Teesta Bangladesh India: तीस्ता नदी को लेकर वर्षों से चली आ रही तनातनी के बीच अचानक एक ऐसा बयान सामने आया है, जिसने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। बांग्लादेश ने तीस्ता जल बंटवारे के विवाद पर अपने सुर पूरी तरह बदल दिए हैं। देश के जल संसाधन मंत्री ने साफ कहा है कि वे किसी भी सूरत में भारत के साथ अपने दोस्ताना संबंध खराब नहीं करना चाहते। सवाल यही उठता है कि आखिर इतने बरसों की खींचतान के बाद यह नरमी अचानक क्यों दिखाई गई।
मामला कुछ इस तरह से है कि यह बयान ऐसे वक्त पर आया है जब बांग्लादेश की नई सरकार तीस्ता विवाद का कोई ठोस हल तलाशने में जुटी हुई है। ऐसे में यह बयान सिर्फ औपचारिकता भर नहीं, बल्कि आगे की रणनीति का संकेत भी माना जा रहा है।
Teesta Bangladesh India: मंत्री ने क्या कहा भारत को लेकर
बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदउद्दीन चौधरी अनी ने ढाका में आयोजित एक सेमिनार के दौरान यह बयान दिया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे को लेकर चल रहे विवाद की वजह से भारत के साथ अपने रिश्तों को खराब होते हुए नहीं देखना चाहता।
उनका कहना था कि भारत को एक मित्र देश के तौर पर देखा जाता है, लेकिन दोस्ती का यह रिश्ता तभी मजबूत रह सकता है जब दोनों पक्ष एक-दूसरे के हितों का सम्मान करें। जानकार बताते हैं कि यह बयान कूटनीतिक तौर पर काफी सोच-समझकर दिया गया प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें न तो टकराव का लहजा है और न ही किसी तरह की सख्ती।
दोस्ती और हितों के बीच संतुलन की बात
अनी ने अपने बयान में यह भी जोड़ा कि पड़ोसी देश होने के नाते दोनों पक्षों को एक-दूसरे के हितों का ख्याल रखना जरूरी है। उनके मुताबिक, एक दोस्त को हमेशा दूसरे दोस्त के हितों की रक्षा करनी चाहिए, तभी रिश्ता लंबे समय तक टिक पाता है।
यहीं पर एक दिलचस्प पहलू सामने आता है। इतने वर्षों से अटके इस विवाद पर इतनी नरमी भरा बयान आना खुद इस बात का संकेत है कि बांग्लादेश अब बातचीत के जरिए ही समाधान निकालने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, न कि टकराव के रास्ते पर।
तीस्ता नदी परियोजना पर क्यों टिकी हैं उम्मीदें
बांग्लादेश इस वक्त तीस्ता नदी के व्यापक प्रबंधन और बहाली से जुड़ी एक बड़ी परियोजना पर भी काम कर रहा है, जिसमें चीन की तरफ से मदद की पेशकश की गई है। इस परियोजना का मकसद उत्तरी बांग्लादेश में बार-बार आने वाली बाढ़, नदी कटाव और सूखे के मौसम में पानी की किल्लत जैसी समस्याओं का हल निकालना है।
तीस्ता नदी उत्तरी बांग्लादेश के लोगों के लिए खेती और आजीविका का बड़ा सहारा मानी जाती है। यही वजह है कि कटाव और बाढ़ जैसी समस्याओं से जूझ रहे पांच से छह जिलों को इस परियोजना से खासी उम्मीदें हैं।
अगर परियोजना अटकी तो क्या होगा असर
मंत्री अनी ने इस बारे में साफ चेतावनी भी दी है। उनका कहना था कि अगर इस परियोजना को लागू करने में नाकामी हाथ लगती है, तो प्रभावित इलाकों के परिवारों की मुश्किलें और बढ़ती चली जाएंगी। उन्होंने इस चुनौती से हर हाल में पार पाने की जरूरत पर जोर दिया।
नदी को लेकर किसी समझौते की मांग करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि इसे चाहे तीस्ता संधि का नाम दिया जाए या तीस्ता मास्टर प्लान, बांग्लादेश इसे लागू करवाने की दिशा में लगातार आगे बढ़ता रहेगा।
दशकों पुराना है तीस्ता जल विवाद
तीस्ता नदी हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। भारत और बांग्लादेश के बीच इस नदी के जल बंटवारे को लेकर बातचीत का सिलसिला 1980 के दशक से ही चला आ रहा है।
1983 में हुए एक अंतरिम समझौते के तहत नदी के पानी का 39 प्रतिशत हिस्सा भारत को और 36 प्रतिशत हिस्सा बांग्लादेश को दिया गया था, जबकि बाकी 25 प्रतिशत हिस्सा बिना किसी बंटवारे के छोड़ दिया गया। इसके बाद भी बातचीत लगातार जारी रही, लेकिन दोनों पक्ष किसी स्थायी समझौते तक नहीं पहुंच सके।
Teesta Bangladesh India: 2011 का मसौदा क्यों अटक गया था
साल 2011 में एक अंतरिम समझौते का मसौदा भी तैयार किया गया था, जो लगभग अंतिम चरण तक पहुंच गया था। लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से राज्य में पानी की उपलब्धता को लेकर जताई गई चिंताओं के चलते उस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हो पाए।
इसके बाद से यह मुद्दा भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में एक संवेदनशील बिंदु बना रहा। ऐसे में मौजूदा नरम रुख को दोनों देशों के बीच फिर से भरोसे की डोर बुनने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
तीस्ता नदी सिर्फ दो देशों के बीच का जल विवाद भर नहीं, बल्कि लाखों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ा संवेदनशील मसला है। बांग्लादेश की तरफ से आया यह नरम बयान आने वाले समय में दोनों देशों के बीच बातचीत को नई दिशा दे सकता है। हालांकि पश्चिम बंगाल की चिंताओं को देखते हुए यह साफ है कि किसी भी अंतिम समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा। फिलहाल दोनों देशों के बीच आगे की बातचीत को लेकर उम्मीदें जरूर बढ़ी हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या यह नरमी किसी ठोस समझौते तक पहुंच पाती है या नहीं।
Read More Here:-


