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क्या इस बार ममता के किले को भेद पाएगी बीजेपी? जानें क्या है चुनौतियां

West Bengal Election: बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की जबरदस्त जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी ने अपना अगला निशाना साफ कर दिया है – पश्चिम बंगाल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार की जीत के बाद कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि गंगा जो बिहार से बहते हुए बंगाल तक पहुंचती है, उसी तरह बिहार ने बंगाल में बीजेपी की विजय का रास्ता भी बना दिया है। उन्होंने बंगाल की जनता को आश्वासन दिया कि बीजेपी वहां से “जंगलराज” को उखाड़ फेंकेगी।

यह टिप्पणी राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि पश्चिम बंगाल में 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं। बिहार में 14 नवंबर को नतीजों के शुरुआती रुझान आते ही बीजेपी की पश्चिम बंगाल इकाई ने एक्स पर पोस्ट किया – “अब पश्चिम बंगाल”। लेकिन सवाल यह है कि क्या बिहार की सफलता को पश्चिम बंगाल में दोहराया जा सकता है?

2021 का चुनावी समीकरण

West Bengal Election
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पश्चिम बंगाल में पिछला चुनाव 2021 की गर्मियों में कोविड-19 की दूसरी और अत्यंत खतरनाक लहर के बीच हुआ था। राज्य में विधानसभा की 294 सीटें हैं। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी को करारी शिकस्त दी थी। टीएमसी ने 215 सीटें जीती थीं जबकि बीजेपी को केवल 77 सीटें मिली थीं।

वोट शेयर की बात करें तो टीएमसी को लगभग 48 प्रतिशत वोट मिले थे और बीजेपी को 38 प्रतिशत। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि हालांकि बीजेपी ने वोट प्रतिशत में अच्छी वृद्धि की थी, लेकिन सीटों में परिवर्तन नहीं हो पाया। पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने कभी भी सरकार नहीं बनाई है और यह राज्य पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

2021 के चुनाव में बीजेपी ने जोरदार प्रचार किया था। प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कई रैलियां कीं। लेकिन ममता बनर्जी की “बंगाल की बेटी” की छवि और टीएमसी की मजबूत जमीनी संगठन ने बीजेपी की लहर को रोक दिया।

एसआईआर विवाद का साया

बिहार में चुनाव से पहले गहन मतदाता पुनरीक्षण यानी एसआईआर हुआ था, जिस पर काफी विवाद हुआ। विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के दौरान जानबूझकर कुछ समुदायों के मतदाताओं के नाम हटाए गए। बिहार में हार स्वीकार करते हुए भी कांग्रेस के नेताओं ने एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाए।

भारत के निर्वाचन आयोग के अनुसार, बिहार के बाद एसआईआर का दूसरा चरण नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहा है, जिसमें पश्चिम बंगाल भी शामिल है। कई विपक्षी पार्टियों ने इस प्रक्रिया पर भी चिंता जताई है।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर लिखा कि बिहार में जो खेल एसआईआर ने किया है, वह पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और अन्य जगहों पर नहीं हो पाएगा क्योंकि इस चुनावी साजिश का अब भंडाफोड़ हो चुका है। उन्होंने कहा कि विपक्षी दल अब सतर्क रहेंगे।

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एसआईआर प्रक्रिया को “पिछले दरवाजे से एनआरसी लाने की चाल” बताया है। उन्होंने कहा है कि यह प्रक्रिया विशेष रूप से अल्पसंख्यकों और गरीबों को निशाना बढ़ने के लिए है। टीएमसी ने इस मुद्दे को बड़ा बनाया है और इसे चुनाव में एक प्रमुख मुद्दा बनाने की योजना है।

महिला मतदाताओं की भूमिका

बिहार के नतीजों के विस्तृत विश्लेषण से यह स्पष्ट हो रहा है कि नीतीश कुमार ने महिला मतदाताओं को अपनी मुख्य ताकत के रूप में जोड़ने में सफलता पाई। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, बिहार के इस चुनाव में महिला मतदाताओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक रही।

ममता बनर्जी भारत में उन गिनी-चुनी महिला मुख्यमंत्रियों में से एक हैं। उन्हें भी अक्सर महिला मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने का श्रेय दिया जाता है। उनकी सरकार ने कई योजनाएं शुरू कीं जो सीधे महिलाओं और लड़कियों के लिए हैं। लक्ष्मीर भंडार योजना के तहत गरीब परिवारों की महिलाओं को मासिक वित्तीय सहायता दी जाती है। कन्याश्री प्रकल्प लड़कियों को पढ़ाई जारी रखने के लिए आर्थिक मदद देती है।

हालांकि, हाल के समय में राज्य में महिलाओं के साथ यौन हिंसा की कई गंभीर घटनाएं हुईं, विशेष रूप से आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना ने पूरे देश को हिला दिया। बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। इसके बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या अब भी महिला वर्ग पर ममता की उतनी ही मजबूत पकड़ है। बीजेपी इसी मुद्दे को उठाकर महिला मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है।

बिहार और पश्चिम बंगाल: समानताएं और अंतर

दोनों राज्यों की सीमाएं पड़ोसी देशों से लगती हैं। बिहार की नेपाल से और पश्चिम बंगाल की बांग्लादेश और नेपाल से। ये सीमाएं कई जगह खुली हैं और यहां से विदेशी नागरिकों के अनियंत्रित प्रवेश के आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं। बीजेपी दोनों राज्यों में घुसपैठ का मुद्दा उठाती रही है।

दोनों राज्यों की प्रति व्यक्ति सालाना आय राष्ट्रीय औसत से कम है। लेकिन कई मामलों में दोनों अलग भी हैं। नीति आयोग के अनुसार, पश्चिम बंगाल की मौजूदा प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 154000 रुपये से अधिक है, जो बिहार के 60337 रुपये से दोगुनी है। यह आर्थिक अंतर महत्वपूर्ण है।

मतदाताओं की संख्या में भी अंतर है। बिहार में एसआईआर के बाद 7.4 करोड़ से अधिक मतदाता हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में अक्टूबर 2025 तक 7.6 करोड़ से अधिक मतदाता थे। सबसे बड़ा अंतर यह है कि बिहार में बीजेपी सरकार में थी और उसकी क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मजबूत मौजूदगी थी, जबकि पश्चिम बंगाल में वह विपक्ष में है।

विशेषज्ञों की राय

ममता बनर्जी और अखिलेश यादव दोनों बिहार चुनाव के नतीजों को बहुत ध्यान से देख रहे होंगे। उनका कहना है कि ममता शायद चुनाव आयोग के खिलाफ और अधिक आक्रामक होंगी। उनके बारे में एक खास बात है – वह बहुत जल्दी सीखती हैं। बिहार में महागठबंधन की असफलता से सबक लेकर वह बीजेपी के खिलाफ अधिक संगठित और मजबूत लड़ाई लड़ेंगी।

दोनों राज्यों को बिल्कुल अलग देखना चाहिए। बिहार में नीतीश कुमार की मौजूदगी से एनडीए को मुस्लिम वोट भी मिला होगा, जो शायद पश्चिम बंगाल में संभव न हो क्योंकि वहां लड़ाई अधिक ध्रुवीकृत होगी।

कोलकाता के विश्लेषक सुदीप्त सेनगुप्ता का मानना है कि बीजेपी ने बिहार में जीत हासिल की है, लेकिन इससे पश्चिम बंगाल में उनका रास्ता आसान नहीं माना जा सकता। यहां की जमीनी हकीकत बिहार से बिल्कुल अलग है। पश्चिम बंगाल में एक मजबूत पार्टी सत्ता में है। नेतृत्व के मामले में टीएमसी को फायदा है क्योंकि ममता बनर्जी की उम्मीदवारी निर्विवाद है, जबकि बीजेपी के पास अभी ऐसा चेहरा नहीं है।

West Bengal Election: बीजेपी की रणनीति और चुनौतियां

सुदीप्त सेनगुप्ता के अनुसार, बीजेपी की रणनीति हिंदुत्व पर केंद्रित है, भले ही पश्चिम बंगाल में यह सबसे बड़ा वोट पाने वाला मुद्दा नहीं रहा है। अब बीजेपी मतुआ समुदाय पर ध्यान दे रही है, जो पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों का समूह है। पार्टी जाति के आधार पर यह तर्क दे रही है कि राज्य में हमेशा ऊंची जाति के लोग हावी रहे हैं।

टीएमसी ने वह संगठनात्मक आधार संभाल लिया है जो पहले वाम दलों के पास था। बीजेपी विपक्ष में रहते हुए भी अपनी रणनीति मजबूती से नहीं बना पाई है। पार्टी के पास मजबूत जमीनी संगठन की कमी है और राज्य में कोई स्पष्ट नेता भी नहीं है। यह पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सबसे बड़ी कमजोरी है।

Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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