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लांगटांग ग्लेशियर को 2015 के गोरखा भूकंप ने किया कमजोर? IIT प्रोफेसर का बड़ा दावा, नेपाल में तबाही की नई वजह आई सामने

Mandi/Nepal: नेपाल में 26 अगस्त 2026 को ग्लेशियर से जुड़ी भीषण आपदा के बाद अब इसके कारणों को लेकर नया दावा सामने आया है। आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के संस्थापक अध्यक्ष एवं एसोसिएट प्रोफेसर डेरेक्स पी. शुक्ला के प्रारंभिक आकलन के अनुसार, वर्ष 2015 में आए विनाशकारी गोरखा भूकंप ने लांगटांग ग्लेशियर की संरचना को कमजोर कर दिया था।

उनका कहना है कि इसी के बाद ग्लेशियर का एक हिस्सा अस्थिर होकर हैंगिंग ग्लेशियर की स्थिति में पहुंच गया और वर्षों बाद इसके टूटने से भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा नीचे आया।

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने भी 26 अगस्त की घटना को ग्लेशियर से जुड़ी तीव्र ढलान विफलता के बाद उत्पन्न मलबा प्रवाह और बाढ़ के रूप में दर्ज किया है।

बदली ग्लेशियर की संरचना Photo AI

गोरखा भूकंप के बाद बदली ग्लेशियर की संरचना

प्रो. शुक्ला के मुताबिक, 2015 के गोरखा भूकंप के दौरान लांगटांग क्षेत्र में भारी भूगर्भीय हलचल हुई थी। इसके बाद ग्लेशियर के एक हिस्से में संरचनात्मक बदलाव आया और वह अपनी मूल स्थिति से अलग होकर ऊंचाई पर अस्थिर रूप में बना रहा।

उन्होंने सैटेलाइट तस्वीरों, उपलब्ध फोटो-वीडियो, आधुनिक भू-स्थानिक तकनीक और भूवैज्ञानिक तथ्यों की मदद से ग्लेशियर की पुरानी और मौजूदा स्थिति की तुलना की। प्रारंभिक विश्लेषण में भूकंप के बाद ग्लेशियर की संरचना में बदलाव के संकेत मिले हैं। हालांकि, यह अभी अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं है और घटना के सटीक कारणों की पुष्टि के लिए विस्तृत अध्ययन जरूरी है।

26 अगस्त को टूटा ग्लेशियर का हिस्सा

26 अगस्त को लांगटांग क्षेत्र में ग्लेशियर से जुड़ी भारी ढलान विफलता के बाद बर्फ, चट्टान और मलबे का विशाल प्रवाह नीचे की ओर आया। USGS के अनुसार, इससे बना मलबा प्रवाह और बाढ़ करीब 100 किलोमीटर तक नीचे की ओर पहुंचा और लेंदे खोला तथा त्रिशूली खोला नदी क्षेत्र समेत कई इलाकों को प्रभावित किया। चीन-नेपाल सीमा पर स्थित रसुवागढ़ी क्षेत्र में भी भारी नुकसान हुआ।

हैंगिंग ग्लेशियर Photo AI

क्यों खतरनाक होता है हैंगिंग ग्लेशियर?

प्रो. शुक्ला के अनुसार, ऊंचाई पर अस्थिर स्थिति में मौजूद हैंगिंग ग्लेशियर के टूटने पर सिर्फ बर्फ ही नीचे नहीं आती, बल्कि उसके साथ बड़ी मात्रा में चट्टान और मलबा भी तेज गति से नीचे की ओर बह सकता है। यही वजह है कि ऐसी घटनाओं का असर सामान्य ग्लेशियर टूटने की तुलना में कहीं ज्यादा व्यापक हो सकता है।

उनका कहना है कि लांगटांग क्षेत्र पहले भी फ्लैश फ्लड और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित रहा है। इसलिए इस पूरे क्षेत्र की भूगर्भीय और ग्लेशियर संबंधी अस्थिरता का विस्तृत अध्ययन जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन या भूकंप—क्या है मुख्य वजह?

नेपाल की इस आपदा के पीछे जलवायु परिवर्तन को भी एक महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है। हालिया रिपोर्टों में ग्लेशियर के ढहने के बाद आई बाढ़ और मलबे से बड़े पैमाने पर नुकसान की पुष्टि हुई है।

वहीं प्रो. शुक्ला का दावा है कि केवल जलवायु परिवर्तन को इस घटना की वजह मानना पर्याप्त नहीं होगा। उनके अनुसार, 2015 के भूकंप से ग्लेशियर में आया संरचनात्मक बदलाव भी इसकी अस्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि, इस पर निर्णायक निष्कर्ष के लिए वैज्ञानिकों द्वारा विस्तृत डेटा और फील्ड स्टडी की जरूरत होगी।

नेपाल में भारी तबाही Photo AI

नेपाल में भारी तबाही

26 अगस्त की आपदा के बाद नेपाल में बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ। 3 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल में कम से कम 1,252 लोगों की मौत हुई थी और 4,200 से अधिक लोग लापता बताए गए थे। करीब 7,500 घर पूरी तरह नष्ट होने और लगभग 20,000 घरों के पुनर्निर्माण की जरूरत का अनुमान लगाया गया है।

विशेषज्ञ की विशेषज्ञता

प्रो. डेरेक्स पी. शुक्ला रिमोट सेंसिंग, जियोग्राफिकल इंफॉर्मेशन सिस्टम (GIS), भूस्खलन, पर्माफ्रॉस्ट, प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरण भूविज्ञान के क्षेत्र में काम करते हैं। हिमालयी क्षेत्रों में भू-आकृतिक बदलावों को समझने के लिए वे सैटेलाइट डेटा और आधुनिक भू-स्थानिक तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं।

नोट: लांगटांग ग्लेशियर की मौजूदा आपदा में 2015 के भूकंप की भूमिका फिलहाल प्रो. शुक्ला के प्रारंभिक आकलन/दावे के रूप में सामने आई है। इसे अंतिम वैज्ञानिक कारण के रूप में प्रस्तुत करने से पहले विस्तृत अध्ययन के निष्कर्षों का इंतजार जरूरी है।

Ragav Kalia
Author: Ragav Kalia

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