नई दिल्ली। कुछ सांसद या विधायक इधर गए, कुछ उधर जाने की चर्चा है।टीवी स्टूडियो में बहस है, सोशल मीडिया पर शोर है।लेकिन उसका मतलब बहुत बड़ा है।मुद्दा यह नहीं है कि पंजाब में कौन किसके साथ जा रहा है
मुद्दा यह है कि क्या अब जनादेश सिर्फ एक शुरुआती औपचारिकता बन गया है । जिसे बाद में सत्ता अपनी सुविधा व अपने बलबूते पर उसे इतनी आसानी से बदल सकती है?बहस को भटकाने का तरीका भी तय है। आम आदमी पार्टी को कठघरे में खड़ा कीजिए।
अरविंद केजरीवाल के पुराने फैसले गिनाइए। और फिर एक वाक्य “जैसे को तैसा मिला।” और बस बहस खत्म।ठीक उसी जगह, जहाँ से उसे शुरू होना चाहिए था। क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि अतीत में किसने क्या किया।असली सवाल यह है कि आज क्या हो रहा है ?
और क्या हम उसे स्वीकार कर रहे हैं?
अगर एक विधायक आपका वोट लेकर जीतता है और चुनाव के बाद किसी और खेमे में चला जाता है, तो बदला क्या?सरकार, या आपका फैसला? और अगर आपका फैसला बदला जा सकता है, तो फिर आपके वोट का महत्व क्या रहा है?
यह पहली बार नहीं हो रहा।
अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार से लेकर यह सूची काफी लंबी है।हर बार एक नया तर्क, हर बार एक नया औचित्य।लेकिन सच्चाई एक ही कि जनादेश को परिस्थिति के हिसाब से ढाला जा रहा है।यह घटना नहीं है, यह पैटर्न है। और पैटर्न कभी संयोग नहीं होते।
सबसे चिंताजनक बात यह नहीं है कि यह हो रहा है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि हम इसके साथ सहज हो गए हैं।पहले हमें गुस्सा आता था। फिर हमने बहस की।
अब हम इसे “राजनीति” कहकर आगे बढ़ जाते हैं।यही बदलाव लोकतंत्र को खत्म करता है।हम अब यह नहीं तय करते कि क्या सही है।
हम यह तय करते हैं कि किसके साथ सही या गलत हो रहा है। और यही वह बिंदु है, जहाँ समाज अपनी नैतिक शक्ति खो देता है। आज पंजाब है। कल कोई और राज्य होगा। और जिस दिन यह आपके साथ होगा, उस दिन आप पहली बार महसूस करेंगे कि आपका वोट सिर्फ एक औपचारिकता बन चुका है।लोकतंत्र एक दिन में नहीं हारता।वह धीरे-धीरे हारता है और हर बार हम सोचते हैं कि अभी नहीं।



