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22 साल का था मैं—- जब पापा की आखिरी चिट्ठी मिली

  1. वाराणसी: 22 साल की उम्र – वो वक्त जब हम नौकरी, पैकेज, पार्टी और रिलेशनशिप में खोए रहते हैं। लेकिन एक दिन अचानक पापा की पुरानी डायरी मिलती है और सारी दुनिया उलटपटांग लगने लगती है। ये कहानी मेरी नहीं, हम सबकी है। पढ़ोगे तो कहीं न कहीं खुद को, अपने मम्मी-पापा को देख लोगे। ये वो सच है जो हम इंस्टाग्राम रील्स में नहीं देखते, पर दिल में छुपा रखते हैं।

वो दिन जब कॉलेज की कैंटीन में रोया था मैं:

मैं 22 का था। हॉस्टल में रहता था। वीकेंड पर भी नहीं जाता था घर, क्योंकि “दोस्तों के साथ मस्ती” ज़्यादा ज़रूरी थी। फोन पर मम्मी कहतीं, “बेटा आ जा, पापा तुझे याद करते हैं।” मैं हँसकर टाल देता – “अरे अगले महीने पक्का।” फिर एक दिन कैंटीन में बैठा था, फोन बजा। मम्मी रोते हुए बोलीं, “पापा नहीं रहे…” हाथ से चाय का कप गिर गया। दुनिया घूम गई।

वो चिट्ठी जो आज भी तकिए के नीचे रखता हूँ:-

घर पहुँचा तो अलमारी में पापा की पुरानी डायरी मिली। आखिरी पन्ने पर मेरे नाम लिखा था: बेटा, तू बहुत बिजी रहता है, मैं डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था। बस इतना लिख रहा हूँ – जब मैं तेरी उम्र का था, मैं भी सोचता था कि पैसा कमाऊँगा, बड़ा घर लूँगा, मम्मी-पापा को घुमाऊँगा। फिर पता चला कि वो “कल” कभी नहीं आता। अगर कभी वक्त मिले तो एक बार बिना बहाने घर आ जाना। बस एक बार मुझे गले लगा लेना। तेरा वही पुराना पापा”

नीचे लिखा था तारीख – जिस दिन मैंने आखिरी बार फोन काटकर कहा था, “पापा बाद में बात करते हैं, दोस्त बुला रहे हैं।”

हम 20-25 के युवा आखिर कर क्या रहे हैं?

हम रात-रात भर नेटफ्लिक्स देखते हैं, इंस्टाग्राम पर “living my best life” लिखते हैं, लेकिन मम्मी का फोन “हाय बेटा, खाना खाया?” मिस्ड कॉल रह जाता है। हम सोचते हैं – “अरे यार अभी तो पूरी जिंदगी पड़ी है।” लेकिन पापा के बाल सफेद हो रहे हैं, मम्मी की कमर दुखने लगी है, और हमारा “अभी तो पूरी जिंदगी पड़ी है” धीरे-धीरे उनका “अब बस कुछ साल बचे हैं” बनता जा रहा है।

वो छोटी-छोटी चीजें जो हम भूल जाते हैं:-

पापा को बस इतना चाहिए था कि मैं उनके साथ सुबह की चाय पीता। मम्मी बस यही चाहती थीं कि मैं एक बार घर का खाना खाकर बताता – “वाह मम्मी, बहुत टेस्टी है।” लेकिन हमारा जवाब हमेशा होता था – “यार हॉस्टल का खाना अच्छा है”, “हॉस्टल में ही पार्टी है।”

आज लाखों का पैकेज है, पर उस चाय की चुस्की का स्वाद नहीं मिलता।

आज का युवा और उसकी सच्चाई:-

हम कितने अकेले हैं हम 22-25 के लड़के-लड़कियां रात को अकेले में रोते हैं। क्योंकि बाहर तो “सब बढ़िया” दिखाते हैं, पर अंदर से खाली हैं। और सबसे ज्यादा दुख इस बात का होता है कि जब हमें सबसे ज्यादा जरूरत थी मम्मी-पापा की, तब हम उनके पास नहीं थे।

विशेषज्ञ भी यही कहते हैं:-

मनोवैज्ञानिक डॉ. नेहा शर्मा कहती हैं, “20-30 की उम्र में ज्यादातर युवा ‘अवॉइडेंट अटैचमेंट’ में चले जाते हैं। उन्हें लगता है कि माता-पिता को अभी वक्त है। लेकिन 35 के बाद जब वो खुद पैरेंट बनते हैं, तब समझ आता है कि कितना देर हो चुकी होती है।”

निष्कर्ष – 

आज रात जब तुम ये पढ़ रहे हो, फोन उठाओ। बस एक मैसेज कर दो – “मम्मी-पापा, मैं आ रहा हूँ इस वीकेंड। कोई बहाना नहीं।”पापा शायद जवाब न दें, क्योंकि वो मैसेज देखकर रो पड़ेंगे। मम्मी फोन करके पूछेंगी, “सच में आ रहा है ना?” और तुम कहना – “हाँ मम्मी, इस बार सच में।”क्योंकि कल कभी नहीं आता। आज है। अभी है। और वो चाय अभी भी गर्म हो सकती है।पापा की वो चिट्ठी आज भी तकिए के नीचे है। अब मैं हर वीकेंड घर जाता हूँ। अब मम्मी के हाथ का खाना खाता हूँ। और हर बार पापा को गले लगाता हूँ। तुम भी कर लेना। जब तक वक्त है। जब तक वो गले लगाने के लिए हाथ फैलाए खड़े हैं।क्योंकि 22 की उम्र में हम सोचते हैं कि हम अमर हैं। लेकिन हमारे मम्मी-पापा नहीं हैं।

PRAGATI DIXIT
Author: PRAGATI DIXIT

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