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JPSC Civil Service: न नौकरी मिली, न रिजल्ट आया! JPSC की धीमी रफ्तार से रिटायरमेंट के करीब पहुंचे अभ्यर्थी

JPSC Civil Service: झारखंड लोक सेवा आयोग यानी जेपीएससी की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। राज्य में सरकारी नियुक्तियों के नाम पर चल रही खानापूर्ति ने हजारों युवाओं और कार्यरत कर्मियों के भविष्य को अधर में लटका दिया है। एक ऐसी ही बानगी छठी सीमित उपसमाहर्ता परीक्षा है, जिसका विज्ञापन साल 2018 में निकला था। आवेदन के वक्त जिन अभ्यर्थियों की उम्र 45 साल थी, वे आज 56 साल के हो चुके हैं। हैरानी की बात यह है कि परीक्षा के सालों बाद भी न तो रिजल्ट जारी हुआ है और न ही आगे की प्रक्रिया पूरी हो सकी है।

नियुक्ति की इस लंबी और थका देने वाली प्रक्रिया का आलम यह है कि कई अभ्यर्थी अपनी सेवा के अंतिम पड़ाव यानी रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुके हैं। साल 2026 में लिखित परीक्षा और मॉडल आंसर की जारी करने के बाद आयोग ने जैसे चुप्पी साध ली है। प्रशासनिक गलियारों में इसे लेकर भारी नाराजगी है। राज्य के विभिन्न विभागों में लंबित नियुक्तियों का आंकड़ा 1700 के पार पहुंच गया है, जिससे न केवल योग्य युवाओं का मनोबल टूटा है बल्कि प्रशासनिक कामकाज पर भी असर पड़ रहा है।

JPSC Civil Service: उम्र का गणित और फाइलों में कैद रिजल्ट

वर्ष 2018 में जब छठी सीमित उपसमाहर्ता के 28 पदों के लिए विज्ञापन जारी हुआ, तब अधिकतम उम्र सीमा 45 वर्ष तय की गई थी। उस वक्त आवेदन करने वाले सरकारी कर्मियों ने उम्मीद जताई थी कि समय पर परीक्षा होगी और वे अपनी सेवा में बेहतर योगदान दे पाएंगे। लेकिन, प्रशासनिक लापरवाही और आयोग की धीमी गति ने इस सपने को फाइलों में कैद कर दिया। आज जब वे अभ्यर्थी 56 साल के हो चुके हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि रिजल्ट आता भी है, तो उनके पास सेवा देने के लिए केवल चार साल का वक्त बचेगा।

आयोग की ओर से जनवरी 2026 में लिखित परीक्षा ली गई और फरवरी में मॉडल आंसर की जारी की गई। इसके बाद रिजल्ट का इंतजार और इंटरव्यू की औपचारिकताएं अभी भी अधूरी हैं। आवेदकों का कहना है कि यह केवल एक परीक्षा का रिजल्ट नहीं, बल्कि उनके करियर के सुनहरे वर्षों का नुकसान है। एक ओर सरकार नियुक्तियों का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर जेपीएससी की ये लचर व्यवस्था दावों की हकीकत बयां कर रही है।

सिर्फ उपसमाहर्ता ही नहीं, कई महत्वपूर्ण पद खाली

जेपीएससी की सुस्ती केवल उपसमाहर्ता परीक्षा तक सीमित नहीं है। राज्य के विश्वविद्यालयों से लेकर चिकित्सा संस्थानों तक में नियुक्तियां लंबे समय से फंसी हुई हैं। साल 2022 में होम्योपैथिक, यूनानी और आयुर्वेदिक चिकित्सा अधिकारियों के कुल 422 पदों के लिए विज्ञापन निकाले गए थे, लेकिन आज तक ये भर्तियां पूरी नहीं हो सकी हैं। इसी तरह विश्वविद्यालय शिक्षकों और गैर शैक्षणिक अधिकारियों की नियुक्ति का मामला भी 2018 से ही पेंडिंग पड़ा है।

इसके अलावा ड्रग इंस्पेक्टर, विधि विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक, सहायक वन संरक्षक और सिविल जज जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी नियुक्तियां ठप पड़ी हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि असिस्टेंट प्रोफेसर से लेकर प्रोजेक्ट मैनेजर तक के करीब दो दर्जन से अधिक परीक्षाएं फिलहाल आयोग की फाइलों में धूल फांक रही हैं। पॉलीटेक्निक व्याख्याता और इंजीनियरिंग कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर जैसे तकनीकी पदों पर भी भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद अंतिम परिणाम का इंतजार बना हुआ है।

JPSC Civil Service: प्रशासनिक चिंताएं और आगे की चुनौतियां

लंबित नियुक्तियों का असर सीधा राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ रहा है। सेवानिवृत्ति के कारण खाली हो रहे पदों को समय पर नहीं भरा जा रहा है, जिससे काम का बोझ उन लोगों पर आ रहा है जो अभी सेवा में हैं। शिक्षाविदों और प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि जब तक चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता नहीं आएगी, तब तक राज्य का विकास प्रभावित होता रहेगा। अभ्यर्थी अब सोशल मीडिया के जरिए अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं और जल्द से जल्द परिणाम जारी करने की मांग कर रहे हैं।

झारखंड की नियुक्ति व्यवस्था के सामने आज यह सबसे बड़ी चुनौती है कि वह युवाओं के विश्वास को कैसे कायम रखे। आयोग की कार्यप्रणाली में सुधार और लंबित परीक्षाओं को मिशन मोड में पूरा करना अब समय की मांग बन गई है। यदि सरकार और आयोग ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में राज्य के युवाओं का भरोसा और कम हो जाएगा, जिसका सीधा असर भविष्य की प्रतिभाओं पर पड़ेगा। यह देखना बाकी है कि प्रशासन इन लंबित मामलों पर कब तक कोई सकारात्मक फैसला लेता है।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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