वाराणसी: जिदगी भर कृष्णमूर्ति ने एक ही बात दोहराई – “सच को कोई रास्ता नहीं ले जाता, सच एक जीवित चीज़ है।” वो न गुरु बनना चाहते थे, न शिष्य। फिर भी लाखों लोग उन्हें सुनने आते थे। आज उनकी 130वीं जयंती के आसपास फिर से उनकी वो 8 बातें जो तुम्हारे अंदर की सारी गांठें खोल देंगी।
1929 का वो दिन जब कृष्णमूर्ति ने अपना संगठन ही तोड़ दिया
हज़ारों लोग इकट्ठा थे। वो मंच पर खड़े हुए और बोले – “Truth is a pathless land. मैं कोई गुरु नहीं हूँ ही नहीं, और आपको भी किसी गुरु की ज़रूरत नहीं।” उसी पल उन्होंने अपना बनाया संगठन भंग कर दिया। लोग रोने लगे। वो मुस्कुरा रहे थे। क्योंकि वो जानते थे – जिस दिन तुम किसी के पीछे चलोगे, उस दिन तुम खुद से भाग जाओगे।
तुम्हारा सबसे बड़ा डर सचमे क्या है?
लोग कहते हैं – मौत का डर, अकेलेपन का डर, नाकामी का डर। कृष्णमूर्ति हँसते और कहते – “तुम्हें सबसे ज़्यादा डर इस बात का है कि कहीं तुम्हें पता न चल जाए कि तुम वास्तव में कौन हो।” डॉक्टर, इंजीनियर, अच्छा इंसान, सक्सेसफुल – ये सब तुम्हारे चेहरे पर चिपके लेबल हैं। इन लेबलों को हटाकर देखो – नीचे तुम पहले से पूरे हो।
प्यार के नाम पर हम सबसे बड़ा धोखा खुद से करते हैं
हम सोचते हैं प्यार में दूसरा चाहिए। कृष्णमूर्ति कहते थे – “जब तक तुम्हें खुद से प्यार नहीं, तुम किसी और से भी प्यार नहीं कर सकते।” जब तुम कहते हो “मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूँ” – वो प्यार नहीं, भीख है। सचमे प्यार तब होता है जब दो पूरे लोग मिलते हैं, न कि दो अधूरे एक-दूसरे को ठीक करने की कोशिश करते हैं।
ध्यान कोई तकनीक नहीं, जिदगी जीने का तरीका है
हम ध्यान के नाम पर आँख बंद करके बैठते हैं। कृष्णमूर्ति हँसते थे – “ध्यान वो पल है जब दिमाग पूरी तरह खामोश हो जाता है – बिना किसी प्रयास के।” सुबह चाय पीते वक्त सिर्फ़ चाय पी रहे हो, न अतीत, न भविष्य – वो ध्यान है। किसी की बात बिना जजमेंट के सुन रहे हो – वो ध्यान है।**
रिश्तों में दुख क्यों है?
क्योंकि हम एक-दूसरे को बदलना चाहते हैं। कृष्णमूर्ति कहते थे – “तुम किसी को प्यार नहीं करते, तुम उसकी बनाई हुई उसकी तस्वीर को प्यार करते हो।” जब वो तस्वीर टूटती है, दुख होता है। उसे वैसा ही देखो जैसा वो है – गंदगी समेत। तब देखो दुख कहाँ रह जाता है।
मौत के बारे में वो बात जो रोंगटे खड़े कर दे
लोग पूछते थे – “मरने के बाद क्या होगा?” वो मुस्कुराते और कहते – “तुम अभी जी नहीं रहे, मरने के बाद क्या जियोगे?” जो रोज़ डरते हुए, चिंता में, पछतावे में जी रहा है – वो पहले से मरा हुआ है। जो हर पल को पूरी तरह जीता है, उसके लिए मौत भी एक और पल है।
मरने से पहले कृष्णमूर्ति ने आखिरी बार क्या कहा
1986 में वो बीमार थे। लोग रो रहे थे। वो शांत लेटे थे। आखिरी शब्द थे – “मैं जा रहा हूँ। लेकिन तुम कहाँ जा रहे हो? तुम अभी भी भाग रहे हो ना?” फिर मुस्कुराए और चले गए। जैसे कह रहे हों – मैंने अपना काम कर दिया। अब तुम करो।



