वाराणसी: सरकार द्वारा किसानों को निर्धारित दर पर रासायनिक खाद उपलब्ध कराने की घोषणा की खाद विक्रेताओं ने हवा निकाल दी है। स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रभावी नियंत्रण नहीं किए जाने पर पकड़ीदयाल प्रखंड में खाद विक्रेता मनमाने दर पर खाद-बीज की बिक्री कर रहे हैं।
इस कारण खुलेआम किसानों का आर्थिक शोषण हो रहा है। इस कारण किसानों में आक्रोश व्याप्त है। मालूम हो कि अक्टूबर माह के अंतिम सप्ताह में मोंथा चक्रवाती तूफान के दौरान हुई भारी बारिश से खेतों में पानी भर गया था। इस कारण रबी की खेती देर से शुरू हुई।
रबी की बोआई पूरे जोर-शोर :
अब जबकि रबी की बोआई पूरे जोर-शोर से चल रही है तो किसानों को गेहूं, मक्का सहित अन्य फसलों के लिए डीएपी, पोटाश, यूरिया एवं मिक्सचर खाद की आवश्यकता है।इस बीच बाजार में उर्वरकों की कीमत आसमान छू रही है।
बड़कागांव के किसान अखिलेंद्र कुमार सिंह, श्रीपुर नवादा के रूपेश महतो और चोरमा के मोहन प्रसाद निराला ने बताया कि सरकार द्वारा निर्धारित 1350 रुपये प्रति बोरी डीएपी खाद खुले बाजार में 1700 रुपये तक बिक रही है। इसी तरह 1800 रुपये प्रति बोरी पोटाश खाद 1850 से 1900 रुपये में तथा 266 रुपये प्रति बोरी यूरिया 325 से 350 रुपये तक बेची जा रही है।
किसानों को महंगी कीमत चुकानी पड़ रही:
तैयार खेतों में खाद डालने के लिए किसानों को महंगी कीमत चुकानी पड़ रही। इस कारण उनकी लागत लगातार बढ़ती जा रही है। मालूम हो कि अनुज्ञप्तिधारी खाद विक्रेताओं को सरकार द्वारा निर्धारित दर पर ही खाद-बीज की बिक्री करने का सख्त निर्देश है।
इस हिदायत का विक्रेताओं पर कोई खास असर दिखाई नहीं पड़ रहा है। जब किसान निर्धारित दर पर खाद देने की बात करते हैं तो विक्रेता खुलेआम यह कहकर टाल देते हैं कि थोक विक्रेता ही अधिक कीमत पर खाद उपलब्ध कराते हैं।
अधिक कीमत वसूलने की मजबूरी:
थोक मंडी से खाद लाने में ट्रक भाड़ा, लोडिंग-अनलोडिंग का खर्च अलग से वहन करने के कारण उन्हें मजबूरन अधिक कीमत लेनी पड़ती है।
विक्रेताओं ने कहा कि थोक विक्रेता को डोर स्टेप डिलीवरी के तर्ज पर खुदरा विक्रेता के गोदाम तक खाद पहुंचाने का प्राविधान है। लेकिन थोक विक्रेता ऐसा नहीं कर रहे हैं। लोगों ने मामले की जांच कर दोषी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
निष्कर्ष:
सरकार द्वारा निर्धारित दरों के बावजूद पकड़ीदयाल क्षेत्र में खाद विक्रेताओं द्वारा मनमानी कीमत वसूलना किसानों के लिए बड़ी समस्या बन गया है। रबी सीजन में बढ़ी हुई खाद की मांग और विक्रेताओं की मुनाफाखोरी के कारण किसानों की लागत लगातार बढ़ रही है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पर सीधा असर पड़ रहा है। स्थानीय प्रशासन की निगरानी की कमी और थोक से खुदरा तक बढ़े हुए खर्च को बहाना बनाकर खुली लूट का सिलसिला जारी है। यह स्थिति साफ दर्शाती है कि खाद आपूर्ति श्रृंखला में पारदर्शिता और कड़े नियंत्रण की जरूरत है, ताकि किसानों को राहत मिल सके और उनकी फसल लागत कम हो।



