गरीबी घटी है, लेकिन रोजगार और भविष्य की चिंता अभी भी क्यों बनी हुई है?
By Sanjna Gupta | News Media Kiran
प्रकाशित: · 6 मिनट में पढ़ें
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1 घंटे पहले
Poverty Reduction in India
Poverty Reduction in India: विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट में भारत की तरक्की साफ नजर आती है। 2011 से 2023 के बीच अत्यधिक गरीबी (रोजाना 3 डॉलर) 27.1 प्रतिशत से घटकर सिर्फ 2.6 प्रतिशत रह गई। वहीं 4.20 डॉलर वाली रेखा पर गरीबी 57.7 प्रतिशत से 16.1 प्रतिशत पर आ गई और करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर निकल आए। यह दुनिया की सबसे तेज गिरावटों में से एक मानी जा रही है। खपत बढ़ने, खासकर महिलाओं के रोजगार में इजाफा और फूड सब्सिडी जैसी योजनाओं ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई।
फिर भी सड़क, गांव और युवाओं की बातचीत में चिंता कम नहीं हुई है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि कितने लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। असली बात यह है कि जो ऊपर आए हैं उनके पास कितनी स्थिर और अच्छी कमाई वाली नौकरी है। रोजगार की क्वालिटी, युवाओं की बेरोजगारी, AI का असर और बुजुर्ग आबादी की बढ़ती संख्या ऐसी चुनौतियां हैं जो गरीबी के आंकड़ों के पीछे छिपी हुई हैं।
विश्व बैंक के आंकड़े गरीबी में कमी को कैसे दिखाते हैं?
विश्व बैंक के मुताबिक 2017 से 2023 के बीच रोजगार में करीब 13.4 करोड़ की बढ़ोतरी हुई, जो वर्किंग एज पॉपुलेशन की ग्रोथ से लगभग दोगुनी है। इसमें ग्रामीण महिलाओं का हिस्सा काफी बड़ा रहा। मल्टीडायमेंशनल गरीबी भी घटी। ऑक्सफोर्ड के सूचकांक के हिसाब से यह 2005-06 में 53.8 प्रतिशत से 2019-21 में 16.4 प्रतिशत पर आ गई। विश्व बैंक के अपने आंकड़ों में 2022-23 में यह 15.5 प्रतिशत रही।
रिपोर्ट आगे भी गिरावट का अनुमान लगाती है। 4.20 डॉलर वाली रेखा पर गरीबी 2026 में 14.2 प्रतिशत से 2028 तक 12.1 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। लेकिन यह सिर्फ अनुमान है और लेबर मार्केट के नए आंकड़ों के साथ बदल सकता है। गरीबी अभी भी उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक के इलाके में ज्यादा है, जहां देश के गरीबों का करीब 57 प्रतिशत हिस्सा रहता है। गांवों में दर शहरों से काफी ज्यादा है।
रोजगार बढ़ा तो भी चिंता क्यों बनी हुई है?
नौकरियां बढ़ी हैं, लेकिन उनकी क्वालिटी पर सवाल उठते हैं। विश्व बैंक कहता है कि असली कमाई में कोई खास सुधार नहीं हुआ। कई नए रोजगार कम प्रोडक्टिविटी वाले कामों में आए खेती, स्वरोजगार या अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर। युवाओं में बेरोजगारी की दर चिंता का विषय है। हाल के आंकड़ों में 15-29 साल के युवाओं में यह करीब 15 प्रतिशत के आसपास रही है, जो कुल बेरोजगारी दर से कहीं ज्यादा है। खासकर ग्रामीण युवा महिलाओं और ग्रेजुएट्स में समस्या ज्यादा गंभीर है।
कई रिपोर्टें बताती हैं कि स्नातकों का बड़ा हिस्सा नौकरी ढूंढ रहा है, लेकिन स्टेबल और अच्छी सैलरी वाली नौकरियां कम मिल रही हैं। कुछ अनुमानों के मुताबिक 15-25 साल के ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। खेती में वापसी भी देखने को मिली है, जो सामान्य ट्रेंड के उलट है। इनकम असमानता भी बनी हुई है टॉप 10 प्रतिशत वर्कर्स की औसत कमाई निचले 10 प्रतिशत से लगभग 13 गुना ज्यादा है। जब नौकरी मिल भी जाती है तो वो सिक्योरिटी और अच्छे पैसे कम देती है, तो गरीबी रेखा पार करना स्थायी राहत नहीं बनता।
AI और ऑटोमेशन युवाओं के भविष्य को कैसे प्रभावित कर रहे हैं?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन नई मुश्किलें जोड़ रहे हैं। कई स्टडीज बताती हैं कि मिडिल स्किल वाली नौकरियां खतरे में हैं। आईटी और संबंधित सेक्टर में कुछ कंपनियों में हायरिंग घटी है या कटौती हुई है। युवा पहले से ही अच्छी नौकरियों की कमी से जूझ रहे हैं। अगर AI एंट्री लेवल की व्हाइट कॉलर नौकरियों को प्रभावित करता है, तो स्किल गैप और बढ़ सकता है।
भारत को हर साल लाखों गैर-कृषि नौकरियां पैदा करनी होंगी सिर्फ वर्कफोर्स को सही तरीके से एब्जॉर्ब करने के लिए। AI अवसर भी पैदा कर सकता है डेटा से जुड़े काम, वर्कफ्लो डिजाइन, केयर इकोनॉमी में रोजगार लेकिन इसके लिए टारगेटेड स्किलिंग और एजुकेशन सिस्टम में बदलाव जरूरी है। बिना इसके डेमोग्राफिक डिविडेंड इकोनॉमिक डिविडेंड में नहीं बदल पाएगा।
बढ़ती बुजुर्ग आबादी नई चुनौती क्यों बन रही है?
जनसंख्या का बदलाव दो तरफ से हो रहा है। युवा आबादी का हिस्सा अभी ऊंचा है, लेकिन यह विंडो ज्यादा दिनों तक नहीं खुली रहेगी। अनुमानों के अनुसार 60 साल से ऊपर की आबादी 2011 में करीब 10 करोड़ से 2036 तक लगभग 23 करोड़ हो जाएगी, जो कुल आबादी का करीब 15 प्रतिशत होगा। दक्षिणी राज्यों और कुछ अन्य जगहों पर यह अनुपात और ज्यादा है।
इसका मतलब हेल्थ सर्विसेज, पेंशन, केयर इकोनॉमी और सोशल सिक्योरिटी पर प्रेशर बढ़ेगा। कई बुजुर्गों के पास पर्याप्त पेंशन नहीं है। युवाओं को अच्छे रोजगार देना इसलिए और जरूरी हो जाता है, ताकि वे बुजुर्ग आबादी का सहारा बन सकें। अगर युवा बेरोजगार या कम कमाई वाले काम में फंसे रहें, तो देखभाल का बोझ परिवारों पर और बढ़ जाएगा।
आगे का रास्ता क्या हो सकता है?
गरीबी में कमी असली और महत्वपूर्ण है। लेकिन इसे लंबे समय तक बनाए रखने के लिए रोजगार की क्वालिटी पर फोकस करना होगा। प्रोडक्टिव गैर-कृषि नौकरियां, खासकर मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, लॉजिस्टिक्स और सर्विसेज में बढ़ोतरी जरूरी है। AI को खतरा नहीं, बल्कि हेल्पफुल बनाने के लिए स्किलिंग प्रोग्राम्स को इंडस्ट्री की जरूरत से जोड़ना होगा। बुजुर्ग आबादी के लिए हेल्थ, पेंशन और केयर सर्विसेज का विस्तार करना होगा।
क्षेत्रीय असमानता कम करने के लिए उन राज्यों पर खास ध्यान देना होगा जहां गरीबी अभी भी ज्यादा है। सोशल सिक्योरिटी का विस्तार, फॉर्मल रोजगार को बढ़ावा और स्किल्स में निवेश ही आगे की राह है। विश्व बैंक के आंकड़े उपलब्धि बताते हैं, लेकिन वे यह भी याद दिलाते हैं कि गरीबी रेखा पार करना सिर्फ शुरुआत है। असली चुनौती स्थिर इनकम, सम्मानजनक काम और भविष्य के लिए तैयार आबादी बनाने की है।
Sanjana Gupta Hindi Content Writer | New Media Kiran Sanjana Gupta is a Hindi Content Writer at New Media Kiran, creating accurate, engaging, and reader-friendly news and web content for digital platforms. She specializes in well-researched Hindi articles that keep audiences informed and interested.
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