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मंगलौर बंदरगाह से मस्कट का सफर: चावल ने कैसे लिखी भारत-ओमान दोस्ती की कहानी

डेस्क हैभारत और ओमान के बीच रिश्ते सदियों पुराने हैं। अरब सागर इन दोनों देशों को जोड़ता है और सदियों से व्यापार के जहाज इस सागर को पार करते रहे हैं। खासकर मंगलौर बंदरगाह से चावल का निर्यात मस्कट जाता था। यह व्यापार सिर्फ माल की खरीद-बिक्री नहीं था, बल्कि संस्कृतियों को मिलाने का जरिया भी बना। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मस्कट यात्रा के दौरान इन पुराने रिश्तों को फिर से याद किया जा रहा है। आइए जानते हैं कि कैसे व्यापार ने इन दो देशों को सांस्कृतिक रूप से करीब लाया।

प्राचीन काल से शुरू हुआ व्यापार

भारत और ओमान के व्यापारिक संबंध हजारों साल पुराने हैं। सिंधु घाटी सभ्यता के समय से ही भारतीय जहाज ओमान के बंदरगाहों तक पहुंचते थे। उस समय ओमान को ‘मगन’ कहा जाता था। वहां से तांबा, मोती और खजूर भारत आते थे, जबकि भारत से कपड़ा, मसाले और अनाज जाते थे। पुरातत्व खुदाई में ओमान से भारतीय मिट्टी के बर्तन और मोतियां मिली हैं, जो इस पुराने व्यापार की गवाही देती हैं।तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से यह व्यापार और मजबूत हुआ। रोमन साम्राज्य के समय भी ओमान के बंदरगाह जैसे सोहर और मस्कट महत्वपूर्ण केंद्र थे। भारतीय व्यापारी यहां रुकते और माल का आदान-प्रदान करते।

मंगलौर और मस्कट का खास रिश्ताImage result for व्यापार ने भारत और ओमान को सिर्फ आर्थिक रूप से नहीं

18वीं और 19वीं सदी में मंगलौर बंदरगाह भारत के पश्चिमी तट का बड़ा व्यापारिक केंद्र था। यहां से चावल बड़ी मात्रा में निर्यात होता था। मस्कट और अन्य ओमानी बंदरगाहों में चावल की बहुत मांग थी। इतिहासकार बताते हैं कि ओमान के लोग भारतीय चावल पर इतने निर्भर थे कि अगर मंगलौर से निर्यात रुक जाता, तो वहां लोगों को भोजन की कमी हो जाती।टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली और टीपू के समय में यह व्यापार और बढ़ा। मैसूर राज्य से चावल, मसाले, इलायची और काली मिर्च ओमान जाते थे। बदले में ओमान से घोड़े, खजूर और मोती आते थे। दोनों देशों के शासकों ने व्यापारियों को विशेष सुविधाएं दीं, जैसे कम कर और सुरक्षित यात्रा। मंगलौर और मस्कट में एक-दूसरे के एजेंट नियुक्त किए गए थे।स्कॉटिश डॉक्टर फ्रांसिस बुकैनन ने 1801 में मंगलौर का दौरा किया था। उन्होंने लिखा कि मंगलौर समृद्ध बंदरगाह था और चावल का मुख्य निर्यात मस्कट, बॉम्बे और गोवा होता था।

व्यापार से कैसे जुड़ी संस्कृतियां

व्यापार सिर्फ सामान का लेन-देन नहीं था। व्यापारी महीनों तक दूसरे देश में रुकते थे। वे अपनी भाषा, खाना, त्योहार और परंपराएं साथ ले जाते। ओमान में भारतीय व्यापारियों ने बस्तियां बसाईं। गुजरात, कच्छ और कर्नाटक के लोग वहां गए और बस गए। आज भी ओमान में कई पुराने भारतीय परिवार हैं, जिनकी जड़ें 250 साल पुरानी हैं।ओमान की संस्कृति में भारतीय प्रभाव साफ दिखता है। वहां की बिरयानी, करी और मसालेदार व्यंजनों में भारतीय मसालों का स्वाद है। ओमान में हिंदू मंदिर हैं, जैसे मस्कट में 100 साल पुराना शिव मंदिर। भारतीय समुदाय वहां गुरुद्वारे और चर्च भी चलाता है। ओमान सरकार इनकी इजाजत देती है और सहयोग करती है।भारतीय व्यापारियों ने ओमान की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान दिया। वे मोती व्यापार, कपड़ा और अन्य कारोबार में सक्रिय थे। बदले में ओमानी घोड़ों ने भारतीय युद्ध और परिवहन में मदद की।

आज का मजबूत रिश्ता

आज भारत और ओमान के बीच व्यापार 10 अरब डॉलर से ज्यादा का है। भारत से चावल, मशीनरी, चाय-कॉफी और फल-सब्जियां ओमान जाती हैं। ओमान में 9 लाख से ज्यादा भारतीय रहते हैं। वे वहां डॉक्टर, इंजीनियर, व्यापारी और मजदूर के रूप में काम करते हैं।प्रधानमंत्री मोदी ने मस्कट में कहा कि ये रिश्ते सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि पीढ़ियों के हैं। दोनों देश शांति, सहिष्णुता और सद्भाव को बढ़ावा देते हैं। हाल ही में ‘मांडवी टू मस्कट’ जैसे कार्यक्रमों से पुराने व्यापार मार्गों को याद किया जा रहा है।

निष्कर्ष :

व्यापार ने भारत और ओमान को सिर्फ आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक रूप से जोड़ा है। मंगलौर से मस्कट जाने वाला चावल सिर्फ अनाज नहीं था, बल्कि दोस्ती का प्रतीक था। आज जब दोनों देश नए व्यापार समझौते कर रहे हैं, तो यह पुरानी विरासत आगे बढ़ रही है। यह रिश्ता बताता है कि समुद्र की लहरें देशों को अलग नहीं करतीं, बल्कि जोड़ती हैं। भारत-ओमान की यह दोस्ती आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा बनेगी।

PRAGATI DIXIT
Author: PRAGATI DIXIT

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