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Ek Din Movie Review: जुनैद-साई पल्लवी की केमिस्ट्री दमदार या फीकी? जानें क्या चला जादू या टूटा दिल

Ek Din Movie Review: आमिर खान प्रोडक्शंस की नवीनतम पेशकश और सुनील पांडे के निर्देशन में बनी फिल्म ‘एक दिन’ आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। यह फिल्म आमिर खान के बेटे जुनैद खान के करियर की एक महत्वपूर्ण फिल्म मानी जा रही है, क्योंकि इसमें उनके साथ दक्षिण भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री साई पल्लवी मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म को लेकर लंबे समय से चर्चा थी क्योंकि यह साल 2011 की मशहूर थाई फिल्म ‘वन डे’ की आधिकारिक हिंदी रीमेक है। 1 मई 2026 को रिलीज हुई यह फिल्म एक ऐसी प्रेम कहानी पेश करती है जो भावनाओं, यादों और एक अनोखी बीमारी के इर्द-गिर्द घूमती है। आइए विस्तार से जानते हैं कि क्या यह फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतर पाई है या नहीं।

फिल्म की कहानी और प्लॉट की गहराई

फिल्म की कहानी दो किरदारों दिनेश और मीरा के इर्द-गिर्द बुनी गई है। जुनैद खान ने दिनेश का किरदार निभाया है, जो एक आईटी प्रोफेशनल है और स्वभाव से बेहद अंतर्मुखी है। वह ऑफिस में किसी से ज्यादा बात नहीं करता और उसकी मौजूदगी का अहसास तक किसी को नहीं होता। वहीं दूसरी ओर साई पल्लवी ने मीरा का किरदार निभाया है, जो दिनेश के ही ऑफिस में काम करती है और बेहद जिंदादिल लड़की है। दिनेश मन ही मन मीरा को चाहने लगता है, लेकिन मीरा को दिनेश के अस्तित्व के बारे में भी पता नहीं है। कहानी में मोड़ तब आता है जब दिनेश एक ऐसी मन्नत मांगता है कि उसे मीरा का साथ मिल जाए, चाहे वह केवल एक दिन के लिए ही क्यों न हो। कुदरत उसकी यह मन्नत पूरी तो करती है, लेकिन एक ऐसे ट्विस्ट के साथ जो दर्शकों को हैरान कर देता है। फिल्म का मुख्य आधार ‘ट्रांजिएंट ग्लोबल एमनेसिया’ (TGA) नामक एक दुर्लभ बीमारी है, जिसकी वजह से मीरा अपनी यादें खो देती है और दिनेश को खुद को उसका प्रेमी बताने का मौका मिल जाता है।

ओरिजिनल थाई फिल्म ‘वन डे’ से कितनी अलग है यह रीमेक

Ek Din Movie Review
Ek Din Movie Review

जब भी कोई फिल्म किसी विदेशी फिल्म की रीमेक होती है, तो तुलना होना लाजमी है। सुनील पांडे ने ‘एक दिन’ को भारतीय परिवेश में ढालने की कोशिश की है, लेकिन इसकी मूल आत्मा को बरकरार रखा है। हालांकि, फिल्म का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू इसका क्लाइमैक्स है। जहां ओरिजिनल फिल्म का अंत अलग था, वहीं ‘एक दिन’ के लेखकों ने इसके अंत को काफी अनपेक्षित रखा है। यही कारण है कि फिल्म के आखिरी 15-20 मिनट दर्शकों को बांधे रखने में सफल होते हैं। फिल्म की लंबाई दो घंटे पांच मिनट है, जो एक रोमांटिक ड्रामा के लिहाज से सही है, लेकिन इसकी धीमी रफ्तार कहीं-कहीं दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेती है।

जुनैद खान और साई पल्लवी की एक्टिंग का विश्लेषण

साई पल्लवी इस फिल्म की असली जान हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि क्यों उन्हें देश की बेहतरीन अभिनेत्रियों में गिना जाता है। मीरा के किरदार में उन्होंने भावनाओं के जो रंग बिखेरे हैं, वे काबिले तारीफ हैं। साई पल्लवी एक ही सीन में हंसते हुए अचानक रो पड़ने की कला में माहिर हैं और उनके हाव-भाव दर्शकों को कहानी से जोड़े रखते हैं। दूसरी ओर, जुनैद खान की बात करें तो उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘महाराजा’ में काफी प्रभावशाली काम किया था, लेकिन ‘एक दिन’ में वह थोड़े फीके नजर आते हैं। दिनेश के शर्मीले और दबे हुए किरदार को निभाने की कोशिश में जुनैद कहीं न कहीं ओवर-एक्टिंग या फिर भावशून्य महसूस होते हैं। ऐसा लगता है कि जुनैद पर रोमांटिक हीरो का टैग अभी फिट नहीं बैठ रहा है और उन्हें यथार्थवादी किरदारों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

संगीत और तकनीकी पक्ष की मजबूती

आमिर खान की फिल्मों से अक्सर दर्शकों को अच्छे संगीत की उम्मीद होती है, लेकिन ‘एक दिन’ इस मामले में थोड़ा निराश करती है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक अच्छा है और दृश्यों के प्रभाव को बढ़ाता है, लेकिन फिल्म के गाने याद रखने लायक नहीं हैं। कोई भी गाना ऐसा नहीं है जो सिनेमाघर से बाहर आने के बाद आपकी जुबान पर चढ़ा रहे। सिनेमैटोग्राफी की बात करें तो फिल्म के दृश्य सुंदर हैं और कैमरा वर्क ने कहानी के भावनात्मक उतार-चढ़ाव को अच्छे से पकड़ा है। एडिटिंग थोड़ी और क्रिस्प हो सकती थी, खासकर फिल्म के पहले हिस्से में जो काफी धीमा महसूस होता है।

क्या है ‘ट्रांजिएंट ग्लोबल एमनेसिया’ की बीमारी

फिल्म जिस बीमारी पर आधारित है, वह कोई काल्पनिक बीमारी नहीं है। ट्रांजिएंट ग्लोबल एमनेसिया एक वास्तविक मेडिकल स्थिति है जिसमें व्यक्ति कुछ समय के लिए अपनी हालिया यादें खो देता है। फिल्म में इस बीमारी का उपयोग एक प्लॉट डिवाइस के रूप में किया गया है, जो दिनेश को मीरा के करीब आने का मौका देता है। हालांकि फिल्म में इसे थोड़ा फिल्मी रंग दिया गया है, लेकिन इसके पीछे का विज्ञान वास्तविक है।

दर्शकों के लिए फैसला: देखें या न देखें

फिल्म ‘एक दिन’ एक ऐसी फिल्म है जो हर किसी के लिए नहीं बनी है। यदि आप साई पल्लवी के बहुत बड़े प्रशंसक हैं, तो आप उनकी अदाकारी के लिए इसे देख सकते हैं। लेकिन अगर आप एक बेहतरीन रोमांटिक फिल्म की तलाश में हैं, तो शायद यह आपकी उम्मीदों को पूरा न कर पाए। फिल्म की कहानी में गहराई की कमी और जुनैद खान की कमजोर परफॉर्मेंस इसे एक औसत दर्जे की फिल्म बनाती है। यदि आपके पास वीकेंड पर करने के लिए कुछ खास नहीं है और आप कुछ हल्का-फुल्का इमोशनल ड्रामा देखना चाहते हैं, तो ही थिएटर का रुख करें। अन्यथा, इसके ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आने का इंतजार करना एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।

Ek Din Movie Review: निष्कर्ष- एक मौका जो अधूरा रह गया

कुल मिलाकर, ‘एक दिन’ एक अच्छी कोशिश है, लेकिन यह एक उत्कृष्ट फिल्म बनने से चूक गई। फिल्म का क्लाइमैक्स निश्चित रूप से प्रभावशाली है और वह इसे एक स्टार ज्यादा दिलाने का हकदार बनाता है। जुनैद खान को अभी बॉलीवुड की लंबी रेस का घोड़ा बनने के लिए अपनी एक्टिंग स्किल्स और प्रोजेक्ट्स के चुनाव पर और काम करना होगा। साई पल्लवी के कंधों पर टिकी यह फिल्म उन लोगों को पसंद आ सकती है जिन्हें धीमी गति की फिल्में और अधूरी प्रेम कहानियां अच्छी लगती हैं। 1 मई 2026 की इस बड़ी रिलीज को हमारी ओर से 2.5 स्टार्स मिलते हैं।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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