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महिला आरक्षण बिल पर विपक्ष का दोहरा रुख, आरक्षण के पक्ष में, परिसीमन के सख्त खिलाफ

Mahila Arakshan Bill: संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े तीन बड़े बिल आने से पहले विपक्ष ने अपनी रणनीति तय कर ली है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के दिल्ली स्थित घर पर बुधवार को एक अहम बैठक हुई जिसमें राहुल गांधी समेत तृणमूल कांग्रेस, आरजेडी, शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी शरद गुट और आम आदमी पार्टी के नेता शामिल हुए। बैठक के बाद साफ हो गया कि विपक्ष महिला आरक्षण का समर्थन करता है लेकिन परिसीमन के प्रस्ताव को वह किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा।

खड़गे की बैठक में क्या तय हुआ

Mahila Arakshan Bill

मल्लिकार्जुन खड़गे ने बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा कि विपक्ष महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है। उनकी मांग है कि मौजूदा 543 लोकसभा सीटों के आधार पर ही 33 फीसदी आरक्षण लागू किया जाए और यह 2029 के चुनाव से तुरंत लागू हो। लेकिन सरकार जो परिसीमन का प्रावधान लेकर आ रही है, उसे वे राजनीतिक मंशा से उठाया गया कदम मानते हैं। खड़गे ने कहा कि सरकार महिला आरक्षण की आड़ में असल में विपक्ष को दबाने और सत्ता को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

बैठक में दो बातें सबसे प्रमुख रहीं। पहली, महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण अभी और तुरंत मिलना चाहिए, बिना किसी नई शर्त के। दूसरी, परिसीमन बिल का पूरा विपक्ष लोकसभा और राज्यसभा दोनों में विरोध करेगा और इसके खिलाफ वोट देगा।

क्या है सरकार का प्रस्ताव

केंद्र सरकार 16, 17 और 18 अप्रैल को चलने वाले संसद के विशेष सत्र में तीन बड़े बिल लाने जा रही है। इनमें संविधान का 131वां संशोधन बिल, परिसीमन विधेयक संशोधन और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन बिल शामिल हैं। सरकार का इरादा लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 तक करने का है।

इन नई सीटों में से करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी जो कुल सीटों का 33 फीसदी है। यह आरक्षण 15 साल यानी 2029, 2034 और 2039 के लोकसभा चुनावों के लिए होगा। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल दो बिल पेश करेंगे और गृह मंत्री अमित शाह एक बिल लाएंगे। तीनों बिलों पर चर्चा के लिए 18 घंटे का वक्त तय किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चर्चा के दौरान अपनी बात रख सकते हैं।

राहुल गांधी का सीधा आरोप

राहुल गांधी ने इस पूरे मामले पर बेहद सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि सरकार जो प्रस्ताव ला रही है उसका महिला आरक्षण से कोई असली संबंध नहीं है। यह संशोधन और परिसीमन के जरिए चुनावी क्षेत्रों में मनमाने बदलाव करके सत्ता पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश है। राहुल ने कहा कि वे ओबीसी, दलित और आदिवासियों के हक की चोरी नहीं होने देंगे और दक्षिणी, उत्तर-पूर्वी और छोटे राज्यों के साथ किसी भी तरह का अन्याय नहीं होने देंगे।

दक्षिण के दलों की चिंता सबसे गहरी

इस पूरी बहस में दक्षिण भारत के दलों की चिंता सबसे ज्यादा दिख रही है। डीएमके के नेता टी आर बालू ने कहा कि 2023 में जो महिला आरक्षण बिल पारित हुआ था, उसे उसी मूल भावना के साथ लागू किया जाना चाहिए। आरएसपी सांसद एन के प्रेमचंद्रन ने कहा कि परिसीमन और संविधान संशोधन के जरिए सरकार अनुच्छेद 81 के तीसरे खंड में बदलाव करना चाहती है। इससे उत्तर भारत में सीटें बड़ी तेजी से बढ़ेंगी जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटें घट जाएंगी। उन्होंने इसे लोकतंत्र के खिलाफ बताया।

तमिलनाडु में एक नई राजनीतिक ताकत के रूप में उभरे टीवीके के अध्यक्ष विजय ने भी परिसीमन को पक्षपातपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि अगर यह बिल पास हो गया तो दक्षिणी और उत्तरी राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व की खाई और बड़ी हो जाएगी। आईयूएमएल सांसद ई टी मोहम्मद बशीर ने कहा कि परिसीमन बिल असल में एक जाल है। सरकार 2023 में ही आरक्षण दे सकती थी लेकिन उसने नहीं दिया। अब यह संवैधानिक संशोधन खतरनाक है।

किन राज्यों में कितनी सीटें बढ़ेंगी

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अगर यह बिल पास हो गया तो उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 40 नई लोकसभा सीटें जुड़ेंगी और कुल सीटें 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। महाराष्ट्र में 48 से बढ़कर 72 सीटें होंगी और महिलाओं के लिए 24 सीटें आरक्षित होंगी। बिहार में कुल सीटें 40 से 60 तक पहुंच सकती हैं। मध्य प्रदेश में 15 महिला आरक्षित सीटें बढ़ने का अनुमान है। तमिलनाडु में 20 और दिल्ली में 4 महिला आरक्षित सीटें होंगी। झारखंड में भी 7 नई महिला आरक्षित सीटें आने का अनुमान है।

इन आंकड़ों को देखकर समझ आता है कि उत्तर भारत के बड़े राज्यों को परिसीमन से सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा जबकि दक्षिण के राज्य अपेक्षाकृत कम फायदे में रहेंगे। यही वजह है कि दक्षिणी दल इस प्रस्ताव पर सबसे ज्यादा नाराज हैं।

पीओके के लिए भी सीटों का प्रावधान

इस बिल में एक और दिलचस्प और अहम पहलू यह है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यानी पीओके के लिए भी संसदीय सीटों का प्रावधान किया गया है। हालांकि ये सीटें फिलहाल खाली रखी जाएंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत के इस रुख को दोहराता है कि पीओके उसका अभिन्न हिस्सा है और भविष्य के राजनीतिक ढांचे में उसकी जगह पहले से तय की जा रही है।

क्या सरकार बिल पास करा पाएगी

यह सबसे बड़ा सवाल है। संविधान में संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत होती है। इसका मतलब है कि कुल सदस्यों का 50 फीसदी से ज्यादा और उपस्थित सदस्यों का दो तिहाई समर्थन चाहिए। लोकसभा की मौजूदा 540 भरी सीटों में से कम से कम 360 सांसदों को पक्ष में वोट देना होगा। लेकिन अभी एनडीए के पास केवल 292 सांसद हैं और विपक्ष के पास 233। 15 सांसद किसी भी गुट में नहीं हैं।

इस गणित को देखें तो सरकार को बिल पास कराने के लिए बड़े पैमाने पर सहमति बनानी होगी। विपक्ष के एकजुट रहने पर सरकार के लिए दो तिहाई बहुमत जुटाना बेहद मुश्किल होगा। इसीलिए माना जा रहा है कि सरकार पर्दे के पीछे बातचीत जरूर कर रही होगी।

Mahila Arakshan Bill: परिसीमन की नई व्यवस्था क्या होगी

अभी तक लोकसभा सीटों का आधार 1971 की जनगणना थी जो 2026 तक मान्य थी। नए बिल में इसे बदलकर 2011 की जनगणना को आधार बनाने का प्रस्ताव है। साथ ही संसद को यह अधिकार मिलेगा कि वह एक साधारण कानून बनाकर तय कर सके कि भविष्य में परिसीमन किस जनगणना के आधार पर होगा। नया परिसीमन आयोग बनेगा जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या पूर्व जज करेंगे। इस आयोग का फैसला अंतिम होगा और उसे किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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