Onion Price: रसोई में रोजाना इस्तेमाल होने वाला प्याज एक बार फिर आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने लगा है। पिछले एक साल में इसकी खुदरा कीमतें लगभग दोगुनी हो चुकी हैं, और यह दावा किसी अनुमान पर नहीं बल्कि सरकार के उपभोक्ता मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित है। थोक बाजार की तस्वीर तो इससे भी ज्यादा चिंताजनक है, जहां प्याज की कीमतों में करीब 135 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और रांची जैसे प्रमुख शहरों में प्याज के दाम बीते एक साल में दोगुने के करीब पहुंच गए हैं। बीते दो महीनों में यह तेजी और तेज हुई है, जबकि उससे पहले करीब दस महीने तक बाजार अपेक्षाकृत स्थिर रहा था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर हर साल सितंबर-अक्टूबर के आसपास प्याज के दाम क्यों बढ़ जाते हैं, इसके पीछे कौन से कारण जिम्मेदार हैं, और आम उपभोक्ताओं को राहत मिलने में अभी और कितना वक्त लग सकता है।
एक साल में कितनी बढ़ी प्याज की कीमत
आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर साफ हो जाती है कि प्याज की महंगाई किसी अस्थायी उतार-चढ़ाव तक सीमित नहीं रही है। थोक बाजार में 21 सितंबर को प्याज 4615.98 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिका, जबकि ठीक एक साल पहले यही कीमत महज 3299.85 रुपये प्रति क्विंटल थी। इस तरह थोक स्तर पर प्याज की कीमतों में करीब 135 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो खुदरा बाजार की तुलना में कहीं ज्यादा है। खुदरा बाजार की बात करें तो एक महीने पहले औसत कीमत 40.79 रुपये प्रति किलो थी, जो 21 सितंबर 2026 को बढ़कर 54.23 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। यह उछाल बीते दो महीनों के भीतर आया है, जबकि इससे पहले करीब दस महीने तक कीमतें काफी हद तक स्थिर बनी रही थीं।
महानगरों में प्याज की कीमतों का हाल
देश के अलग-अलग महानगरों में प्याज की कीमतों का ट्रेंड लगभग एक जैसा ही नजर आ रहा है। दिल्ली में प्याज एक साल पहले 32 रुपये प्रति किलो के भाव पर मिल रहा था, जो अब बढ़कर 53 रुपये किलो हो गया है। मुंबई में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है, जहां दाम 30 रुपये से बढ़कर सीधे 58 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। चेन्नई में प्याज की कीमतों ने और तेज छलांग लगाई है, यहां दाम 30 रुपये से बढ़कर 60 रुपये प्रति किलो हो चुके हैं। रांची में भी उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिली है, जहां प्याज 25 रुपये से उछलकर 57 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गया है। इन आंकड़ों से साफ है कि यह बढ़ोतरी किसी एक शहर या क्षेत्र तक सीमित नहीं बल्कि पूरे देश में एक जैसे पैटर्न में देखी जा रही है।
क्यों महंगा हुआ प्याज, जानें असली वजह
प्याज की कीमतों में इस बड़े उछाल के पीछे कई कारण एक साथ जिम्मेदार माने जा रहे हैं। सबसे बड़ी वजह महाराष्ट्र में गर्मियों के सीजन की प्याज फसल को मार्च महीने में हुई बेमौसम बारिश से पहुंचा नुकसान है, जिसने उत्पादन पर सीधा असर डाला। इसके अलावा केंद्रीय एजेंसियों के पास मौजूद स्टॉक में भी करीब 30 प्रतिशत प्याज खराब हो गया, जिससे बाजार में उपलब्ध आपूर्ति और सीमित हो गई। दूसरी तरफ विदेशी बाजारों में भारतीय प्याज की मांग कमजोर बनी हुई है, जबकि बांग्लादेश में उत्पादन बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा भी कड़ी हो गई है। इन सभी कारणों ने मिलकर घरेलू बाजार में प्याज की उपलब्धता और कीमतों पर सीधा असर डाला है।
क्या जल्द मिलेगी कीमतों से राहत
फिलहाल प्याज की कीमतों में बहुत बड़ी तेजी आने की संभावना कम ही नजर आ रही है। पिछले करीब एक हफ्ते से प्याज के भाव लगभग स्थिर बने हुए हैं और बड़े उतार-चढ़ाव से बचे हुए हैं। इस समय अच्छी गुणवत्ता वाले प्याज की सबसे ज्यादा मांग बीज कंपनियों की तरफ से आ रही है, जो अगली फसल की तैयारी के लिए प्याज की खरीद कर रही हैं। जानकारों का मानना है कि एक बार इन कंपनियों की खरीद प्रक्रिया पूरी हो जाए, तो प्याज के दाम में 5 से 10 रुपये प्रति किलो तक की कमी देखने को मिल सकती है। हालांकि यह राहत सीमित ही रहने की उम्मीद है, और आम उपभोक्ताओं को बड़ी राहत के लिए अभी और इंतजार करना पड़ सकता है।
हर साल क्यों बढ़ते हैं प्याज के दाम
प्याज की कीमतों में साल के कुछ खास महीनों में तेजी देखने को मिलना कोई नई बात नहीं है, और इसके पीछे मुख्य वजह फसल चक्र और मंडियों में आवक का पैटर्न है। रबी सीजन की प्याज की फसल मुख्य रूप से मार्च-अप्रैल के महीनों से बाजार में आनी शुरू होती है, और इसी फसल का बड़े पैमाने पर भंडारण भी किया जाता है। इसके बाद खरीफ सीजन की नई फसल के बाजार में आने तक उपभोक्ताओं और व्यापारियों को काफी हद तक इसी पुराने स्टॉक पर निर्भर रहना पड़ता है। जैसे-जैसे यह भंडारित स्टॉक कम होता जाता है, वैसे-वैसे बाजार में आपूर्ति की स्थिति पर दबाव बढ़ने लगता है, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ता है।
अगस्त से जनवरी तक क्यों रहती है सप्लाई पर नजर
अगस्त से जनवरी के बीच का समय प्याज बाजार के लिहाज से सबसे संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान रबी प्याज का स्टॉक धीरे-धीरे घटता जाता है। इस अवधि में कई मंडियों में प्याज की आवक अपेक्षाकृत कम रह सकती है, जिससे मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर बढ़ने लगता है। यही अंतर कीमतों पर दबाव बनाने का मुख्य कारण बनता है, और यही वजह है कि सितंबर-अक्टूबर के महीनों में प्याज के दाम अक्सर ऊपर की तरफ बढ़ते नजर आते हैं। व्यापारी और किसान दोनों ही इस अवधि के दौरान बाजार की चाल पर बारीकी से नजर बनाए रखते हैं, ताकि आपूर्ति में किसी भी बड़े बदलाव का अंदाजा पहले से लगाया जा सके।
खरीफ फसल आने पर मिल सकती है बड़ी राहत
बाजार जानकारों के अनुसार असली राहत तभी मिलने की उम्मीद है, जब खरीफ सीजन की नई प्याज फसल मंडियों में बड़े पैमाने पर आनी शुरू होगी। नई फसल की आवक बढ़ने के साथ ही मंडियों में प्याज की उपलब्धता बेहतर होती है, जिससे मौजूदा आपूर्ति संकट कम होने की संभावना बनती है। पर्याप्त मात्रा में आवक बने रहने पर कीमतों पर बना दबाव धीरे-धीरे कम हो सकता है। हालांकि इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि मौसम की स्थिति, कुल उत्पादन, भंडारण के दौरान होने वाला नुकसान, मंडी तक आवक, परिवहन लागत और स्थानीय स्तर पर मांग जैसे कई अन्य कारक भी प्याज की अंतिम कीमत तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो प्याज की मौजूदा महंगाई केवल एक अस्थायी झटका नहीं, बल्कि उत्पादन में कमी, भंडारण के नुकसान और निर्यात बाजार में बदलती परिस्थितियों का मिलाजुला असर है। आम उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल बड़ी राहत की उम्मीद कम है, हालांकि बीज कंपनियों की खरीद पूरी होने के बाद मामूली गिरावट संभव है। असली राहत खरीफ फसल की आवक बढ़ने के साथ ही मिलने की उम्मीद है, लेकिन इसके लिए अभी कुछ महीनों का इंतजार करना होगा। तब तक मौसम, भंडारण और मंडी आवक जैसे कारक ही यह तय करेंगे कि प्याज की थाली से रसोई में और कितने आंसू निकलते हैं।
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Sanjana Gupta
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