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UP News: यूपी में पशुओं की डिजिटल निगरानी की तैयारी, QR कोड से तय होगी पशुपालकों की जिम्मेदारी, जानें कब से शुरू होगा पंजीकरण?

UP News: उत्तर प्रदेश में पशुपालन विभाग पशुओं की पहचान को डिजिटल बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। गाय-भैंस जैसे पशुओं के कान में लगे टैग पर QR कोड स्कैन करने से उनके मालिक का पूरा ब्योरा सामने आ सकेगा। इससे सड़कों पर खुले घूमने वाले पशुओं से होने वाले हादसों और खेतों में फसल बर्बादी की समस्या पर काबू पाने में मदद मिलने की उम्मीद है। नेशनल डिजिटल लाइवस्टॉक मिशन के तहत भारत पशुधन एप पर पंजीकरण की प्रक्रिया एक नवंबर से शुरू होने वाली है।

अभी तक पशुओं की पहचान उनके रंग, नस्ल या शारीरिक लक्षणों पर निर्भर करती थी, जो कई बार भ्रामक साबित होती थी। नई व्यवस्था में हर पंजीकृत पशु के कान में इयर टैग लगा होगा, जिसमें QR कोड मौजूद रहेगा। इस कोड को मोबाइल से स्कैन करते ही पशु और उसके पंजीकृत मालिक की जानकारी तुरंत उपलब्ध हो जाएगी। पशुपालन विभाग का कहना है कि दूध निकालने के बाद पशुओं को सड़क पर छोड़ देने की आदत पर अंकुश लगाने और जिम्मेदारी तय करने में यह कदम कारगर साबित हो सकता है।

QR कोड स्कैन करने पर क्या जानकारी मिलेगी?

भारत पशुधन एप पर पंजीकरण पूरा होने के बाद पशु के कान में लगा टैग स्कैन करने पर पशु की पहचान के साथ-साथ उसके मालिक का नाम, पता और अन्य जरूरी ब्योरा सामने आएगा। इससे गांव या शहर में खुले में घूमते मिले किसी भी पशु के मालिक का पता लगाना आसान हो जाएगा। विभाग का मानना है कि इससे लावारिस गोवंशों से जुड़े विवाद कम होंगे। ग्राम पंचायतों को पशुओं की खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड भी डिजिटल रूप से सुरक्षित रखने को कहा गया है।

पंजीकरण की प्रक्रिया कब और कैसे शुरू होगी?

दी गई जानकारी के अनुसार, भारत पशुधन एप पर पशुओं के पंजीकरण की प्रक्रिया एक नवंबर से शुरू होने वाली है। पंजीकरण के बाद ही इयर टैग लगाया जाएगा। योजना को गांव से लेकर जिला स्तर तक लागू करने की व्यवस्था बनाई जा रही है। ग्राम स्तर पर पंचायत सहायक, ब्लॉक स्तर पर पशु चिकित्सा अधिकारी और तहसील स्तर पर एसडीएम की देखरेख में निगरानी की जाएगी। मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. शांति प्रकाश द्विवेदी के अनुसार, पशु खुले में घूमता मिला तो उसके टैग से मालिक की जानकारी जुटाकर नियमानुसार कार्रवाई की जा सकेगी।

खुले में घूमते पशुओं और फसल बर्बादी पर कैसे लगेगी रोक?

सड़कों पर अचानक पशु आ जाने से होने वाले हादसे और खेतों में खड़ी फसल को नुकसान पहुंचाना बेसहारा गोवंशों से जुड़ी आम समस्याएं हैं। कई पशुपालक दूध निकालने के बाद पशुओं को खुला छोड़ देते हैं। नई व्यवस्था के तहत पहचान साफ होने से ऐसे मामलों में मालिक की जिम्मेदारी तय करना आसान हो जाएगा। हालांकि, इसका असली असर निगरानी और नियमों के सख्त पालन पर निर्भर करेगा। विभाग का लक्ष्य है कि पशुओं का रिकॉर्ड डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रखने से खरीद-बिक्री और निगरानी दोनों बेहतर हों।

पशुपालकों को योजना से क्या फायदा मिलेगा?

गोवंश संरक्षण के लिए सहभागिता योजना भी चल रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, संबंधित जिले में 2,230 गोवंश पशुपालकों को सौंपे गए हैं। प्रत्येक गोवंश के चारा-पानी के लिए पशुपालक को हर महीने 1,500 रुपये दिए जाते हैं। भुगतान से पहले ब्लॉक और नगर निकाय की टीमें पशुओं का सत्यापन करती हैं। जिले में आठ गोशालाएं हैं, जहां 760 पशु संरक्षित हैं। कुल गोवंशों की संख्या 1,65,244 और महिषवंशों की संख्या 1,70,211 बताई गई है। डिजिटल पंजीकरण से इन योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ने की भी उम्मीद है।

निगरानी की व्यवस्था कैसी रहेगी?

योजना को जमीन पर उतारने के लिए गांव, ब्लॉक, तहसील और जिला स्तर पर अलग-अलग जिम्मेदारियां तय की गई हैं। ग्राम पंचायतों को पशुओं की खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना होगा। कोई भी पशु खुले में घूमता मिला तो उसके QR कोड से मालिक का पता लगाकर कार्रवाई हो सकेगी। विभाग का दावा है कि इससे न सिर्फ हादसे कम होंगे, बल्कि फसलों को होने वाला नुकसान भी घटेगा। पशुपालक और किसान दोनों के हित में यह कदम उठाया जा रहा है।

पशुपालन विभाग की यह पहल नेशनल डिजिटल लाइवस्टॉक मिशन का हिस्सा है। अगर पंजीकरण और टैगिंग समय पर पूरी हुई तो आने वाले समय में सड़कों और खेतों में खुले पशुओं की समस्या पर नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है। फिलहाल, पशुपालकों और स्थानीय प्रशासन को तैयार रहने की सलाह दी जा रही है ताकि एक नवंबर से शुरू होने वाली प्रक्रिया सुचारू रूप से चले।

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Netsha Singh
Author: Netsha Singh

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