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झारखंड में 500 से अधिक सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं, शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

Jharkhand News: झारखंड में सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर एक बार फिर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्य के 500 से अधिक सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था नहीं है। यह जानकारी विभिन्न सर्वेक्षणों और रिपोर्टों से सामने आई है। इस कमी का सीधा असर छात्राओं की स्कूल में उपस्थिति और शिक्षा पर पड़ रहा है।

लड़कियों की शिक्षा पर असर

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शौचालय की कमी लड़कियों के स्कूल छोड़ने का एक बड़ा कारण बन रही है। खासकर किशोरावस्था में पहुंचने के बाद लड़कियों के लिए यह समस्या और गंभीर हो जाती है। कई स्कूलों में जहां शौचालय हैं भी, वहां वे इस्तेमाल के लायक नहीं हैं या फिर उनमें पानी की व्यवस्था नहीं है।

ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट ‘स्कूल की भूल’ में इस स्थिति का खुलासा किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के 24 जिलों में से 16 जिलों के 138 प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में सर्वेक्षण किया गया। इस सर्वे में शामिल किसी भी स्कूल में काम करने लायक शौचालय नहीं मिला।

बुनियादी सुविधाओं की कमी

सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि जहां शौचालय बने हुए हैं, वहां भी वे जर्जर अवस्था में हैं। इन शौचालयों में बिजली और पानी की व्यवस्था नहीं है। कई स्कूलों में तो चारदीवारी तक नहीं है। दो तिहाई स्कूलों में चारदीवारी नहीं होने से सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

झारखंड की 78 फीसदी आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। ऐसे में सरकारी स्कूल ही शिक्षा का मुख्य जरिया हैं। लेकिन इन स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी गरीब और आदिवासी परिवारों के बच्चों की शिक्षा पर गंभीर असर डाल रही है। राज्य में 90 फीसदी बच्चे जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, वे दलित और आदिवासी समुदाय से आते हैं।

शिक्षकों की कमी भी बड़ी समस्या

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शौचालय की कमी के साथ ही शिक्षकों की कमी भी एक गंभीर मुद्दा है। झारखंड के एक तिहाई प्राथमिक स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। 40 फीसदी स्कूलों में स्थायी शिक्षक नहीं हैं। महिला शिक्षकों की संख्या तो और भी कम है। प्राथमिक स्कूलों में सिर्फ 20 फीसदी महिला शिक्षक हैं।

एक ही शिक्षक के भरोसे चलने वाले स्कूलों में पढ़ाई का माहौल बनाना मुश्किल हो जाता है। शिक्षक को पढ़ाने के अलावा मिड डे मील और दूसरे प्रशासनिक काम भी करने पड़ते हैं। इससे पढ़ाई की गुणवत्ता पर असर पड़ता है।

छात्रों की उपस्थिति में कमी

इन सब समस्याओं का नतीजा यह है कि झारखंड के प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति सिर्फ 68 फीसदी है। माध्यमिक स्कूलों में तो यह स्थिति और खराब है, जहां सिर्फ 58 फीसदी छात्र ही नियमित रूप से स्कूल आते हैं। 14 से 18 साल की उम्र के 21 फीसदी युवा स्कूल ही नहीं जाते हैं।

लड़कियों के लिए तो स्थिति और भी चिंताजनक है। किशोरावस्था में पहुंचने के बाद अगर स्कूल में अलग शौचालय और साफ पानी की व्यवस्था नहीं है तो लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। मासिक धर्म के दौरान स्कूल में उचित सुविधाओं की कमी लड़कियों की शिक्षा में बड़ी बाधा बनती है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर एक अहम आदेश दिया है। कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि हर स्कूल में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय होने चाहिए। शौचालयों में पानी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही स्कूलों में लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने का भी आदेश दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मासिक धर्म स्वास्थ्य संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जो स्कूल इन निर्देशों का पालन नहीं करेंगे, उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है। यह आदेश झारखंड समेत पूरे देश में लागू होगा।

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने अपने फैसले में कहा कि लड़कियों के शरीर को अक्सर बोझ की तरह देखा जाता है, जबकि इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। अगर कोई लड़की सिर्फ इसलिए स्कूल नहीं जा पाई क्योंकि उसके शरीर को बोझ समझा गया, तो गलती उसकी नहीं है।

राज्य सरकार की योजनाएं

झारखंड सरकार ने लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। मुख्यमंत्री लाडली योजना के तहत लड़कियों को मासिक स्टाइपेंड दिया जाता है। सुकन्या योजना के तहत लड़कियों को जन्म से लेकर 18 साल तक 40000 रुपए की आर्थिक मदद मिलती है। स्कूली लड़कियों को साइकिल, किताबें और ड्रेस भी मुफ्त में दी जाती हैं।

लेकिन इन योजनाओं के बावजूद बुनियादी सुविधाओं की कमी बड़ी समस्या बनी हुई है। जब तक स्कूलों में शौचालय, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं होंगी, तब तक लड़कियों की शिक्षा में सुधार मुश्किल है।

कुछ स्कूलों में सुधार

हालांकि कुछ जगहों पर सुधार भी देखने को मिला है। पलामू जिले के कुछ सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक वातावरण में बदलाव आया है। इन स्कूलों में शौचालय, बिजली, पानी जैसी सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। स्मार्ट क्लासरूम और कंप्यूटर लैब भी बनाई गई हैं। इन स्कूलों में नामांकन और परिणाम दोनों में सुधार हुआ है।

लेकिन ये स्कूल अपवाद हैं। राज्य के ज्यादातर सरकारी स्कूलों में अभी भी बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। पूर्वी सिंहभूम, रांची और बोकारो जैसे विकसित जिलों में स्थिति बेहतर है। लेकिन साहिबगंज, पाकुड़, गोड्डा, दुमका जैसे जिलों में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।

राष्ट्रीय औसत से पीछे झारखंड

झारखंड की साक्षरता दर 66.41 फीसदी है जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। पुरुषों की साक्षरता दर 76.84 फीसदी है जबकि महिला साक्षरता दर सिर्फ 55.45 फीसदी है। यह अंतर चिंता की बात है।

एनुअल सर्वे ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड उन राज्यों में शामिल है जहां 8 से 11 साल के आधे बच्चे एक साधारण पैराग्राफ भी नहीं पढ़ सकते। 14 से 18 साल के 58.7 फीसदी युवाओं को ठीक से पढ़ना लिखना नहीं आता है।

आदिवासी इलाकों में स्थिति गंभीर

झारखंड की 26 फीसदी से अधिक आबादी आदिवासी समुदाय की है। आदिवासी बहुल इलाकों में शिक्षा की स्थिति और भी खराब है। इन इलाकों के स्कूलों में सुविधाओं की सबसे ज्यादा कमी है। शिक्षकों की भी भारी कमी है।

सरकार ने एकलव्य मॉडल स्कूल और आवासीय विद्यालय खोले हैं। लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है। आदिवासी लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट अभी भी बहुत ऊंचा है। बुनियादी सुविधाओं की कमी इसकी बड़ी वजह है।

क्या हो समाधान

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे पहले हर स्कूल में लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनाना जरूरी है। शौचालयों में पानी और बिजली की व्यवस्था होनी चाहिए। साफ-सफाई का भी ध्यान रखना होगा।

सैनिटरी पैड की मुफ्त व्यवस्था होनी चाहिए। महिला शिक्षकों की संख्या बढ़ानी होगी। हर स्कूल में कम से कम दो-तीन शिक्षक जरूर होने चाहिए। शिक्षकों पर गैर शैक्षणिक कामों का बोझ कम करना होगा।

बजट में बढ़ोतरी जरूरी

शिक्षा के बजट में बढ़ोतरी करनी होगी। बुनियादी ढांचे पर ज्यादा पैसा खर्च करना होगा। स्कूल भवनों की मरम्मत करानी होगी। नए शौचालय बनाने होंगे। बिजली और पानी के कनेक्शन देने होंगे।

विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ योजनाएं बनाने से काम नहीं चलेगा। जमीनी स्तर पर इन योजनाओं को लागू करना होगा। नियमित निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए। जो स्कूल निर्देशों का पालन नहीं करते, उन पर कार्रवाई होनी चाहिए।

Jharkhand News: निष्कर्ष

झारखंड के 500 से अधिक सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय न होना एक गंभीर मुद्दा है। यह लड़कियों की शिक्षा और उनके भविष्य पर सीधा असर डाल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब राज्य सरकार को इस दिशा में तेजी से काम करना होगा।

शिक्षा के अधिकार को सही मायने में लागू करने के लिए बुनियादी सुविधाएं जरूरी हैं। शौचालय, बिजली, पानी, चारदीवारी जैसी सुविधाओं के बिना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। खासकर लड़कियों के लिए ये सुविधाएं और भी जरूरी हैं।

आने वाले समय में इस दिशा में सुधार की उम्मीद है। लेकिन इसके लिए सरकार, प्रशासन और समाज सभी को मिलकर काम करना होगा। तभी झारखंड के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सकेगी और राज्य विकास की राह पर आगे बढ़ सकेगा।

Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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