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प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ‘द ट्यूसडे ब्रीफ’, झारखंड के गांव से खोजी पत्रकारिता तक, महिमा सिंह ने साझा किया संघर्ष

Mahima Singh Journalist: प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में 29 सितंबर 2026 को “द ट्यूसडे ब्रीफ वुमन इन कॉन्वर्सेशन” कार्यक्रम में दैनिक भास्कर डिजिटल की सीनियर इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टर महिमा सिंह ने अपनी उस यात्रा को साझा किया, जिसने उन्हें एक छोटे झारखंड गांव की बेटी से देश के सबसे संवेदनशील और खतरनाक नेटवर्क के अंदर तक पहुंचा दिया। मॉडरेटर शोभा अक्षर के साथ हुई इस बातचीत में महिमा ने न सिर्फ अपनी निजी जिंदगी के संघर्ष बताए, बल्कि उस पांच दिनों की कहानी भी सुनाई जब वे मानव तस्करी के एक बड़े गिरोह के अंदर घुसकर अनमैरिड लड़कियों के बच्चों की खरीद-बिक्री का पूरा तंत्र उजागर कर रही थीं।

महिमा सिंह का जन्म झारखंड के एक छोटे गांव में हुआ। परिवार में किसी ने मास कम्युनिकेशन नहीं पढ़ा था। समाज और घर दोनों में पत्रकारिता को लेकर कोई सोच भी नहीं थी। लेकिन महिमा के मन में हमेशा कुछ अलग करने की चाह थी। उन्होंने तय कर लिया कि उन्हें पत्रकारिता करनी है। पिता कभी मानने वाले नहीं थे, इसलिए उन्होंने झूठ बोला कि कहीं और एडमिशन नहीं हो रहा है और एक साल बर्बाद नहीं होना चाहिए। पिता जैसे-तैसे मान गए, डिग्री के दौरान पिता एक तरफ समर्थन भी करते थे, लेकिन समाज के दबाव में कहते थे कि लोग पूछते हैं कि अपनी बेटी से क्या करवा रहे हो, बेटी की शादी नहीं होगी। महिमा खुद भी सोचती थीं कि मास कम्युनिकेशन के बाद उन्हें जीवन में कुछ बहुत अच्छा करना है।

दैनिक भास्कर में आने के बाद कुलदीप सर ने उन्हें रेड लाइट एरिया की स्टोरी के बारे में बताया। वह बात उनके मन में बैठ गई। जो कुछ वे अब तक सिर्फ लोगों से सुनती आई थीं, उस पर काम करने का मौका मिला। उन्होंने हां कर दी। टीम ने योजना बनाई कि कैसे ऑर्केस्ट्रा में एंट्री की जाए। फर्जी नाम से फरीदाबाद का आधार कार्ड बनवाया गया और दलालों के हाथों बेच दिया गया। महिमा बताती हैं कि उन्हें हमेशा डर लगता था कि उनके साथ कुछ गलत हो जाएगा। इसलिए उन्होंने फर्जी पीरियड का बहाना किया। गुस्से में भी नहीं बोल सकती थीं क्योंकि उनके साथ कुछ भी हो सकता था। बाकी ऑर्केस्ट्रा जैसी लड़कियों की तरह बोलना और रहना पड़ता था। इसी तरह उन्हें तीन बार बेचा गया।

जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने कैसे फैसला किया कि अब वहां से निकलना है, तो उन्होंने बताया कि कैमरे की बैटरी खत्म हो गई थी। उन्होंने कोशिश की लेकिन पकड़ी गईं। बाल खींचे गए, फोन का वीडियो डिलीट करवा दिया गया। फिर जैसे-तैसे टीम से संपर्क किया और भाग आईं क्योंकि जांच लगभग पूरी हो चुकी थी।

इसके बाद भास्कर ने “ऑपरेशन कुंवारी कोख” चलाया। महिमा ने 90 दिनों तक आशा कर्मी बनकर एजेंट्स के संपर्क में रहने का दावा किया। इस दौरान बिहार से लेकर देश के कई राज्यों में अनमैरिड लड़कियों के बच्चों को बेचने वाली गैंग की मोडस ऑपरेंडी सामने आई। निःसंतान दंपती बनकर भी रिपोर्टर ने एजेंट्स को एक्सपोज किया। फिर अनमैरिड प्रेग्नेंट बनकर फेक रिपोर्ट के साथ 15 से अधिक एजेंट्स तक पहुंचीं।

पहली कड़ी में आशा वर्कर प्रतिमा से डील हुई। रिपोर्टर ने कहा कि वह आठ महीने की प्रेग्नेंट हैं, घर से दूर बेतिया में रह रही हैं, शादी नहीं हुई इसलिए टेंशन है। प्रतिमा ने जाति पूछी, गर्भ की जांच रिपोर्ट मांगी। जब बताया गया कि बेटा आया है, तो प्रतिमा बोलीं कि तब ठीक है, आपके कास्ट का परिवार ढूंढते हैं। अगर ब्राह्मण परिवार से होतीं तो पांच लाख में सेट हो जाता। उन्होंने साफ कहा कि बच्चों को लेने से पहले परिवार कास्ट पूछता है और ब्राह्मण मां के बच्चे का रेट अधिक होता है।

एक कॉल में बच्चे की डील हो गई। प्रतिमा ने बैंक मैनेजर को फोन कर बताया कि इंतजाम हो गया है, अल्ट्रासाउंड में बेटा निकला है, कास्ट भी सेम है। एक महीने में डिलीवरी हो जाएगी। प्रतिमा ने रिपोर्टर के सामने कई कस्टमर्स से डील की और बार-बार जाति के आधार पर पैसे की बात की। उन्होंने कहा कि आपके लिए बच्चा नाजायज है, लेकिन किसी के घर के लिए खुशी है। लड़का होगा तो 30-40 हजार की मदद भी करा दूंगी।

सरकारी अस्पताल में सेटिंग का भी खुलासा हुआ। प्रतिमा ने दावा किया कि सरकारी हॉस्पिटल में सेटिंग करके डिलीवरी करा देंगी, आधार तक नहीं देना पड़ेगा, डॉक्टर को पैसा दे देते हैं। उन्होंने एक और कॉल पर कहा कि एक लड़का मिला है, प्रेग्नेंट लड़की को कहीं रखवा दीजिए, बच्चा हो जाएगा तो दे देंगे।

एजेंट्स के पास अनमैरिड लड़कियों के रहने और डिलीवरी की पूरी व्यवस्था होती है। प्रतिमा ने पड़ोस में शिफ्ट होने का दबाव बनाया और एडवांस पैसे की मांग की। डर दिखाकर नवजात लेने की प्लानिंग की जाती है। आठ महीने का हो गया है तो रिस्क है, अबॉर्शन कराने पर लड़की की जान जा सकती है—ऐसा कहकर डिलीवरी का दबाव बनाया जाता है।

आरुषि चाइल्ड केयर में आदित्य राय से मुलाकात हुई। उन्होंने भी डर का माहौल बनाया। दवा चलाई जाएगी तो बच्चा मर सकता है, लड़की को भी खतरा हो सकता है। छापेमारी का डर दिखाया और कहा कि बच्चा की पूरी जिम्मेदारी हम ले रहे हैं।

योगपट्टी के सरकारी अस्पताल में आशा वर्कर रिंकी का क्लू मिला। रिंकी ने अपनी बहन ललिता के पास भेजा। ललिता के हॉस्पिटल में संयुक्ता से बात हुई। संयुक्ता ने कहा कि 100 प्रतिशत रिजल्ट देंगे, लड़की की शादी में कोई दिक्कत नहीं होगी, 8 महीने का बच्चा नहीं बचता, सफाई करना होगा। लेकिन बाद में कहा कि 7 से 9 महीने में सब बच्चे निकाले जाते हैं और शादी हो जाती है।

ललिता ने भी जाति के हिसाब से बच्चों की डिमांड की बात कही। उन्होंने कहा कि बगल में एक अधिकारी हैं जो आपकी जाति के हैं और बच्चा चाहते हैं। हिंदू को हिंदू बच्चा और मुस्लिम को मुस्लिम बच्चा दिया जाता है। कुंवारी मां का बेटा सबसे सेफ होता है क्योंकि कोई क्लेम नहीं करता।

भास्कर की जांच में यह सामने आया कि यह नेटवर्क सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। यूपी, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, झारखंड, बंगाल और यहां तक कि नेपाल तक फैला है। एजेंट अनमैरिड प्रेग्नेंट लड़की को तलाशते हैं, नौ महीने तक छिपाकर रखते हैं, फर्जी पहचान से अस्पताल में भर्ती कराते हैं, लिंग परीक्षण करवाते हैं और गर्भ में ही सौदा कर देते हैं। बच्चे का रेट जाति, बेटा-बेटी के हिसाब से तय होता है। आशा कर्मी और प्राइवेट-सरकारी हॉस्पिटल के कर्मी मिलकर यह नेटवर्क चलाते हैं।

महिमा सिंह की यह बातचीत सिर्फ एक स्टोरी का ब्योरा नहीं थी। यह उस साहस की कहानी थी जिसमें एक छोटी सी लड़की ने समाज की दीवारों को पार किया, झूठ बोलकर परिवार को राजी किया, और फिर खुद को खतरे में डालकर एक ऐसे नेटवर्क को उजागर किया जो नाजायज बच्चों को “लॉटरी” की तरह बेचता है। जहां कुंवारी लड़कियों के गर्भ में पल रहे बच्चे किसी की समस्या और किसी की खुशी बन जाते हैं। जहां जाति की दीवारें नवजात की कीमत तय करती हैं। और जहां सरकारी अस्पताल तक की पहुंच इतनी गहरी है कि आधार तक नहीं मांगते।

यह कार्यक्रम महिलाओं की उन आवाजों को जगह देता है जो सिर्फ खबर नहीं बनातीं, बल्कि खुद खबर बन जाती हैं। महिमा सिंह की यात्रा याद दिलाती है कि पत्रकारिता सिर्फ रिपोर्टिंग नहीं है। यह उस अंधेरे में उतरने का नाम है जहां समाज की सबसे गहरी सच्चाइयां छिपी होती हैं। और एक छोटी सी गांव की बेटी जब यह फैसला करती है कि उसे कुछ बहुत अच्छा करना है, तो वह सचमुच इतिहास लिख सकती है।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

Sanjana Gupta Hindi Content Writer | New Media Kiran Sanjana Gupta is a Hindi Content Writer at New Media Kiran, creating accurate, engaging, and reader-friendly news and web content for digital platforms. She specializes in well-researched Hindi articles that keep audiences informed and interested.

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