Ranchi Gas Crisis 2026: झारखंड की राजधानी रांची में इन दिनों छोटे दुकानदारों और ठेले वालों की ज़िंदगी एक नई मुसीबत से जूझ रही है। देशभर में रसोई गैस की किल्लत के बीच रांची में 5 किलो वाला छोटू सिलेंडर मिलना बेहद मुश्किल हो गया है। जो सिलेंडर पहले आसानी से 120 से 140 रुपये किलो में मिल जाता था, अब उसके लिए 320 रुपये किलो तक चुकाने पड़ रहे हैं। यह तीन गुने से भी ज़्यादा का इज़ाफा है। हालात इतने बुरे हो गए हैं कि कुछ दुकानदार प्रशासन के डर से सिलेंडर को बोरे में छिपाकर जलाने पर मजबूर हो गए हैं। यह संकट सिर्फ दुकानदारों तक सीमित नहीं है, इसका असर उन ग्राहकों पर भी पड़ रहा है जो रोज़ाना इन छोटी दुकानों से चाय, नाश्ता और खाना लेते हैं।
अल्बर्ट एक्का चौक, मशहूर ठेले अब संकट में
रांची के सबसे मशहूर और भीड़भाड़ वाले इलाकों में से एक है अल्बर्ट एक्का चौक। यहाँ के ठेले पर छोले-भटूरे, चाउमिन, चिल्ली, जलेबी और न जाने क्या-क्या मिलता है। सुबह से लेकर देर रात तक यहाँ ग्राहकों की भीड़ लगी रहती है। लेकिन अब इन्हीं ठेले वालों के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखती हैं।
दुकानदारों ने बताया कि जब से छोटू सिलेंडर का संकट शुरू हुआ है तब से उनकी मुश्किलें कई गुना बढ़ गई हैं। पहले तो उन्होंने हर जगह से कमर्शियल सिलेंडर ढूँढने की कोशिश की। एजेंसियों के चक्कर लगाए, फोन किए, जान-पहचान वालों से मदद माँगी। लेकिन जब कहीं से कमर्शियल सिलेंडर नहीं मिला तो मजबूरी में उन्हें महँगे दामों पर घरेलू गैस सिलेंडर खरीदकर काम चलाना पड़ रहा है। यह न सिर्फ नियमों के खिलाफ है बल्कि उनकी जेब पर भी भारी पड़ रहा है। लेकिन रोज़ी-रोटी का सवाल है तो मजबूरी में यही करना पड़ रहा है।
अटल वेंडर मार्केट, बोरे में छिपाकर जल रहा सिलेंडर

रांची के कचहरी चौक के पास स्थित अटल वेंडर मार्केट में मोमो, चाट और फास्ट फूड की दुकानें हैं। यहाँ के दुकानदारों की हालत देखकर दिल दहल जाता है। गैस की किल्लत से पहले यहाँ के दुकानदार 14.2 किलो के बड़े सिलेंडर और 5 किलो के छोटू सिलेंडर दोनों का इस्तेमाल करते थे। लेकिन अब दोनों ही मिलना मुश्किल हो गया है।
जो दुकानदार किसी तरह सिलेंडर का इंतज़ाम कर भी पाए हैं, वे उसे खुले में रखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। उन्हें डर है कि प्रशासन की नज़र पड़ी तो कार्रवाई होगी। यही वजह है कि यहाँ कई दुकानदार सिलेंडर को बोरे या कपड़े से ढककर छिपाकर इस्तेमाल कर रहे हैं। यह नज़ारा देखकर साफ पता चलता है कि यह लोग कितनी मजबूरी में अपना काम चला रहे हैं।
इन दुकानदारों ने बताया कि ठेला लगाना अब पहले जैसा आसान नहीं रहा। हर दिन एक नई चुनौती सामने आती है। गैस की व्यवस्था करो, महँगे दाम पर खरीदो, फिर भी डरते-डरते काम करो, यही इनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी बन गई है। एक दुकानदार ने बताया कि अब तो लगता है पेट पालने के लिए जंग लड़नी पड़ रही है।
पुरानी हजारीबाग रोड , कीमतें आसमान पर
रांची की पुरानी हजारीबाग रोड पर भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। यहाँ भी छोटे ठेले वाले इडली, चाट, मोमो और फास्ट फूड बेचते हैं। इनमें से ज़्यादातर लोग रोज़ की मज़दूरी पर निर्भर हैं। अगर एक दिन दुकान नहीं लगी तो उस दिन घर में चूल्हा नहीं जलेगा।
यहाँ के दुकानदारों ने जो आँकड़ा बताया वह चौंका देने वाला है। गैस संकट शुरू होने से पहले यहाँ गैस 120 से 140 रुपये प्रति किलो के हिसाब से मिलती थी। अब उन्हें 320 रुपये प्रति किलो तक देने पड़ रहे हैं। यानी कीमत लगभग ढाई से तीन गुना बढ़ गई है। इससे उनकी लागत बेतहाशा बढ़ गई है लेकिन वे ग्राहकों को उतना महँगा खाना नहीं बेच सकते क्योंकि उनके ग्राहक भी उसी तबके के लोग हैं जिनके पास ज़्यादा पैसे नहीं हैं। ऐसे में या तो वे नुकसान उठाकर काम जारी रखें या फिर दुकान बंद करें। दोनों ही विकल्प बेहद मुश्किल हैं।
दफ्तरों और कर्मचारियों पर भी असर
यह संकट सिर्फ ठेले वालों और छोटे दुकानदारों तक सीमित नहीं है। रांची के दफ्तरों और औद्योगिक इकाइयों के पास काम करने वाले कर्मचारी भी इससे परेशान हैं। लंच ब्रेक में जब वे चाय या हल्के नाश्ते के लिए पास की दुकान पर जाते हैं तो वहाँ या तो दुकान बंद मिलती है या फिर खाने-पीने की चीज़ें कम हो गई हैं। जो लोग हर रोज़ इन्हीं छोटी दुकानों पर निर्भर रहते हैं उन्हें अब या तो ज़्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं या दूर जाना पड़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय संकट का स्थानीय असर
रांची में यह गैस संकट एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट का हिस्सा है। मध्य-पूर्व में जारी तनाव और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बनी अनिश्चितता ने पूरी दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है। इसका असर भारत में भी पड़ा है और जब बड़े शहरों में आपूर्ति बाधित होती है तो छोटे शहर और वहाँ के छोटे लोग सबसे पहले पीड़ित होते हैं।
रांची के ये ठेले वाले और छोटे दुकानदार उस तबके का हिस्सा हैं जिनके पास कोई बचत नहीं है, कोई बड़ा सहारा नहीं है। जब गैस नहीं मिलती तो वे न तो बड़े भंडार से खरीद सकते हैं और न ही किसी और ईंधन पर आसानी से शिफ्ट हो सकते हैं।
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