प्रमुख चिराग पासवान की बढ़ी हुई भूमिका है। इस बार सीट बंटवारे में चिराग पासवान को बड़ी हिस्सेदारी मिली, जबकि मांझी और कुशवाहा को अपेक्षा से कम सीटें दी गईं।

सूत्र बताते हैं कि बैठक के दौरान भी मांझी और कुशवाहा ने आपत्ति दर्ज कराई थी, लेकिन भाजपा नेतृत्व ने चुनावी मजबूरी बताते हुए फैसला लागू कर दिया। यही कारण है कि अब ये दोनों नेता सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जता रहे हैं।

मांझी और कुशवाहा का जनाधार क्यों अहम

बिहार की राजनीति में मांझी और कुशवाहा दोनों का वोट बैंक भले ही सीमित हो, लेकिन यह अत्यंत निर्णायक साबित होता है। मांझी महादलित समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि कुशवाहा पिछड़े वर्ग (कोइरी-कोशिक) समुदाय के बड़े नेता हैं। दोनों का प्रभाव कई सीटों पर निर्णायक होता है।
राजनीतिक तौर पर देखें तो अगर ये दोनों नेता नाराज होकर निष्क्रिय हो जाते हैं, तो एनडीए को कई सीटों पर नुकसान झेलना पड़ सकता है।

अब भाजपा और एनडीए नेतृत्व की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कैसे इस नाराजगी को शांत किया जाए। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा नेतृत्व मांझी और कुशवाहा दोनों से संवाद बनाए हुए है। पार्टी का प्रयास है कि इन्हें प्रचार अभियान में सक्रिय रखा जाए ताकि गठबंधन की एकजुटता का संदेश बना रहे।
हालांकि, अंदरखाने इस बात की चर्चा है कि चिराग पासवान और भाजपा के बीच का समीकरण इतना मजबूत है कि अन्य सहयोगी अपने को ‘कमतर’ महसूस कर रहे हैं।

महागठबंधन पर पड़ेगा असर?

एनडीए के अंदरूनी असंतोष से महागठबंधन को जरूर मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल सकती है। महागठबंधन के नेताओं ने इसे तुरंत भुनाना शुरू कर दिया है। राजद प्रवक्ता ने कहा कि “एनडीए का यह सीट बंटवारा असमानता और अहंकार का प्रतीक है। जिन नेताओं ने भाजपा का साथ दिया, उन्हें अपमानित किया गया है।” जाहिर है, विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगा।

अब सबकी निगाहें भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर हैं कि वह इस बढ़ते असंतोष को कैसे संभालता है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया तो यह नाराजगी आगामी विधानसभा चुनावों में एनडीए के लिए भारी पड़ सकती है। राजनीति में संतुलन और सम्मान ही गठबंधन की रीढ़ होती है, और फिलहाल बिहार एनडीए के भीतर यही संतुलन डगमगाता दिखाई दे रहा है।

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Author: Vaibhav tiwari

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