नई दिल्ली: मथुरा जिले के वृंदावन धाम में बिहारीपुरा में स्थित बांके बिहारी मंदिर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है. यह प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है. बांके बिहारी मंदिर में हमेशा भक्तों की भीड़ लगी रहती है. बांके बिहारी मंदिर में भक्त दूर-दूर से दर्शन के लिए आते हैं. इस मंदिर में भगवान के दर्शन के दौरान एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है. बांके बिहारी जी के दर्शन के दौरान उनकी प्रतिमा पर हर दो मिनट में पर्दा किया जाता है. इस परंपरा के पीछे के रहस्य के बारे में कम ही लोग जानते हैं. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं.

क्यों किया जाता है प्रतिमा के सामने पर्दा?
बांके बिहारी मंदिर में दर्शन के दौरान प्रतिमा के सामने बार-बार पर्दा क्यों किया जाता है इसको लेकर सभी लोगों के मन में सवाल है. दरअसल, ऐसा माना जाता है कि, बांके बिहारी मंदिर में प्रतिमा इतनी मनमोहक है कि भक्त प्रतिमा पर से अपनी नजर नहीं हटा पाते हैं. जो इस प्रतिमा को देखता है वह इसमें खो जाता है. इसी को लेकर एक पुरानी मान्यता है जिस वजह से बांके बिहारी जी की प्रतिमा पर पर्दा किया जाता है.

वृंदावन का अद्भुत रहस्य: बांके बिहारी मंदिर में पर्दा लगाने की परंपरा कैसे शुरू हुई
एक कथा के अनुसार, मंदिर में करीब 400 साल पहले एक बूढ़ी महिला दर्शन के लिए आई. वह मंदिर में बैठकर भजन कर रही थी. उसकी कोई संतान नहीं थी और उसे चिंता थी वह अपनी संपत्ति किसको सौंपेगी. एक बार महिला घंटों तक बांके बिहारी जी की प्रतिमा के समक्ष बैठ देखती रही. उसे ख्याल आया कि, बांके बिहारी जी को अपना पुत्र बनाकर सारी संपत्ति उन्हें दे सकती है.इस विचार के बाद वह वहां से जाने लगी. इसके बाद चमत्कार हुआ. बांके बिहारी जी की प्रतिमा अपने स्थान को छोड़कर उस महिला के पीछे जाने लगी. बांके बिहारी जी बूढ़ी महिला के भक्ति भाव से प्रसन्न हो गए थे. पुजारियों के काफी मनाने और समझाने पर प्रतिमा को वापस स्थान पर स्थापित किया गया. तभी से मंदिर में हर दो मिनट में प्रतिमा को पर्दा लगाया जाने लगा
निष्कर्ष :
बांके बिहारी मंदिर में हर दो मिनट में प्रतिमा पर पर्दा लगाने की परंपरा भक्ति और चमत्कार से जुड़ी हुई है। लगभग 400 साल पहले एक वृद्धा भक्त ने अपनी संतानहीनता के कारण भगवान बांके बिहारी जी को अपना पुत्र मानकर अपनी संपत्ति अर्पित करने का विचार किया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रतिमा उसके पीछे चल पड़ी। पुजारियों के मनाने के बाद प्रतिमा वापस अपने स्थान पर रखी गई।तब से यह परंपरा शुरू हुई, ताकि भक्त प्रतिमा के सौंदर्य और दिव्यता में इतना खो न जाए कि उनकी भक्ति स्थिर रहे, और दर्शन के अनुभव में भी एक रहस्यमय आकर्षण बना रहे।


