Great Nicobar Project: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी हिस्सा ‘ग्रेट निकोबार’ इन दिनों वैश्विक चर्चा का केंद्र बना हुआ है। भारत सरकार द्वारा यहाँ शुरू की गई 75 हजार करोड़ रुपये की महापरियोजना ने विकास और पर्यावरण के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। जहाँ एक ओर सरकार इसे ‘रणनीतिक विकास’ और राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे मजबूत कवच बता रही है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरणविद और विपक्षी दल इसे चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों के लिए ‘सोने की खान’ करार दे रहे हैं। नीति आयोग के विजन दस्तावेज के आधार पर तैयार यह योजना न केवल हिंद महासागर की सुरक्षा से जुड़ी है, बल्कि यह भारत के भविष्य के आर्थिक मॉडल पर भी कई सवाल खड़े कर रही है।
Great Nicobar Project: क्या है 75 हजार करोड़ का यह मेगा प्रोजेक्ट
ग्रेट निकोबार की इस विशाल परियोजना के तहत चार प्रमुख निर्माण कार्य किए जाने हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है गैलाथिया बे में बनने वाला अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, जो वैश्विक समुद्री व्यापार का एक नया केंद्र बनेगा। इसके अलावा यहाँ एक नया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, आधुनिक टाउनशिप और ऊर्जा जरूरतों के लिए पावर प्लांट का निर्माण प्रस्तावित है। इस पूरी योजना का ढांचा अमेरिकी कंसल्टेंसी कंपनी ‘एकाम’ ने तैयार किया है। सरकार का तर्क है कि मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित होने के कारण यह द्वीप भारत को वैश्विक शिपिंग रूट के शीर्ष पर स्थापित कर देगा, जिससे राजस्व और रोजगार के अपार अवसर पैदा होंगे।
Great Nicobar Project: पर्यावरण और जैव विविधता पर मंडराता खतरा

कागज पर विकास का यह सपना जितना आकर्षक लगता है, जमीन पर इसकी हकीकत उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। लगभग 911 वर्ग किलोमीटर में फैले इस द्वीप का 95 प्रतिशत हिस्सा संरक्षित वनों, राष्ट्रीय उद्यानों और आदिवासी रिजर्व क्षेत्रों से घिरा है। यह क्षेत्र यूनेस्को के विश्व बायोस्फीयर नेटवर्क का एक अभिन्न अंग है। यहाँ दुर्लभ लेदरबैक कछुए, घने वर्षावन और ऐसी सैकड़ों प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस परियोजना के लिए लगभग साढ़े आठ लाख पेड़ों को काटने की तैयारी है, जो इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।
नियमों में बदलाव और राजनीतिक विरोध के सुर
परियोजना के क्रियान्वयन के तरीकों को लेकर भी गंभीर आरोप लग रहे हैं। विपक्ष का दावा है कि नियमों को परियोजना की सुविधा के अनुसार बदला जा रहा है। गैलाथिया बे, जो पहले एक संरक्षित अभयारण्य था, उसका दर्जा केवल इसलिए हटा दिया गया क्योंकि वहाँ बंदरगाह का निर्माण होना है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे को उठाते हुए आरोप लगाया है कि परियोजना को मंजूरी दिलाने के लिए समुद्री नक्शों तक में छेड़छाड़ की गई है। तटीय नियमों और कोरल रीफ्स के संरक्षण को लेकर भी पर्यावरणविदों ने अपनी गहरी चिंता जाहिर की है। उनका सवाल है कि क्या विकास की कीमत पर इन प्राकृतिक धरोहरों को खत्म करना सही है?
सामरिक सुरक्षा या कॉरपोरेट हितों का टकराव
सरकार लगातार इस बात पर जोर दे रही है कि यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य है। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती दखलंदाजी को देखते हुए ग्रेट निकोबार का सामरिक महत्व निर्विवाद है। लेकिन आलोचकों का सवाल यह है कि यदि यह पूरी तरह से एक सामरिक और रणनीतिक परियोजना है, तो इसे निजी निवेशकों के लिए ‘मुनाफे का सौदा’ क्यों बताया जा रहा है? अदाणी पोर्ट्स जैसी बड़ी कंपनियों ने इस ट्रांसशिपमेंट पोर्ट परियोजना में दिलचस्पी दिखाई है, जिससे यह बहस और तेज हो गई है कि क्या इस पूरी संरचना का लाभ अंततः कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों को ही मिलेगा।
आबादी का विस्फोट और संसाधनों पर दबाव
ग्रेट निकोबार का एक और चिंताजनक पहलू यहाँ होने वाला आबादी का विस्तार है। वर्तमान में इस द्वीप की आबादी मात्र 10 से 12 हजार के बीच है। लेकिन सरकारी अनुमानों के अनुसार, परियोजना पूरी होने के बाद यहाँ की जनसंख्या बढ़कर डेढ़ लाख तक पहुँच सकती है। इतने छोटे और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील द्वीप पर अचानक से मानवीय दबाव बढ़ने से यहाँ की प्राकृतिक संपदा और संसाधनों पर बुरा असर पड़ना तय है। क्या यह द्वीप इस भारी आबादी का बोझ सहने के लिए तैयार है? यह सवाल आज हर जागरूक नागरिक के मन में है।
आदिवासियों की अस्मिता और संरक्षण का संकट
ग्रेट निकोबार केवल पेड़ों और जानवरों का घर नहीं है, बल्कि यहाँ शोम्पेन और निकोबारी जैसी जनजातियां भी रहती हैं जो अपनी प्राचीन संस्कृति और परंपराओं के साथ यहाँ सदियों से निवास कर रही हैं। यह क्षेत्र आदिवासी रिजर्व के रूप में सुरक्षित था, लेकिन अब विकास के शोर में उनकी आवाज दबती नजर आ रही है। स्थानीय लोगों और जनजातीय समुदायों के विस्थापन और उनकी जीवनशैली में होने वाले बदलावों को लेकर सरकार के पास कोई ठोस सामाजिक सुरक्षा योजना स्पष्ट नहीं दिख रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाहरी आबादी का प्रवेश इन जनजातियों के अस्तित्व को खतरे में डाल सकता है।
Great Nicobar Project: आर्थिक लाभ बनाम प्राकृतिक विनाश की जंग
सरकार का दावा है कि यह बंदरगाह भारत को कोलंबो और सिंगापुर जैसे वैश्विक केंद्रों के विकल्प के रूप में खड़ा करेगा। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और भारत एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनेगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या जंगलों को ‘लैंड बैंक’ और प्राकृतिक संसाधनों को केवल ‘इन्वेस्टमेंट’ के रूप में देखना सही मॉडल है? यदि यह विकास विनाश की नींव पर खड़ा है, तो इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी। ग्रेट निकोबार का असली संकट यही है कि यहाँ विकास और विनाश के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है।
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