Jamia Students Protest: जामिया मिलिया इस्लामिया में करीब 20 साल से केंद्रीय स्तर का चुना हुआ छात्रसंघ नहीं रहा। आखिरी चुनाव 2005 में हुए थे। 31 मार्च 2006 को विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रसंघ को भंग कर दिया। इसके बाद से पूरे परिसर का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई चुना हुआ निकाय नहीं बना। हाल के दिनों में छात्रों ने भूख हड़ताल और प्रदर्शन करके चुनाव बहाल करने की मांग की। प्रशासन ने अब 2027 में चुनाव कराने की सहमति जताई है। लेकिन चर्चा में अक्सर यह सवाल आता है कि जब मामला 2006 से चला आ रहा है, तो सवाल मोदी सरकार से ही क्यों किए जाते हैं।
Jamia Students Protest: 2006 में क्या हुआ था
2005 में छात्रसंघ के चुनाव हुए। इसके बाद हॉस्टल सीटों के आवंटन को लेकर छात्रसंघ के अध्यक्ष और विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर के बीच विवाद हो गया। परिसर में हिंसा और पढ़ाई बाधित होने की घटनाएं सामने आईं। प्रशासन का कहना था कि छात्र प्रतिनिधि प्रशासनिक कामों में दखल दे रहे थे और शैक्षणिक माहौल खराब हो रहा था। कुछ रिपोर्टों में कुलपति पर हमले का भी जिक्र है। इन घटनाओं के बाद 31 मार्च 2006 को चुना हुआ छात्रसंघ भंग कर दिया गया।
उस समय केंद्र में यूपीए सरकार थी। यानी यह फैसला मोदी सरकार के आने से कई साल पहले लिया गया था। इसके बाद विश्वविद्यालय ने विभागों और विषयों के स्तर पर छात्र प्रतिनिधित्व की व्यवस्था रखी, लेकिन पूरे विश्वविद्यालय का एक चुना हुआ संघ नहीं बना।
20 साल तक चुनाव क्यों नहीं हो सके

भंग होने के बाद छात्रों ने कई बार चुनाव बहाल करने की मांग की। 2012 में दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका भी दायर हुई। कोर्ट ने मामले को सुना, लेकिन 2022 में याचिका का निपटारा कर दिया। कोर्ट ने न तो चुनाव कराने का आदेश दिया और न ही भविष्य में चुनाव करने पर रोक लगाई। विश्वविद्यालय प्रशासन ने अदालती मामले और पुराने अनुभवों का हवाला देकर चुनाव टालता रहा।
कई कुलपतियों के समय में प्रस्ताव आए, जैसे 2017 में छात्र परिषद का मॉडल, लेकिन छात्रों ने इसे पूर्ण चुना हुआ संघ नहीं माना। प्रशासन का पक्ष यह रहा कि परिसर में अनुशासन और पढ़ाई का माहौल बनाए रखना जरूरी है। छात्र पक्ष का कहना था कि बिना चुने हुए प्रतिनिधियों के उनकी समस्याएं (हॉस्टल, फीस, स्कॉलरशिप आदि) ठीक से नहीं सुनी जातीं।
2026 का आंदोलन और सहमति
अक्टूबर 2026 में छात्रों ने फिर से आंदोलन शुरू किया। करीब 11-12 अक्टूबर से भूख हड़ताल शुरू हुई। छात्र मांग कर रहे थे कि चुनाव की साफ तारीख तय हो, अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस ली जाए और संविधान बनाने की प्रक्रिया समयबद्ध हो। प्रदर्शन करीब 18 दिन चला।
26 अक्टूबर को प्रशासन ने कहा कि संविधान मंजूर होने के 15 दिन बाद चुनाव होंगे। छात्रों ने इसे अपर्याप्त माना क्योंकि मंजूरी की कोई निश्चित तारीख नहीं थी। बाद में बातचीत हुई। 29-30 अक्टूबर तक सहमति बनी। प्रशासन ने 15 मई 2027 तक छात्रसंघ का संविधान तैयार करने और लागू करने का फैसला किया। नया शैक्षणिक सत्र 16 जुलाई 2027 से शुरू होने की संभावना है। उसके छह सप्ताह के भीतर यानी अगस्त 2027 के आसपास चुनाव कराने का लक्ष्य रखा गया है। प्रदर्शन के दौरान जारी निलंबन और नोटिस भी वापस लेने की बात कही गई।
मोदी सरकार से सवाल क्यों?
जामिया एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। यह शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी के अधीन आता है। छात्र संघ के मामले में विश्वविद्यालय का अपना प्रशासन फैसला लेता है। लिंगदोह समिति की सिफारिशें भी छात्र चुनावों के लिए हैं, लेकिन लागू करने का तरीका विश्वविद्यालय तय करता है।
2006 का फैसला यूपीए काल का था। उसके बाद कई सरकारें आईं और गईं। छात्र मांग लंबे समय से कर रहे थे, लेकिन प्रशासन ने अपने स्तर पर फैसला नहीं लिया। जब केंद्र में कोई सरकार होती है, तो केंद्रीय विश्वविद्यालयों के मुद्दे अक्सर उसी सरकार से जुड़े कर दिए जाते हैं। राजनीतिक दल और छात्र संगठन भी इसे मुद्दा बनाते हैं। इसलिए जब आंदोलन होता है, तो सवाल मोदी सरकार पर आ जाते हैं, भले ही मूल फैसला और देरी विश्वविद्यालय प्रशासन की रही हो।
आगे क्या होगा
अब संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरू होगी। इसमें लिंगदोह समिति के नियमों का ध्यान रखना होगा। 2027 में अगर चुनाव होते हैं, तो करीब 21 साल बाद जामिया में पूरा चुना हुआ छात्रसंघ बनेगा। छात्रों का कहना है कि इससे उनकी आवाज मजबूत होगी। प्रशासन का ध्यान पढ़ाई और अनुशासन पर रहेगा।
यह मामला विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के बीच का है। केंद्र सरकार सीधे चुनाव कराने या रुकवाने का फैसला नहीं लेती। 2006 से चली आ रही स्थिति को समझे बिना सिर्फ मौजूदा सरकार पर सवाल उठाना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
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Sanjana Gupta
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