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झारखंड में बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत, लेकिन कंपनियां सरकार से 5000 करोड़ वापस मांगने हाईकोर्ट जाएंगी

Jharkhand News: झारखंड की बिजली वितरण कंपनियां राज्य सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई की तैयारी में हैं। पिछले चार वर्षों में उपभोक्ताओं से वसूले गए लगभग 5,000 करोड़ रुपये के विद्युत शुल्क की वापसी के लिए ये कंपनियां हाईकोर्ट का रुख करेंगी। झारखंड हाईकोर्ट ने जनवरी 2026 में सरकार के 2021 संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिसमें बिजली ड्यूटी को यूनिट के बजाय नेट चार्जेस (बिल की कुल राशि) के प्रतिशत पर लगाने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि वसूला गया अतिरिक्त शुल्क उपभोक्ताओं को ब्याज सहित वापस किया जाए या उनके बिल में समायोजित किया जाए।

यह फैसला लाखों घरेलू और औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत है, लेकिन बिजली कंपनियां कह रही हैं कि उनके पास यह राशि नहीं है क्योंकि वे इसे सरकार को जमा कर चुकी हैं। अब कंपनियां सरकार से यह पैसा वापस मांग रही हैं, ताकि उपभोक्ताओं को रिफंड दे सकें। आइए जानते हैं इस पूरे मामले की पूरी कहानी और इसके प्रभाव।

हाईकोर्ट के फैसले की पृष्ठभूमि

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झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 5 जनवरी 2026 को दिए फैसले में बिहार विद्युत शुल्क अधिनियम 1948 में 2021 के संशोधन को अल्ट्रा वायर्स (अधिकार से बाहर) करार दिया। पहले यह शुल्क खपत की गई यूनिट पर लगता था, लेकिन 2021 में सरकार ने गजट नोटिफिकेशन से बदलाव किया और इसे नेट चार्जेस पर प्रतिशत आधारित कर दिया। घरेलू उपभोक्ताओं पर 6 प्रतिशत, 10 एमवीए तक के हाई टेंशन औद्योगिक पर 8 प्रतिशत और 10 एमवीए से अधिक पर 15 प्रतिशत शुल्क लगाया गया।

कोर्ट ने कहा कि विधायिका ने कर लगाने की शक्ति को बिना स्पष्ट नीति के कार्यपालिका को सौंप दिया, जो संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन है। ‘नेट चार्जेस’ की परिभाषा भी अस्पष्ट थी, जिससे मनमानी की गुंजाइश बनी। अदालत ने विवादित प्रावधान और 2021 के नियमों को रद्द कर दिया, जबकि 2022 के कुछ संशोधनों को बरकरार रखा। साथ ही, इन नियमों के तहत जारी बिलों को भी निरस्त किया और उपभोक्ताओं को रिफंड का आदेश दिया।

यह फैसला औद्योगिक क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि उच्च दरों से उनकी उत्पादन लागत बढ़ रही थी। झारखंड चैंबर ऑफ कॉमर्स ने भी इस फैसले का स्वागत किया, कहा कि इससे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।

बिजली कंपनियों की स्थिति और चुनौती

टाटा स्टील यूटिलिटीज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सर्विसेज लिमिटेड (यूएसआईएल), झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड (जेबीवीएनएल), डीवीसी, सेल बोकारो और अन्य कंपनियां इस फैसले से प्रभावित हैं। इन कंपनियों ने उपभोक्ताओं से शुल्क वसूला और सरकार के खाते में जमा कर दिया। अब उनके पास रिफंड के लिए पैसा नहीं है।

एक जन सुनवाई में यूएसआईएल के महाप्रबंधक वीपी सिंह ने बताया कि कंपनियों की कमाई का 85 प्रतिशत बिजली खरीद में खर्च होता है। सरायकेला-खरसावां जिले में ही 166 करोड़ रुपये जमा हुए हैं, जबकि पूरे राज्य में कुल 5,000 करोड़ का आंकड़ा है। कंपनियां विधिक सलाह लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी कर रही हैं, ताकि सरकार से यह राशि वापस मिल सके।

यह स्थिति बिजली क्षेत्र में एक नई जटिलता पैदा कर रही है। यदि कंपनियां रिफंड नहीं दे पाईं, तो उपभोक्ताओं को लंबी कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।

उपभोक्ताओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

झारखंड में करीब 54 लाख बिजली उपभोक्ता हैं, जिनमें घरेलू, व्यावसायिक और औद्योगिक शामिल हैं। हाईकोर्ट के आदेश से उन्हें अतिरिक्त शुल्क का रिफंड या बिल एडजस्टमेंट मिलेगा, जो उनकी मासिक बिजली लागत कम करेगा। विशेष रूप से औद्योगिक इकाइयों को लाभ होगा, क्योंकि उच्च दरों से उनकी लागत में कमी आएगी और निवेश आकर्षित होगा।

हालांकि, रिफंड प्रक्रिया में समय लग सकता है। कंपनियां सरकार से पैसा वापस पाने के बाद ही उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचा पाएंगी। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार अपील कर सकती है, जिससे मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है।

विद्युत शुल्क व्यवस्था की समझ

विद्युत शुल्क राज्य सरकार का राजस्व स्रोत है, जो बिजली बिल पर लगता है। मूल अधिनियम में यह यूनिट आधारित था, जो सरल और पारदर्शी था। 2021 का बदलाव नेट चार्जेस (फिक्स्ड चार्ज, एनर्जी चार्ज आदि कुल) पर शिफ्ट करने से वसूली बढ़ गई, लेकिन कोर्ट ने इसे असंवैधानिक माना। अब व्यवस्था पुरानी यूनिट आधारित रहेगी, जब तक नया संशोधन नहीं होता।

झारखंड राज्य विद्युत नियामक आयोग (जेएसईआरसी) टैरिफ तय करता है, और यह फैसला टैरिफ निर्धारण पर भी असर डालेगा। हाल ही में जेएसईआरसी ने 2026-27 के लिए जन सुनवाई शुरू की है, जहां नई दरें तय होंगी।

Jharkhand News: भविष्य की संभावनाएं और सुझाव

यह मामला बिजली क्षेत्र में पारदर्शिता और संवैधानिकता की मिसाल है। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि सरकार नई नीति बनाए, जिसमें शुल्क यूनिट आधारित रहे और उपभोक्ताओं पर बोझ न पड़े। कंपनियों को भी वित्तीय मजबूती के लिए सब्सिडी या अन्य व्यवस्था की जरूरत है।

उपभोक्ताओं को सलाह है कि वे अपने बिलों की जांच करें और यदि अतिरिक्त शुल्क वसूला गया है, तो कंपनी से संपर्क करें। यदि रिफंड में देरी होती है, तो उपभोक्ता फोरम या कोर्ट जा सकते हैं।

यह घटनाक्रम झारखंड में बिजली सुधारों की दिशा तय करेगा, जहां उपभोक्ता हित और सरकारी राजस्व के बीच संतुलन जरूरी है। राज्य सरकार और कंपनियों के बीच बातचीत से जल्द समाधान निकलने की उम्मीद है।

Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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