ISRO Privatization 2026: भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजीकरण की बढ़ती चर्चाओं ने अब इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन यानी ISRO के भीतर भी हलचल पैदा कर दी है। स्पेस सेक्टर को प्राइवेट कंपनियों के लिए खोले जाने की योजनाओं को लेकर एजेंसी के हजारों कर्मचारियों में असमंजस और चिंता की स्थिति बन गई है। इसी को देखते हुए ISRO के कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले 9 अलग-अलग संगठनों ने संयुक्त रूप से चेयरमैन वी. नारायणन को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में मैन्युफैक्चरिंग और ऑपरेशनल कामकाज को निजी हाथों में सौंपे जाने के प्रस्ताव पर स्पष्ट और आधिकारिक जानकारी मांगी गई है। दिलचस्प बात यह है कि यह पत्र GSLV रॉकेट की मदद से एक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट के सफल प्रक्षेपण के कुछ ही घंटों बाद भेजा गया, जिससे इस मुद्दे की गंभीरता और भी स्पष्ट हो जाती है।
ISRO Privatization 2026: किन संगठनों ने उठाई आवाज
ISRO के विभिन्न केंद्रों की कर्मचारी यूनियनों ने इस पत्र पर हस्ताक्षर कर एकजुटता दिखाई है। इनमें ISRO स्टाफ एसोसिएशन, SHAR एम्प्लॉईज एसोसिएशन, ISAC एम्प्लॉईज एसोसिएशन के साथ-साथ ISRO स्टाफ एसोसिएशन-LPSC और ISRO स्टाफ एसोसिएशन-BBU जैसे संगठन शामिल हैं। इसके अलावा NRSA एम्प्लॉईज यूनियन, स्पेस एम्प्लॉईज एसोसिएशन-BBU, ISRO स्टाफ एसोसिएशन-IPRC और SAC एम्प्लॉईज वेलफेयर एसोसिएशन ने भी इस मुहिम में अपनी सहभागिता दर्ज कराई है। इतने बड़े स्तर पर संगठनों का एकसाथ आना यह दर्शाता है कि निजीकरण को लेकर कर्मचारियों के बीच चिंता व्यापक स्तर पर फैली हुई है।
गोयनका के बयान से बढ़ी बेचैनी
इस पूरे विवाद की जड़ में इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर यानी IN-SPACe के चेयरमैन पवन कुमार गोयनका का हालिया बयान बताया जा रहा है। उन्होंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था कि अब ISRO किसी भी लॉन्च व्हीकल का निर्माण नहीं करेगा, बल्कि यह जिम्मेदारी पूरी तरह प्राइवेट सेक्टर या पब्लिक सेक्टर यूनिट्स को सौंपी जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल के साथ यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है और आने वाले समय में इसका दायरा पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल तथा LVM3 तक भी बढ़ाया जा सकता है।
करीब 120 तकनीकों के ट्रांसफर का जिक्र
कर्मचारी संगठनों ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि ISRO से जुड़ी लगभग 120 तकनीकों को पहले ही निजी क्षेत्र को हस्तांतरित किया जा चुका है। इसके साथ ही रेगुलर सैटेलाइट निर्माण के काम को एजेंसी से हटाने और प्राइवेट कंपनियों के लिए नया लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर खोलने जैसी खबरों पर भी गहरी चिंता जताई गई है। संगठनों का मानना है कि इस तरह के फैसले सीधे तौर पर संस्था की भविष्य की भूमिका और उसकी रणनीतिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं।
ISRO Privatization 2026: नीति स्पष्टता की मांग और संस्थागत क्षमता पर चिंता
पत्र में साफ तौर पर कहा गया है कि इन बयानों को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा मिली है, लेकिन डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस की तरफ से अब तक कोई आधिकारिक नीति सामने नहीं आई है। कर्मचारी संगठनों ने इस नीति के कानूनी और प्रशासनिक आधार के साथ-साथ मौजूदा वर्कफोर्स और भविष्य की सरकारी भर्तियों पर पड़ने वाले असर को लेकर भी स्पष्टीकरण मांगा है। पत्र में यह भी रेखांकित किया गया है कि लॉन्च व्हीकल का डिजाइन तैयार करना, उसकी टेस्टिंग, इंटीग्रेशन और लॉन्च ऑपरेशन जैसे कार्य केवल सामान्य मैन्युफैक्चरिंग कॉन्ट्रैक्ट नहीं हैं, बल्कि यह संगठन की मूल क्षमता, संस्थागत ज्ञान और रणनीतिक ताकत का हिस्सा हैं।
ISRO के कर्मचारियों की यह चिंता स्पष्ट रूप से दिखाती है कि निजीकरण की दिशा में उठाए जा रहे कदमों को लेकर संगठन के भीतर पारदर्शिता की कमी महसूस की जा रही है। स्पेस सेक्टर में निजी भागीदारी बढ़ाने की सरकार की मंशा किसी से छिपी नहीं है, लेकिन कर्मचारी संगठनों की मुख्य मांग यही है कि इस बदलाव की रूपरेखा और उसके असर को लेकर स्पष्ट नीति सार्वजनिक की जाए। आने वाले दिनों में डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस की प्रतिक्रिया पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी, क्योंकि इसी से यह तय होगा कि ISRO की भविष्य की भूमिका किस दिशा में आगे बढ़ेगी।
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Sanjana Gupta
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