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नागपुर में आरएसएस शताब्दी समारोह: मोहन भागवत ने पहलगाम हमले और राष्ट्रीय एकता पर दिया जोर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर नागपुर में शताब्दी समारोह का आयोजन किया। इस मौके पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने देश को संबोधित करते हुए कई अहम मुद्दों पर अपने विचार रखे। उन्होंने विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र किया, जिसमें सीमापार से आए आतंकवादियों ने धर्म पूछकर 26 निर्दोष भारतीय नागरिकों की हत्या कर दी थी।

भागवत ने कहा कि इस भीषण घटना के बाद सरकार का दृढ़ संकल्प, सेना की बहादुरी और समाज की एकता सामने आई। उन्होंने बताया कि पूरी तैयारी के साथ भारतीय सेना ने इस हमले का कड़ा जवाब दिया, जिससे देश और दुनिया को भारत की क्षमता का अहसास हुआ।

देश शोक और गुस्से में था

भागवत ने कहा कि पहलगाम की घटना से पूरा देश गुस्से और शोक में था। लेकिन सरकार, सेना और जनता की एकजुटता ने इस मुश्किल घड़ी में एक आदर्श वातावरण बनाया। उन्होंने यह भी कहा कि इस हमले और उसके बाद हुई कार्रवाई ने भारत के सच्चे मित्र और छिपे हुए विरोधियों की पहचान करा दी।

संघ प्रमुख ने यह भी चेताया कि देश के भीतर मौजूद कुछ असंवैधानिक ताकतें लगातार अस्थिरता फैलाने की कोशिश करती रहती हैं, जिनसे सतर्क रहने की आवश्यकता है।

हिंसक आंदोलनों से बचने की अपील

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि जब सरकार जनता से दूर हो जाती है और उनकी समस्याओं को नजरअंदाज करती है, तो असंतोष पैदा होता है। लेकिन इसे हिंसा का रूप देना किसी भी हाल में लाभकारी नहीं है।
उन्होंने कहा, “इतिहास गवाह है कि हिंसक क्रांतियों ने अपने लक्ष्य पूरे नहीं किए, बल्कि विदेशी ताकतों को हस्तक्षेप का मौका दिया। ऐसे आंदोलनों का नतीजा अक्सर समाज और राष्ट्र के लिए हानिकारक साबित होता है।”

भारत की ओर देख रही है दुनिया

संघ प्रमुख ने कहा कि आज दुनिया भारत से उम्मीद कर रही है कि वह वैश्विक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करे। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को अपने आचरण और आदर्शों से विश्व के सामने एक नई राह दिखानी होगी।

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अपने भाषण में भागवत ने गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहादत और महात्मा गांधी जयंती का भी स्मरण किया। उन्होंने कहा कि जिन्होंने अन्याय और उत्पीड़न से समाज की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए, वे सच्चे प्रेरणा स्रोत हैं और उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

Vaibhav tiwari
Author: Vaibhav tiwari

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