नई दिल्ली: सीधी बात यह है कि इस समय देश के अधिकांश हिस्सों में भीषण गर्मी पड़ रही है।देश के कई हिस्सों में तापमान 45–50 डिग्री के पार जा रहा है। लोग हीटवेव से मर रहे हैं, अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है, और आम आदमी के लिए दोपहर में बाहर निकलना जोखिम बन चुका है।
इसी बीच ग्वालियर के महाराज केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का बयान आता हैकि “मैं एयरकंडीशनर (एसी) इस्तेमाल नहीं करता। जेब में प्याज़ रखिए, कुछ नहीं होगा यह चंबल की स्किन है”यह बयान सुनने में भले हल्का लगे, लेकिन समस्या यहीं है कि जब गंभीर संकट को हल्के में लिया जाता है, तो वह और गंभीर हो जाता है।
गर्मी कोई व्यक्तिगत सहनशक्ति का मामला नहीं है। यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है।जब तापमान 50 डिग्री के आसपास पहुँचता है, तो यह “चंबल की स्किन” या “आत्मा की उम्र” से नहीं, शरीर की जैविक सीमाओं से तय होता है कि कौन बचेगा और कौन नहीं।
देश का बड़ा हिस्सा ऐसी परिस्थितियों में जी रहा है जहाँ, न घर में एसी है न लगातार बिजली,न पर्याप्त पानी। ऐसे में “प्याज़ जेब में रखिए” जैसी सलाह समाधान नहीं, बल्कि समस्या से ध्यान भटकाने का तरीका लगती है।यह पहली बार नहीं है जब गंभीर मुद्दों पर ऐसे बयान आए हैं। लेकिन हर बार सवाल वही होता है
क्या सत्ता को समस्या की गंभीरता का अंदाज़ा है?
या फिर यह मान लिया गया है कि सामान्य नागरिक अपनी समस्या का समाधान खुद ही खोज लेगा ।चाहे वह विज्ञान हो, आयुर्वेद हो, या फिर लोक मान्यताएँ?यहाँ एक और फर्क समझना जरूरी है। आयुर्वेद या पारंपरिक ज्ञान का सम्मान करना अलग बात है।
उसे वैज्ञानिक समाधान के विकल्प के रूप में पेश करना यह खतरनाक है।क्योंकि इससे नीति का फोकस बदल जाता है।
जहाँ ज़रूरत है। हीट एक्शन प्लान की शहरी ढांचे में बदलाव की,पानी और बिजली की उपलब्धता की
वहाँ बात पहुँच जाती है ।
“प्याज़ जेब में रखिए।”
सीधी बात यह है—समस्या अगर 50 डिग्री की है,तो समाधान भी उसी स्तर का होना चाहिए। व्यक्तिगत सहनशक्ति की कहानियाँ,सार्वजनिक नीति का विकल्प नहीं हो सकतीं।
बात मुद्दे की बस इतनी है किसंकट को समझने में चूक, समाधान को मज़ाक बना देती है।



