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Dev Deepawali: काशी के घाटों पर क्यों मनाई जाती है देवताओं की दिवाली, जानें महत्व, कथा और परंपराएं

कार्तिक पूर्णिमा पर वाराणसी के घाटों पर मनाई जाने वाली देव दीपावली का धार्मिक महत्व, त्रिपुरासुर वध की कथा, गंगा आरती, दीपदान की परंपरा और यात्रा से जुड़े उपयोगी सुझाव।

मुख्य बातें

  • देव दीपावली कब मनाई जाती है?
  • पौराणिक कथा: त्रिपुरारी पूर्णिमा
  • देव दीपावली की प्रमुख परंपराएं
  • देशभक्ति और श्रद्धांजलि का भाव
1 घंटे पहले
देव दीपावली पर वाराणसी के घाट की सीढ़ियों पर जलते दीये - Dev Deepawali diyas on Varanasi ghat
Photo: Sumita Roy Dutta / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

काशी यानी वाराणसी में कार्तिक पूर्णिमा की रात गंगा के घाट जब असंख्य दीपों से जगमगा उठते हैं, तो यह दृश्य दुनिया भर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। इसी पर्व को देव दीपावली (Dev Deepawali) कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन देवता स्वयं धरती पर उतरकर गंगा तट पर दीपावली मनाते हैं। दीपावली के लगभग पंद्रह दिन बाद आने वाला यह उत्सव आस्था, संस्कृति और कला का अनोखा संगम है। इस लेख में जानिए देव दीपावली का धार्मिक महत्व, पौराणिक कथा, परंपराएं और वाराणसी जाने वालों के लिए उपयोगी सुझाव।

देव दीपावली कब मनाई जाती है?

देव दीपावली हिंदू पंचांग के कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। यह दिन कार्तिक पूर्णिमा के नाम से भी प्रसिद्ध है और आमतौर पर दीपावली के करीब पंद्रह दिन बाद आता है। इसी दिन सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व (गुरपुरब) भी मनाया जाता है। हर साल की सटीक तारीख और पूर्णिमा का समय पंचांग के अनुसार बदलता है, इसलिए यात्रा की योजना बनाने से पहले स्थानीय पंचांग या आधिकारिक पर्यटन सूचना जरूर देख लें।

पौराणिक कथा: त्रिपुरारी पूर्णिमा

पौराणिक मान्यता के अनुसार त्रिपुरासुर नामक असुर ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन त्रिपुरासुर का वध किया। इस विजय की खुशी में देवताओं ने काशी में दीप जलाकर उत्सव मनाया। इसी कारण इस पूर्णिमा को “त्रिपुरारी पूर्णिमा” भी कहा जाता है और भगवान शिव को “त्रिपुरारी”। काशी को भगवान शिव की नगरी माना जाता है, इसलिए यहां इस पर्व का विशेष महत्व है।

देव दीपावली की प्रमुख परंपराएं

कार्तिक पूर्णिमा स्नान

कार्तिक पूर्णिमा के दिन सुबह गंगा स्नान को बहुत पुण्यदायी माना जाता है। देश भर से श्रद्धालु इस दिन वाराणसी सहित गंगा के अलग-अलग तटों पर स्नान और दान के लिए पहुंचते हैं।

घाटों पर दीपदान

शाम होते ही वाराणसी के घाटों की सीढ़ियों पर मिट्टी के दीये सजाए जाते हैं। स्थानीय लोग, समितियां और श्रद्धालु मिलकर दीप जलाते हैं। गंगा में भी दीपदान किया जाता है, जिससे नदी की धारा पर तैरते दीपों का मनमोहक दृश्य बनता है।

गंगा आरती

दशाश्वमेध घाट सहित प्रमुख घाटों पर इस दिन भव्य गंगा आरती होती है। शंखनाद, घंटियों की ध्वनि और मंत्रोच्चार के बीच होने वाली आरती देव दीपावली का मुख्य आकर्षण होती है।

सांस्कृतिक कार्यक्रम

उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग इस अवसर पर गंगा महोत्सव जैसे सांस्कृतिक आयोजन करता रहा है, जिसमें शास्त्रीय संगीत, नृत्य और लोक कलाओं की प्रस्तुतियां होती हैं। इसके अलावा कई जगह आतिशबाजी और लेजर शो जैसे कार्यक्रम भी देखने को मिलते हैं।

देशभक्ति और श्रद्धांजलि का भाव

देव दीपावली के अवसर पर कई घाटों पर देश के लिए बलिदान देने वाले शहीदों को भी दीप जलाकर श्रद्धांजलि दी जाती है। इस तरह यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ राष्ट्र के प्रति सम्मान का संदेश भी देता है।

वाराणसी के प्रमुख घाट जहां दिखती है खास रौनक

  • दशाश्वमेध घाट: सबसे प्रसिद्ध घाट, जहां भव्य गंगा आरती होती है।
  • अस्सी घाट: दक्षिणी छोर पर स्थित, यहां से कई लोग नाव यात्रा शुरू करते हैं।
  • पंचगंगा घाट: कार्तिक मास में यहां के दीप-स्तंभ (हजारा) में दीप जलाने की परंपरा प्रसिद्ध है।
  • राजेंद्र प्रसाद घाट और मणिकर्णिका क्षेत्र: घाटों की लंबी श्रृंखला का हिस्सा, जो दीपों से जगमगाती है।

देव दीपावली देखने जाने वालों के लिए सुझाव

  • पहले से बुकिंग करें: इस समय वाराणसी में भारी भीड़ रहती है, इसलिए होटल, ट्रेन और नाव की बुकिंग पहले कर लें।
  • नाव से नजारा: गंगा में नाव से घाटों की पूरी श्रृंखला का दृश्य सबसे सुंदर दिखता है। नाव में बैठते समय सुरक्षा निर्देशों का पालन करें और लाइफ जैकेट उपलब्ध हो तो जरूर पहनें।
  • जल्दी पहुंचें: आरती और दीपदान देखने के लिए शाम से पहले घाट पहुंच जाएं।
  • भीड़ में सावधानी: बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखें, कीमती सामान संभालकर रखें।
  • प्रशासन के निर्देश मानें: ट्रैफिक और प्रवेश से जुड़े नियमों का पालन करें।
  • पर्यावरण का ध्यान: गंगा में प्लास्टिक या कचरा न डालें; मिट्टी के दीयों का ही उपयोग करें।

घर पर कैसे मनाएं कार्तिक पूर्णिमा

जो लोग वाराणसी नहीं जा सकते, वे भी कार्तिक पूर्णिमा पर घर या नजदीकी नदी-तालाब के किनारे दीप जलाकर, पूजा-पाठ और दान करके इस पर्व को मना सकते हैं। इस दिन तुलसी के पास दीप जलाने और जरूरतमंदों को भोजन या वस्त्र दान करने की भी परंपरा है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

देव दीपावली कब मनाई जाती है?

कार्तिक मास की पूर्णिमा को, जो आमतौर पर दीपावली के लगभग पंद्रह दिन बाद आती है।

देव दीपावली क्यों मनाई जाती है?

मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर के वध की खुशी में देवताओं ने काशी में दीप जलाए थे।

देव दीपावली कहां सबसे प्रसिद्ध है?

वाराणसी (काशी) के गंगा घाटों पर।

देव दीपावली देखने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?

गंगा में नाव से घाटों का नजारा देखना, लेकिन इसकी बुकिंग पहले कर लेनी चाहिए।

Sudhanshu Tiwari
Author: Sudhanshu Tiwari

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कवरेज: Sudhanshu Tiwari, News Media Kiran

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