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Jharkhand News: जादूगोड़ा खनन विवाद पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का कड़ा रुख, झारखंड सरकार से मांगी रिपोर्ट

Jharkhand News: झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में स्थित जादूगोड़ा यूरेनियम खनन क्षेत्र एक बार फिर राष्ट्रीय सुर्खियों में है। दशकों से रेडिएशन और विस्थापन की मार झेल रहे स्थानीय आदिवासियों की आवाज अब देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद यानी राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जादूगोड़ा में यूरेनियम खनन से होने वाले गंभीर स्वास्थ्य खतरों, पर्यावरण विनाश और आदिवासियों के विस्थापन से जुड़ी एक याचिका पर कड़ा रुख अपनाया है। राष्ट्रपति सचिवालय ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए झारखंड सरकार के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट मांगी है। इस कदम के बाद से झारखंड की सियासत और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।

Jharkhand News: रामगढ़ के सरकारी वकील की याचिका पर राष्ट्रपति सचिवालय का बड़ा कदम

इस पूरे मामले की शुरुआत रामगढ़ निवासी और सरकारी वकील संजीव कुमार अंबष्ठा द्वारा भेजी गई एक विस्तृत याचिका से हुई। संजीव कुमार ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर जादूगोड़ा क्षेत्र की भयावह स्थिति से अवगत कराया था। उन्होंने अपनी याचिका में वैज्ञानिक तथ्यों और स्थानीय लोगों की व्यथा का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के खनन कार्यों ने क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर दिया है। राष्ट्रपति सचिवालय ने इस पत्र का संज्ञान लेते हुए इसे बेहद महत्वपूर्ण माना है। राष्ट्रपति भवन के अवर सचिव लक्ष्मी महारा भूशनम ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया है कि इस मामले में जो भी जरूरी कार्रवाई की जा रही है, उसकी पूरी जानकारी सीधे याचिकाकर्ता को भी उपलब्ध कराई जाए।

यूरेनियम रेडिएशन से घुटती सांसें और जन्मजात बीमारियों का बढ़ता खतरा

जादूगोड़ा और उसके आसपास के गांवों में रहने वाले आदिवासियों के लिए यूरेनियम का यह भंडार किसी अभिशाप से कम साबित नहीं हो रहा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि खनन से निकलने वाले अपशिष्ट और विकिरण के कारण क्षेत्र में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यहां जन्म लेने वाले बच्चों में शारीरिक विकृतियां देखी जा रही हैं। कई बच्चे जन्म से ही मानसिक रूप से कमजोर या दिव्यांग पैदा हो रहे हैं। इसके अलावा महिलाओं में बांझपन और त्वचा संबंधी बीमारियों की दर राज्य के अन्य हिस्सों की तुलना में बहुत अधिक है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हवा और पानी में रेडिएशन का स्तर इतना बढ़ गया है कि अब वहां सांस लेना भी मुश्किल हो रहा है।

पर्यावरण और आजीविका पर यूरेनियम का काला साया

यूरेनियम खनन का असर सिर्फ इंसानों के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने झारखंड की प्राकृतिक संपदा को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। याचिका में दावा किया गया है कि खनन और टेलिंग पॉन्ड्स से निकलने वाला जहरीला कचरा भूजल स्तर में मिल रहा है। इससे पीने का पानी दूषित हो गया है और कृषि भूमि बंजर होती जा रही है। किसान शिकायत कर रहे हैं कि उनकी फसलों की पैदावार कम हो गई है और जो अनाज पैदा हो रहा है, उसमें भी विकिरण के अंश पाए जाने की आशंका है। इसके साथ ही पशुधन पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है। आदिवासियों के लिए उनकी जमीन और जंगल ही उनकी पहचान हैं, लेकिन विस्थापन की तलवार ने उनकी आजीविका और संस्कृति दोनों को खतरे में डाल दिया है।

मजदूरों की सुरक्षा और यूसीआईएल के सुरक्षा मानकों पर उठे गंभीर सवाल

सरकारी वकील संजीव कुमार अंबष्ठा ने अपनी याचिका में यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड की कार्यप्रणाली पर भी तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि खदानों में काम करने वाले स्थानीय मजदूरों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप सुरक्षा उपकरण नहीं दिए जाते। कई मजदूरों को यह भी नहीं पता होता कि वे हर दिन किस स्तर के खतरनाक विकिरण के संपर्क में आ रहे हैं। उनकी नियमित स्वास्थ्य जांच की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है और न ही उन्हें रेडिएशन के खतरों के प्रति जागरूक किया गया है। विस्थापित परिवारों को उचित मुआवजा और पुनर्वास की सुविधा न मिलना भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। आदिवासी परिवारों को अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ने पर मजबूर तो किया गया, लेकिन उन्हें बदले में बेहतर जीवन देने का वादा पूरा नहीं हुआ।

स्वतंत्र जांच और विशेष कल्याण पैकेज की उठी मांग

राष्ट्रपति को भेजी गई इस याचिका में केवल समस्याएं ही नहीं गिनाई गई हैं, बल्कि कुछ ठोस समाधानों की भी मांग की गई है। संजीव कुमार अंबष्ठा ने मांग की है कि जादूगोड़ा क्षेत्र में रेडिएशन के स्तर की जांच किसी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय स्तर की वैज्ञानिक एजेंसी से कराई जाए। इसके अलावा पूरे क्षेत्र में व्यापक स्वास्थ्य सर्वेक्षण होना चाहिए ताकि प्रभावित लोगों की पहचान की जा सके। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि प्रभावितों को मुफ्त और उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा मिलनी चाहिए। साथ ही विस्थापितों के लिए एक विशेष पुनर्वास नीति और आदिवासी समुदायों के विकास के लिए एक विशेष कल्याण पैकेज लागू किया जाना चाहिए।

Jharkhand News: झारखंड सरकार के जवाब पर टिकी सबकी नजरें

राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा रिपोर्ट मांगे जाने के बाद अब गेंद झारखंड सरकार के पाले में है। सरकार को अब यह बताना होगा कि जादूगोड़ा के लोगों की सुरक्षा के लिए उसने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं। क्या सरकार ने कभी रेडिएशन के स्तर की स्वतंत्र जांच करवाई है? और विस्थापित परिवारों के पुनर्वास की वर्तमान स्थिति क्या है? क्षेत्र के लोग और पर्यावरण प्रेमी इस मामले में सरकार के रुख का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। जादूगोड़ा का यह मामला केवल एक खदान का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह विकास और मानवाधिकारों के बीच के संघर्ष की एक बड़ी कहानी है। राष्ट्रपति के हस्तक्षेप के बाद अब यह उम्मीद जगी है कि दशकों से अंधेरे में जी रहे जादूगोड़ा के लोगों को न्याय मिल सकेगा और उनकी आने वाली पीढ़ी एक सुरक्षित वातावरण में सांस ले पाएगी।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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