IVF Myths vs Facts: आज के दौर में जब जिंदगी की भागदौड़, खानपान की खराब आदतें और तनाव तेजी से बढ़ रहे हैं, तब संतान न होने की समस्या यानी इंफर्टिलिटी भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है। देश में इस समय ढाई करोड़ से भी ज्यादा लोग इंफर्टिलिटी की समस्या से जूझ रहे हैं जिनमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं। अगर जोड़ों की बात करें तो हर छह में से एक दंपत्ति को गर्भधारण में परेशानी होती है।
ऐसे में IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन एक उम्मीद की किरण बनकर सामने आता है। इस तकनीक में महिला के अंडाणु को पुरुष के शुक्राणु के साथ लैब में मिलाया जाता है और जो भ्रूण तैयार होता है उसे महिला के गर्भाशय में रखा जाता है। इस तरह पैदा होने वाले बच्चों को टेस्ट ट्यूब बेबी कहते हैं। लेकिन समस्या यह है कि IVF को लेकर समाज में इतनी गलतफहमियां फैली हुई हैं कि जो दंपत्ति इस तकनीक का फायदा उठा सकते हैं वो भी डर और भ्रम में पड़कर पीछे हट जाते हैं। आइए IVF विशेषज्ञों से जानते हैं कि इस तकनीक से जुड़े सबसे बड़े मिथ कौन से हैं और उनकी असली सच्चाई क्या है।
मिथ 1: IVF से पैदा होने वाला बच्चा हमेशा बीमार और कमजोर होता है

यह शायद IVF को लेकर सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा फैला हुआ मिथ है। बहुत से लोग मानते हैं कि लैब में तैयार किया गया भ्रूण कभी उतना स्वस्थ नहीं हो सकता जितना कि प्राकृतिक तरीके से पैदा हुआ बच्चा। लोग सोचते हैं कि टेस्ट ट्यूब बेबी बार-बार बीमार पड़ेगा, उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होगी और वो सामान्य बच्चों की तरह नहीं बढ़ेगा।
इस बारे में IVF विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरी तरह से गलत और बेबुनियाद धारणा है। IVF से पैदा हुए बच्चे बिल्कुल सामान्य और तंदुरुस्त होते हैं। उनका शारीरिक और मानसिक विकास भी उसी तरह होता है जैसे किसी भी दूसरे बच्चे का होता है। दुनियाभर में IVF से अब तक करोड़ों बच्चे पैदा हो चुके हैं और उनमें से अधिकांश पूरी तरह स्वस्थ और सामान्य जीवन जी रहे हैं। इसलिए IVF से बच्चे के बीमार होने का डर निराधार है।
मिथ 2: IVF कराने से हमेशा लड़का ही पैदा होता है
यह मिथ हमारे देश में खासतौर पर बहुत तेजी से फैला हुआ है। बहुत से परिवारों में यह धारणा है कि IVF एक ऐसी तकनीक है जिससे मनचाहे लिंग का बच्चा पैदा किया जा सकता है और इसीलिए इसे कराने वालों के यहां लड़का ही होता है।
IVF विशेषज्ञ इस पर साफ कहते हैं कि यह सोच पूरी तरह से गलत है। IVF में सबसे पहले भ्रूण तैयार किया जाता है फिर उसकी गुणवत्ता देखी जाती है और जो सबसे स्वस्थ भ्रूण होता है उसे महिला के गर्भाशय में रखा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में यह तय करने का कोई प्रावधान नहीं है कि बच्चा लड़का होगा या लड़की। बच्चे का लिंग तो प्रेग्नेंसी के बाद ही और वो भी कानूनी तरीके से प्रसव के वक्त पता चलता है।
इससे भी जरूरी बात यह है कि भारत में लिंग चयन यानी सेक्स सेलेक्शन कानूनन पूरी तरह प्रतिबंधित है। PCPNDT कानून के तहत यह एक गंभीर अपराध है। इसलिए IVF से लड़का ही पैदा होता है यह मिथ न सिर्फ गलत है बल्कि कानूनी दृष्टि से भी यह संभव नहीं है।
मिथ 3: IVF कराने से महिला को कैंसर का खतरा बढ़ जाता है
एक और डरावना मिथ जो लोगों को IVF से दूर रखता है वो यह है कि इस तकनीक से महिलाओं में कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। यह सुनकर बहुत सी महिलाएं जो IVF करवाना चाहती हैं वो पीछे हट जाती हैं।
इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि एक सामान्य IVF साइकल से कैंसर का कोई सिद्ध खतरा नहीं है। हां, अगर कोई महिला बार-बार और बहुत ज्यादा IVF साइकल करवाती है तो ओवेरियन या ब्रेस्ट कैंसर का थोड़ा जोखिम बढ़ सकता है। इसीलिए डॉक्टर हमेशा IVF को जरूरत के मुताबिक और सीमित बार ही करवाने की सलाह देते हैं। एक या दो बार के IVF से किसी भी तरह के कैंसर का कोई सीधा संबंध अभी तक साबित नहीं हुआ है।
मिथ 4: IVF प्रेग्नेंसी हमेशा हाई-रिस्क होती है और नॉर्मल डिलीवरी नहीं होती
बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि IVF से हुई प्रेग्नेंसी हमेशा खतरनाक होती है और ऐसे में सिजेरियन ऑपरेशन ही करना पड़ता है। नॉर्मल डिलीवरी IVF में होती ही नहीं, यह भी एक बड़ी गलतफहमी है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि IVF से हुई प्रेग्नेंसी में भी नॉर्मल डिलीवरी पूरी तरह संभव है और होती भी है। यह पूरी तरह महिला की सेहत, उम्र और प्रेग्नेंसी की स्थिति पर निर्भर करता है। हां कुछ मामलों में जब महिला की उम्र ज्यादा हो या उन्हें कोई और स्वास्थ्य समस्या हो तो ज्यादा देखभाल की जरूरत पड़ती है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर IVF प्रेग्नेंसी हाई-रिस्क ही हो।
मिथ 5: IVF सिर्फ अमीर लोग ही करवा सकते हैं
एक बड़ा मिथ यह भी है कि IVF बहुत महंगा इलाज है और यह सिर्फ उन लोगों के लिए है जिनके पास बहुत पैसा हो। आम परिवार के लोग इसे नहीं करवा सकते।
यह सोच भी पूरी तरह सही नहीं है। पिछले कुछ सालों में IVF की लागत में काफी कमी आई है। देश के ज्यादातर बड़े शहरों में ऐसे अस्पताल हैं जो किफायती पैकेज में IVF की सुविधा देते हैं। कई जगहों पर EMI की सुविधा भी उपलब्ध है। इसके अलावा कुछ राज्य सरकारों की योजनाओं के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के दंपत्तियों को IVF में मदद भी मिलती है। यानी अब यह तकनीक सिर्फ अमीरों तक सीमित नहीं रही।
मिथ 6: एक बार IVF फेल हो जाए तो दोबारा कोशिश करना बेकार है
यह मिथ उन दंपत्तियों के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदायक है जिन्होंने एक बार IVF करवाया और वो सफल नहीं हुआ। बहुत से लोग पहली बार में सफलता न मिलने पर हार मान लेते हैं और सोचते हैं कि अब IVF उनके लिए काम नहीं करेगा।
लेकिन विशेषज्ञ इस धारणा को पूरी तरह गलत बताते हैं। IVF की सफलता दर एक साइकल में हमेशा सौ प्रतिशत नहीं होती। यह कई बातों पर निर्भर करती है जैसे महिला की उम्र, भ्रूण की गुणवत्ता और दंपत्ति की स्वास्थ्य स्थिति। डॉक्टर की सलाह पर IVF को कई बार ट्राई किया जा सकता है और दूसरी या तीसरी कोशिश में सफलता मिलना बेहद आम बात है। इसलिए एक बार की नाकामी का मतलब यह नहीं कि रास्ता बंद हो गया।
IVF Myths vs Facts: IVF को लेकर क्या रखें ध्यान?
IVF एक मेडिकल प्रक्रिया है और इसे हमेशा किसी योग्य और अनुभवी विशेषज्ञ की देखरेख में ही करवाना चाहिए। इंटरनेट पर पढ़ी-सुनी बातों के आधार पर फैसला लेने की बजाय किसी अच्छे IVF विशेषज्ञ से सीधे मिलकर अपनी स्थिति के बारे में बात करें। हर दंपत्ति की स्थिति अलग होती है और उनके लिए सबसे सही इलाज का फैसला डॉक्टर ही कर सकते हैं।
IVF न तो कोई जादू है और न ही कोई डरावनी तकनीक। यह एक वैज्ञानिक और सुरक्षित चिकित्सा पद्धति है जिसने दुनियाभर में लाखों दंपत्तियों को माता-पिता बनने का सुख दिया है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल IVF से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी इलाज से पहले अपने विशेषज्ञ चिकित्सक से जरूर परामर्श लें।
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