PM Fasal Bima Yojana: बिहार और झारखंड में खेती करना आज भी एक तरह से जुआ खेलने जैसा है। मॉनसून समय पर आ जाए तो ठीक, वरना कभी सूखा तो कभी बाढ़ किसान की मेहनत पर पानी फेर देती है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर किसान इस अनिश्चितता से बचे तो कैसे बचे? इसी सवाल का जवाब देती है केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, जो कम प्रीमियम में किसानों को फसल बर्बादी के जोखिम से एक हद तक सुरक्षा कवच देती है।
खास बात यह है कि इस योजना का फायदा सिर्फ उन्हीं किसानों को नहीं मिलता जिन्होंने बैंक से किसान क्रेडिट कार्ड यानी KCC के जरिए कर्ज लिया है। बिना कर्ज लिए खेती करने वाले किसान भी इससे उतनी ही आसानी से जुड़ सकते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि फसल बर्बाद होने पर पैसा हाथ में आने तक की पूरी प्रक्रिया कितनी आसान या मुश्किल है, यही जानना हर किसान के लिए जरूरी है।
PM Fasal Bima Yojana: कितना प्रीमियम देना पड़ता है किसान को
इस योजना की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इसका प्रीमियम बहुत ज्यादा नहीं है। धान और मक्के जैसी खरीफ फसलों के लिए किसान को बीमा राशि का महज 2 फीसदी प्रीमियम चुकाना होता है। वहीं गेहूं और चना जैसी रबी फसलों के लिए यह दर और भी कम, यानी सिर्फ 1.5 फीसदी है। बागवानी और कमर्शियल फसलों पर प्रीमियम थोड़ा ज्यादा, यानी 5 फीसदी तय किया गया है।
यहां एक दिलचस्प बात यह है कि बाकी बचा हुआ प्रीमियम किसान की जेब से नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर सब्सिडी के तौर पर भरती हैं। यानी किसान जितना प्रीमियम भरता है, असल बीमा कवर उससे कहीं ज्यादा बड़ा होता है। जानकार बताते हैं कि यही वजह है कि यह योजना छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी व्यावहारिक मानी जाती है।
बुआई से पहले भी मिल सकता है मुआवजा
आमतौर पर लोग यही समझते हैं कि फसल बीमा का फायदा तभी मिलता है जब खेत में खड़ी फसल बर्बाद हो जाए। लेकिन यहीं पर एक ट्विस्ट है। अगर कम बारिश या सूखे की वजह से किसान खेत तैयार करने के बावजूद बीज ही नहीं बो पाते, तो भी उन्हें बीमा राशि का 25 फीसदी तक क्लेम मिल सकता है। यानी नुकसान फसल कटने से पहले, बुआई की स्टेज पर ही हो जाए तो भी किसान खाली हाथ नहीं रहता।
यह प्रावधान खासकर उन इलाकों के लिए काफी मायने रखता है जहां मॉनसून की बेरुखी आम बात है। सूखे के हालात में खेत तैयार करने में लगी मेहनत और पैसा दोनों बेकार न जाएं, इसी सोच के साथ यह नियम बनाया गया लगता है।
खड़ी फसल और कटाई के बाद भी सुरक्षा
फसल बीमा योजना का दायरा सिर्फ बुआई तक सीमित नहीं है। खेत में खड़ी फसल अगर बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि, कीट के हमले या किसी बीमारी की वजह से बर्बाद होती है, तो नुकसान का आंकलन कर उसकी भरपाई की जाती है। यह वह स्टेज है जिससे बिहार और झारखंड के ज्यादातर किसान परिचित हैं, क्योंकि अचानक आई बाढ़ या बेमौसम बारिश अक्सर महीनों की मेहनत मिनटों में बर्बाद कर देती है।
इतना ही नहीं, फसल कटने के बाद भी खतरा पूरी तरह टलता नहीं है। अगर फसल काटकर खेत में सुखाने के लिए रखी गई है और 14 दिनों के भीतर चक्रवात, बेमौसम बारिश या ओलावृष्टि से वह खराब हो जाए, तो व्यक्तिगत स्तर पर किसान को क्लेम मिलता है। मामला कुछ इस तरह से है कि योजना खेती के लगभग हर चरण को कवर करने की कोशिश करती है, बुआई से लेकर कटाई के बाद तक।
नुकसान होने पर क्लेम पाने का तरीका
अब बात आती है सबसे जरूरी हिस्से की, यानी नुकसान होने पर पैसा मिलेगा कैसे। नियम के मुताबिक किसी भी आपदा से फसल को नुकसान पहुंचने पर किसान को 72 घंटे के भीतर इसकी सूचना देनी होती है। यह जानकारी फसल बीमा ऐप, टोल-फ्री नंबर 14447, बैंक शाखा या स्थानीय कृषि अधिकारी के जरिए दी जा सकती है।
सूचना मिलते ही सर्वे टीम खेत पर पहुंचकर नुकसान का जायजा लेती है। इसके बाद स्वीकृत क्लेम की राशि सीधे किसान के आधार से जुड़े बैंक खाते में डीबीटी के जरिए भेज दी जाती है। यानी बिचौलियों की कोई गुंजाइश नहीं बचती, पैसा सीधा किसान के हाथ में पहुंचता है। यही पारदर्शिता इस योजना को बाकी सरकारी योजनाओं से अलग खड़ा करती है।
PM Fasal Bima Yojana: बिहार-झारखंड के किसानों के लिए क्यों जरूरी है यह योजना
अब सवाल यह उठता है कि आखिर बिहार और झारखंड के किसानों के लिए यह योजना इतनी अहम क्यों मानी जा रही है। दरअसल इन दोनों राज्यों में सिंचाई के साधन आज भी सीमित हैं, और बड़ी आबादी मॉनसून पर निर्भर खेती करती है। ऐसे में अगर बारिश धोखा दे जाए, तो पूरे साल की कमाई खतरे में पड़ जाती है।
फसल बीमा योजना इसी अनिश्चितता के खिलाफ एक तरह की आर्थिक ढाल का काम करती है। कम प्रीमियम में बड़ा कवर मिलना, बुआई से लेकर कटाई तक हर स्टेज पर सुरक्षा, और क्लेम की रकम सीधे बैंक खाते में आना, ये तीनों बातें मिलकर इसे आम किसान के लिए भरोसेमंद विकल्प बनाती हैं। जिन किसानों ने अभी तक इस योजना से खुद को नहीं जोड़ा है, उनके लिए यह जानकारी काम की साबित हो सकती है, खासकर उन इलाकों में जहां हर साल किसी न किसी वजह से फसल को खतरा बना रहता है। खेती में जोखिम कभी खत्म नहीं होता, लेकिन सही जानकारी और समय पर उठाया गया कदम नुकसान की भरपाई का रास्ता जरूर खोल सकता है।
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Sanjana Gupta
Hindi Content Writer | New Media Kiran
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