Jharkhand Student Protest: पिछले कुछ हफ्तों में भारत की सियासत में एक ऐसा पैटर्न दिखा है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया है। एक के बाद एक आंदोलन खड़ा हुआ, और हर बार सरकार को झुकना पड़ा। पहले छात्रों के दबाव में केंद्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा, फिर मध्य प्रदेश में किसानों के सामने सरकार को नीति बदलनी पड़ी। सवाल यह उठता है कि आखिर यह सिलसिला महज इत्तेफाक है, या इसके पीछे कोई गहरी वजह छिपी है।
मामला कुछ इस तरह से है कि झारखंड में 24 दिन के आंदोलन और 16 दिनों की भूख हड़ताल के बाद हेमंत सोरेन सरकार को आधा दर्जन से ज्यादा परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं। महाराष्ट्र में भी मराठा आरक्षण की मांग को लेकर सरकार को झुकना पड़ा। यह पूरी कड़ी बताती है कि देश की सड़कों पर कुछ बड़ा बदल रहा है।
Jharkhand Student Protest: झारखंड में 16 दिन की भूख हड़ताल और बड़ी जीत
झारखंड में यह आंदोलन 2 जुलाई 2026 को शुरू हुआ था, जब छात्रों ने JSSC-CGL परीक्षा में कथित गड़बड़ियों को लेकर विरोध जताना शुरू किया। धीरे-धीरे यह आंदोलन थमने के बजाय और तेज होता चला गया। देवेंद्र नाथ महतो, उम्मे हबीबा और राहुल क्रांति जैसे छात्र नेता अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए।
महतो ने रांची के सदर अस्पताल में लगातार 16 दिनों तक भूख हड़ताल जारी रखी। उनकी हालत बिगड़ने लगी, लेकिन वे डटे रहे। आखिरकार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को विशेष कैबिनेट बैठक बुलानी पड़ी, जिसमें JSSC-CGL परीक्षा पूरी तरह रद्द करने के साथ-साथ 2014 से अब तक की सभी परीक्षाओं की CID जांच का फैसला लिया गया।
महतो ने इस फैसले को झारखंड की बड़ी जीत बताया, हालांकि कुछ छात्र नेता अब भी संतुष्ट नहीं हैं। एक छात्र नेता पियूष कुमार का कहना है कि CBI जांच की मांग अभी भी लंबित है, यानी लड़ाई पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
CJP आंदोलन: 36 दिन में शिक्षा मंत्री का इस्तीफा
NEET-UG 2026 की मेडिकल एंट्रेंस परीक्षा में पेपर लीक के आरोपों ने देशभर में हड़कंप मचा दिया था। इसका असर 23 लाख से ज्यादा छात्रों पर पड़ा, और कई छात्रों ने इस दबाव में आत्महत्या तक कर ली। यही आक्रोश आगे चलकर एक बड़े आंदोलन में बदल गया।
सोशल मीडिया पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी CJP नाम से एक व्यंग्यात्मक पार्टी बनाई गई, और 20 जुलाई 2026 को हजारों युवा दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च करने निकले। 36 दिनों तक चले इस आंदोलन के बाद केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह मोदी सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना गया।
मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी सरकारें झुकीं
मध्य प्रदेश में किसानों ने मूंग की खरीद बढ़ाने को लेकर भोपाल में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया। दबाव बढ़ने पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने खरीद सीमा 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दी, और उर्वरक ई-टोकन सिस्टम को भी निलंबित करना पड़ा।
महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे-पाटील ने 30 मई 2026 को अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। करीब 15 घंटे की बातचीत के बाद सरकार और आंदोलनकारियों के बीच 12 सूत्रीय प्रस्ताव पर सहमति बनी, जिसके बाद जरांगे ने अपना उपवास स्थगित कर दिया।
राजस्थान और किसानों की MSP लड़ाई अब भी जारी
राजस्थान में ग्रेड-III शिक्षकों के तबादले का मुद्दा लंबे समय से अटका हुआ है। फरवरी 2026 में विधानसभा में इस पर तीखी बहस भी हुई, लेकिन जुलाई 2026 में जारी हुए तबादला आदेश भी शिक्षकों की मांग को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सके।
वहीं दूसरी ओर, 17 अगस्त 2026 को पंजाब के किसान संगठनों के दिल्ली कूच की तैयारी के बीच हरियाणा पुलिस ने खनौरी बॉर्डर को सील कर दिया। किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल की अगुवाई में यह आंदोलन MSP की कानूनी गारंटी को लेकर अब भी जारी है, और तनाव की स्थिति बनी हुई है।
आखिर सरकारें आंदोलनों के आगे क्यों झुक रही हैं
जानकार बताते हैं कि यह पीछे हटने की लहर कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि इसके पीछे कई ठोस वजहें काम कर रही हैं। CJP आंदोलन के दौरान 20 जुलाई का मार्च एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ, जब पुलिस लाठीचार्ज का वीडियो वायरल हुआ और युवाओं में ‘डर खत्म हो गया’ जैसा भाव फैल गया।
विश्लेषक निलांजन मुखोपाध्याय के मुताबिक, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा दो दशकों से बनाए गए ‘ब्रांड मोदी’ के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। दिलचस्प बात यह भी है कि CJP के इंस्टाग्राम पर करीब 2.27 करोड़ फॉलोअर्स जुड़ गए, जबकि यह संख्या BJP के 96 लाख फॉलोअर्स से दोगुने से भी ज्यादा थी।
Jharkhand Student Protest: 2027 के चुनावों का दबाव भी है बड़ी वजह
आंदोलनों के समय का भी खास महत्व है। साल 2027 में पंजाब, गुजरात और उत्तर प्रदेश समेत सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में किसी भी सरकार के लिए चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर युवा और किसान असंतोष झेलना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा माना जा रहा है।
विपक्ष के लिए भी यह सरकार पर दबाव बनाने का बड़ा मौका बना। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने खुद झारखंड के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर CJP आंदोलन को समर्थन दिया, जिससे यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बन गया।
झारखंड से लेकर दिल्ली और महाराष्ट्र तक फैली यह आंदोलनों की श्रृंखला बताती है कि जनता के दबाव के आगे झुकना अब सरकारों के लिए मजबूरी बनता जा रहा है। छात्रों, किसानों और शिक्षकों की एकजुटता ने यह साबित किया है कि संगठित और लगातार दबाव नीतिगत फैसलों को बदलने की ताकत रखता है। हालांकि कई आंदोलन अभी भी अधूरे हैं, जैसे CBI जांच की मांग और किसानों की MSP गारंटी। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकारें इन बाकी मांगों पर क्या रुख अपनाती हैं। फिलहाल हर आंदोलन पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।
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