Bengal politics 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में इस बार उत्तर बंगाल का मैदान सबसे दिलचस्प और निर्णायक साबित हो सकता है। दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार जैसे जिलों में आदिवासी मतदाता हमेशा से जीत और हार तय करने में अहम भूमिका निभाते आए हैं। इस बार तृणमूल कांग्रेस ने एक बड़ा और सोचा-समझा दांव खेला है। पार्टी ने आदिवासी बहुल इलाकों में जाने-माने आदिवासी चेहरों को ही उम्मीदवार बनाया है ताकि उस वोट बैंक तक सीधे पहुँचा जा सके जो पिछले चुनाव में काफी हद तक भाजपा के पाले में चला गया था। उत्तर बंगाल की 54 विधानसभा सीटों में से 16 सीटें आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित हैं और यही सीटें इस पूरे चुनाव की धुरी बन गई हैं।
Bengal politics 2026: पिछले चुनाव में क्या हुआ था?
पिछले विधानसभा चुनाव में तराई और डुवार्स के आदिवासी बहुल इलाकों में तृणमूल कांग्रेस को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। नागराकाटा, कालचीनी, कुमारग्राम, मदारीहाट और फांसीदेवा जैसी अहम सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार जीत गए थे। सिर्फ माल सीट ही तृणमूल के पास बची थी। अलीपुरद्वार लोकसभा सीट से भी भाजपा के मनोज तिग्गा सांसद चुने गए थे।
हालांकि बाद में हुए मदारीहाट उपचुनाव में तृणमूल ने वापसी की और वह सीट जीत ली। इसके अलावा लोकसभा चुनाव में भी तराई-डुवार्स में तृणमूल का वोट प्रतिशत कुछ बढ़ा था। लेकिन इतने से तृणमूल संतुष्ट नहीं है। पार्टी को पता है कि उत्तर बंगाल की इन आदिवासी सीटों पर अगर पकड़ मज़बूत नहीं की तो विधानसभा में सीटों का नुकसान हो सकता है।
तृणमूल का आदिवासी दांव ,कौन हैं उम्मीदवार?

इस बार तृणमूल ने जो रणनीति अपनाई है वह बेहद साफ और सीधी है। पार्टी ने आदिवासी बहुल सीटों पर बाहरी उम्मीदवार उतारने की बजाय उन्हीं इलाकों के जाने-माने और प्रभावशाली आदिवासी चेहरों को मैदान में उतारा है। इससे न सिर्फ समुदाय के बीच भरोसा बनता है बल्कि यह संदेश भी जाता है कि पार्टी उनकी आवाज़ को सच में समझती है।
जलपाईगुड़ी जिले की माल सीट से तृणमूल ने जनजाति कल्याण मंत्री बुलूचिक बड़ाइक को टिकट दिया है। यह एक बड़ा और भरोसेमंद नाम है जो आदिवासी समुदाय में खासी पहचान रखता है। इसी जिले की नागराकाटा सीट से पंचायत समिति सभापति और कद्दावर आदिवासी नेता संजय कुजूर को उतारा गया है।
अलीपुरद्वार जिले में तृणमूल ने तीन सीटों पर आदिवासी उम्मीदवार उतारे हैं। मदारीहाट से जयप्रकाश टोप्पो, कुमारग्राम से राजीव तिर्की और कालचीनी से चाय बागान मजदूरों के जाने-माने नेता वीरेंद्र बाड़ा को चुनावी मैदान में भेजा गया है। कालचीनी में चाय बागान मजदूरों की आबादी सबसे ज़्यादा है और वीरेंद्र बाड़ा उनके बीच काफी लोकप्रिय माने जाते हैं।
दार्जिलिंग जिले की फांसीदेवा सीट से इस बार एक महिला आदिवासी चेहरे को आगे किया गया है। फांसीदेवा पंचायत समिति की सभापति रीना टोप्पो एक्का को यहाँ से टिकट मिला है। महिला उम्मीदवार का चुनाव इस बात का भी संकेत है कि तृणमूल आदिवासी महिला वोटरों को भी सीधे अपनी तरफ खींचना चाहती है।
भाजपा के लिए क्यों है यह इलाका खास?
उत्तर बंगाल का तराई और डुवार्स इलाका भाजपा के लिए एक मज़बूत किले की तरह रहा है। पार्टी ने यहाँ वर्षों की मेहनत से अपनी जड़ें जमाई हैं और आदिवासी समुदाय के एक बड़े हिस्से का भरोसा जीता है। पिछले चुनाव में जब कोलकाता और दक्षिण बंगाल में भाजपा को झटका लगा तब भी उत्तर बंगाल के इन इलाकों में पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया था।
यही वजह है कि तृणमूल के लिए इन सीटों पर जीत हासिल करना इतना मुश्किल रहा है। भाजपा का संगठन इन इलाकों में काफी मज़बूत है और पार्टी के कार्यकर्ता ज़मीनी स्तर पर सक्रिय हैं। अब देखना यह होगा कि तृणमूल के नए आदिवासी उम्मीदवार इस मज़बूत किले में कितनी सेंध लगा पाते हैं।
आदिवासी समुदाय के असली मुद्दे क्या हैं?
राजनीतिक दलों की रणनीति को समझने के साथ-साथ यह भी समझना ज़रूरी है कि इन इलाकों के आदिवासी मतदाता असल में किन मुद्दों को लेकर सबसे ज़्यादा परेशान हैं। जमीन का अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय स्तर पर रोज़गार ये वो मुद्दे हैं जो यहाँ के लोग बरसों से उठाते आ रहे हैं।
डुवार्स के चाय बागान इलाकों में हालात और भी नाज़ुक हैं। यहाँ काम करने वाले मज़दूरों की रोज़ की मज़दूरी बेहद कम है। वेतन और बोनस का समय पर न मिलना, प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी जैसी सुविधाओं में देरी और कई बागानों में महीनों का वेतन बकाया रहना, ये सब समस्याएं यहाँ के मज़दूरों को लंबे वक्त से परेशान कर रही हैं। न्यूनतम मज़दूरी को लेकर अब तक कोई ठोस फैसला नहीं हो पाया है जिस पर मज़दूर समय-समय पर आंदोलन भी करते रहे हैं।
कौन सी पार्टी इन मुद्दों पर खरी उतरेगी?
यही असली सवाल है जो इस चुनाव में आदिवासी मतदाताओं के मन में है। तृणमूल ने आदिवासी उम्मीदवार उतारकर यह दिखाने की कोशिश की है कि वह उनके दर्द को समझती है। लेकिन मतदाता यह भी देखेंगे कि बीते वर्षों में राज्य सरकार ने उनके लिए वास्तव में क्या किया।
भाजपा की तरफ से भी इन इलाकों में खासा प्रचार हो रहा है। पार्टी केंद्र सरकार की योजनाओं और आदिवासियों के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों को आगे रखकर वोट माँग रही है।
उत्तर बंगाल की इन 16 आरक्षित सीटों पर जो भी पार्टी बेहतर प्रदर्शन करेगी, उसके लिए पूरे बंगाल में सरकार बनाने का रास्ता आसान हो जाएगा। यही वजह है कि दोनों पार्टियाँ इस इलाके पर इतनी मेहनत कर रही हैं। चुनाव नतीजे बताएंगे कि आदिवासी मतदाताओं का भरोसा इस बार किसके साथ है।
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