Jharkhand Coal Crisis 2026: देश के कई हिस्सों में बिजली उत्पादन पर इन दिनों संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह बनी है झारखंड और उससे सटे कोयला उत्पादक क्षेत्रों में हुई भारी बारिश, जिसने कोयला खनन और उसकी ढुलाई दोनों को बुरी तरह प्रभावित किया है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के ताजा आंकड़ों की मानें तो देशभर के 57 कोयला आधारित बिजलीघर अब क्रिटिकल स्टॉक की श्रेणी में पहुंच चुके हैं, यानी इनके पास महज चार से पांच दिन चलने लायक ही कोयला बचा है। अगस्त महीने में लगातार हुई बारिश ने खदानों में काम की रफ्तार धीमी कर दी, जिसका सीधा असर अब बिजली उत्पादन पर दिखने लगा है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में स्थिति खासतौर पर चिंताजनक बताई जा रही है। हालांकि कोयला कंपनियां आपूर्ति सुधारने में जुट गई हैं और सितंबर की शुरुआत में बारिश कमजोर पड़ने के बाद हालात में कुछ सुधार की उम्मीद भी जताई जा रही है।
Jharkhand Coal Crisis 2026: देशभर में कितना गहरा है कोयला संकट
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण यानी सीईए के 4 सितंबर के आंकड़े इस संकट की गंभीरता को साफ तौर पर दिखाते हैं। देश के 57 थर्मल पावर प्लांट फिलहाल क्रिटिकल स्टॉक की स्थिति में हैं, जहां सामान्य जरूरत से काफी कम कोयला बचा है। इन बिजलीघरों के पास कुल मिलाकर करीब 27.1 मिलियन टन कोयला मौजूद है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में इन्हें लगभग 57.7 मिलियन टन कोयले की जरूरत होती है। यानी उपलब्धता महज 47 प्रतिशत के आसपास सिमट कर रह गई है। इन क्रिटिकल बिजलीघरों में 52 घरेलू कोयले पर, चार आयातित कोयले पर और एक वॉशरी रिजेक्ट कोयले पर आधारित है। सीईए के मानकों के अनुसार जिस भी पावर प्लांट में सामान्य जरूरत का 25 प्रतिशत से कम कोयला बचता है, उसे क्रिटिकल श्रेणी में डाल दिया जाता है।
मानसून ने कैसे बिगाड़ी उत्पादन और ढुलाई की रफ्तार
मानसून के महीनों में कोयला खदानों में उत्पादन और परिवहन का प्रभावित होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार बारिश की तीव्रता ने स्थिति को और मुश्किल बना दिया। लगातार बारिश की वजह से खदानों में कोयला सीम गीली और चिपचिपी हो गई, जिससे खनन कार्य धीमा पड़ गया। कई निचले इलाकों की खदानों में पानी भर जाने से भी उत्पादन पर सीधा असर पड़ा। इसके अलावा खदानों के भीतर बनी सड़कों पर भी आवागमन बाधित हुआ, जिससे कोयले की ढुलाई में देरी होने लगी। सीसीएल के सीएमडी निलेंदु कुमार सिंह के अनुसार 25 अगस्त से 2 सितंबर के बीच हुई भारी बारिश के दौरान बिजलीघरों को महज करीब 25 रैक ही भेजे जा पा रहे थे, जो सामान्य दिनों की तुलना में काफी कम था।
किन राज्यों में हालात सबसे ज्यादा गंभीर
क्षेत्रवार देखा जाए तो उत्तर भारत के राज्यों में कोयले की किल्लत सबसे ज्यादा महसूस की जा रही है। सीईए के आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान के सभी सातों थर्मल पावर प्लांट क्रिटिकल स्टॉक की स्थिति में पहुंच चुके हैं, जिन्हें मुख्य रूप से एनसीएल और एसईसीएल से कोयला मिलता है। उत्तर प्रदेश की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है, यहां के सात बिजलीघरों में कोयले की कमी दर्ज की गई है और इनमें से चार को झारखंड की कोयला कंपनियों से आपूर्ति होती है। पंजाब में भी हालात राहत देने वाले नहीं हैं। राज्य के राजपुरा और तलवंडी साबो थर्मल पावर प्लांटों में सिर्फ पांच से छह दिन का ही कोयला बचा है, जबकि इन दोनों संयंत्रों की कुल उत्पादन क्षमता लगभग 3,380 मेगावाट है।
मांग में अचानक उछाल ने बढ़ाई मुश्किलें
एक कोयला कंपनी के अधिकारी के मुताबिक जनवरी से मार्च के बीच बिजलीघरों में कोयले का स्टॉक पर्याप्त मात्रा में मौजूद था, जिसकी वजह से कई संयंत्रों ने कोयला उठाना कम कर दिया था। इसके बाद कुछ राज्यों में बारिश की कमी की वजह से घरेलू, औद्योगिक और कृषि क्षेत्र में बिजली की मांग तेजी से बढ़ने लगी। मांग बढ़ने के साथ ही बिजलीघरों को अचानक ज्यादा कोयले की जरूरत पड़ने लगी, ठीक उसी समय जब मानसून की वजह से आपूर्ति पहले से सीमित हो चुकी थी। इस दोहरे दबाव ने स्टॉक को तेजी से घटाने में अहम भूमिका निभाई। झारखंड से जुड़े कुछ प्रमुख बिजलीघरों में हरियाणा का महात्मा गांधी विद्युत संयंत्र, उत्तर प्रदेश के हरदुआगंज, जवाहरपुर, टांडा और पनकी टीपीएस, साथ ही बिहार का नबीनगर पावर प्लांट शामिल हैं।
Jharkhand Coal Crisis 2026: आपूर्ति सुधारने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे
संकट की गंभीरता को देखते हुए कोयला मंत्रालय ने झारखंड समेत सभी कोयला कंपनियों को बिजलीघरों तक अधिकतम कोयला पहुंचाने का निर्देश दिया है। सीसीएल के अनुसार अब रैक की संख्या बढ़ाकर करीब 40 कर दी गई है और इसे जल्द ही 46 तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। फिलहाल बिजलीघरों को रोजाना करीब 1.7 मिलियन टन कोयला भेजा जा रहा है, जबकि पहले यह आंकड़ा 1.2 से 1.4 मिलियन टन के बीच ही सीमित था। कोल इंडिया लिमिटेड ने भी फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट वाले बिजलीघरों को वार्षिक अनुबंध से अधिक कोयला उठाने की अनुमति देने की पहल शुरू की है, ताकि संकटग्रस्त संयंत्रों का स्टॉक जल्द से जल्द सामान्य स्तर पर लाया जा सके।
कुल मिलाकर देखा जाए तो झारखंड की बारिश ने पूरे देश की बिजली आपूर्ति व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। कोयले की कमी और बढ़ती मांग के बीच बना यह असंतुलन आने वाले दिनों में बिजली उत्पादन पर असर डाल सकता है, खासकर उत्तर भारत के राज्यों में जहां स्थिति पहले से ही नाजुक बनी हुई है। हालांकि सितंबर की शुरुआत में बारिश की तीव्रता कम होने और कोयला कंपनियों की तरफ से आपूर्ति बढ़ाने के प्रयासों के बाद उम्मीद की जा रही है कि आने वाले हफ्तों में स्टॉक की स्थिति धीरे-धीरे सुधरेगी। फिलहाल सभी की निगाहें मानसून की चाल और रैक आवंटन में हो रहे सुधार पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि देश का बिजली संकट कितनी जल्दी टलता है।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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