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Maintenance Rights of Married Women: तलाक नहीं हुआ फिर भी पति से मिल सकता है गुजारा भत्ता? जानें महिलाओं के लिए जरूरी कानूनी नियम

Maintenance Rights of Married Women: वैवाहिक जीवन में विवाद होने पर अक्सर महिलाओं के मन में यह सवाल उठता है कि क्या बिना तलाक लिए वे अपने और बच्चों के खर्च के लिए पति से पैसे मांग सकती हैं। इसका जवाब है कि कानून की नजर में यह पूरी तरह संभव है, और इसके लिए तलाक होना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। कई बार पति-पत्नी के बीच मतभेद इतने बढ़ जाते हैं कि पत्नी अलग रहने लगती है, लेकिन कानूनी प्रक्रिया के तहत तलाक अभी तक नहीं हुआ होता। ऐसी स्थिति में भी कुछ खास परिस्थितियों में महिला अपने भरण-पोषण के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है। पहले इस तरह के मामलों में सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता मांगा जाता था, लेकिन अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस लागू होने के बाद यही प्रावधान धारा 144 के तहत आता है। इस कानून के जरिए न केवल पत्नी बल्कि उन बच्चों को भी आर्थिक सुरक्षा मिल सकती है, जो खुद अपना खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं।

पहले की धारा 125 की जगह अब लागू है नया कानून

गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में पहले सीआरपीसी की धारा 125 के तहत कार्रवाई की जाती थी, लेकिन 1 जुलाई 2024 से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस पूरे देश में लागू हो चुकी है। इस नए कानून में गुजारा भत्ता से जुड़ा प्रावधान धारा 144 के अंतर्गत रखा गया है। इस धारा के तहत यदि पति के पास पर्याप्त आय है, लेकिन वह अपनी ऐसी पत्नी का खर्च नहीं उठा रहा जो खुद अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है, तो मजिस्ट्रेट उसे गुजारा भत्ता देने का आदेश जारी कर सकता है।

अलग रहने के बावजूद भी किया जा सकता है दावा

कई बार लोगों में यह गलतफहमी होती है कि यदि पत्नी पति से अलग रह रही है, तो उसका गुजारा भत्ता पाने का अधिकार खत्म हो जाता है। हालांकि कानूनी दृष्टि से यह पूरी तरह सही नहीं है। सिर्फ अलग रहने की वजह से ही गुजारा भत्ता का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। फिर भी कानून में कुछ ऐसी परिस्थितियां भी बताई गई हैं जिनमें पत्नी को भत्ता न मिलने का प्रावधान है, जैसे यदि पत्नी बिना किसी उचित वजह के पति के साथ रहने से इनकार करती है, या दोनों आपसी सहमति से अलग रह रहे हों, अथवा पत्नी किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध में रह रही हो।

घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए अलग कानूनी रास्ता

यदि कोई महिला घरेलू हिंसा की शिकार हो रही है, तो वह घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम के तहत भी आर्थिक सहायता और अन्य कानूनी राहत मांग सकती है। यह एक अलग कानूनी प्रावधान है, जो गुजारा भत्ता से संबंधित नियमों से भिन्न है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने स्पष्टीकरण में यह बताया है कि घरेलू हिंसा कानून के तहत मिलने वाली राहत और गुजारा भत्ता से जुड़ा प्रावधान दोनों अलग-अलग कानूनी रास्ते हैं, जिनका इस्तेमाल परिस्थितियों के अनुसार किया जा सकता है।

बच्चों के भरण-पोषण का भी है प्रावधान

गुजारा भत्ता की व्यवस्था केवल पत्नी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बीएनएसएस की धारा 144 में ऐसे बच्चों के लिए भी भरण-पोषण का स्पष्ट प्रावधान किया गया है, जो खुद अपना खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं। इसका मतलब यह है कि परिस्थितियों के आधार पर महिला अपने बच्चों के खर्च के लिए भी अदालत से गुजारा भत्ता मांग सकती है। यह प्रावधान खासतौर पर उन मामलों में अहम साबित होता है, जहां बच्चों की परवरिश और शिक्षा से जुड़ा खर्च एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

गुजारा भत्ता की रकम कैसे होती है तय

गुजारा भत्ता को लेकर सबसे अहम सवाल यह होता है कि आखिर इसकी रकम कितनी हो सकती है। कानून में इसके लिए कोई एक तय राशि निर्धारित नहीं की गई है, बल्कि अदालत हर मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इसकी राशि तय करती है। इसमें पति की आर्थिक स्थिति, पत्नी की वास्तविक जरूरतें और बच्चों से जुड़े खर्च जैसे कई पहलुओं का विस्तार से आकलन किया जाता है। यही वजह है कि अलग-अलग मामलों में मिलने वाली राशि भी भिन्न हो सकती है।

महिलाओं के अधिकार और कानून

महिलाओं के लिए इस कानून की अहमियत

यह कानूनी प्रावधान उन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जो किसी वजह से अपने पति से अलग रहने को मजबूर हैं, लेकिन आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हैं। बिना तलाक लिए भी गुजारा भत्ता का अधिकार मिलना उन्हें एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है, जिससे वे अपने और अपने बच्चों के जीवन को बेहतर तरीके से चला सकती हैं। यह प्रावधान इस बात का भी संकेत है कि कानून महिलाओं और बच्चों के हितों की रक्षा को प्राथमिकता देता है।

कानूनी प्रक्रिया को लेकर जागरूकता जरूरी

कई बार महिलाओं को अपने इन अधिकारों के बारे में पूरी जानकारी नहीं होती, जिस वजह से वे मुश्किल परिस्थितियों में भी कानूनी मदद लेने से हिचकिचाती हैं। ऐसे में जरूरी है कि महिलाओं को गुजारा भत्ता से जुड़े इन कानूनी प्रावधानों के बारे में स्पष्ट जानकारी हो, ताकि जरूरत पड़ने पर वे समय रहते अदालत का सहारा ले सकें। कानूनी जागरूकता ही महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति सशक्त बनाने का सबसे बड़ा माध्यम है।

बदलते कानूनी ढांचे का असर

सीआरपीसी से बीएनएसएस में हुए इस बदलाव ने पूरे आपराधिक न्याय ढांचे को नया रूप दिया है, और गुजारा भत्ता से जुड़ा प्रावधान भी इसी बदलाव का हिस्सा है। हालांकि मूल भावना में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है, बल्कि धारा संख्या बदलने के साथ कानून को और स्पष्ट तरीके से परिभाषित किया गया है। इससे न्यायिक प्रक्रिया में एकरूपता बनाए रखने में भी मदद मिलती है।

विशेषज्ञों की सलाह पर निर्भर करता है मामला

किसी भी महिला को गुजारा भत्ता से जुड़ा मामला दायर करने से पहले किसी अनुभवी वकील से सलाह लेना बेहतर माना जाता है, क्योंकि हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और कानून का सही आकलन विशेषज्ञ ही कर सकते हैं। इससे महिला को यह स्पष्ट जानकारी मिल सकती है कि उसके मामले में किस आधार पर दावा किया जा सकता है और उसे किस तरह की राहत मिलने की संभावना है।

कुल मिलाकर बिना तलाक लिए भी महिला अपने और अपने बच्चों के भरण-पोषण के लिए पति से गुजारा भत्ता मांग सकती है, बशर्ते कानून में बताई गई शर्तें पूरी होती हों। बीएनएसएस की धारा 144 के तहत यह अधिकार महिलाओं को एक मजबूत कानूनी सहारा प्रदान करता है। हालांकि गुजारा भत्ता की राशि हर मामले की परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग तय होती है। ऐसे में महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहना और जरूरत पड़ने पर सही कानूनी सलाह लेना बेहद जरूरी है, ताकि वे अपने और अपने परिवार के हितों की बेहतर तरीके से रक्षा कर सकें।

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Author: Sanjna Gupta

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