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Bihar Politics 2026: प्रशांत किशोर बने सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी चुनौती, एक विधायक के दम पर NDA में बढ़ी बेचैनी

15 अक्टूबर 2026
Bihar Politics 2026
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Bihar Politics 2026: बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर अब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। भाजपा के पहले मुख्यमंत्री के रूप में पद संभालने के छह महीने के भीतर ही सम्राट चौधरी को यह परीक्षा मुख्य विपक्षी दल आरजेडी या नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव से नहीं, बल्कि जन सुराज पार्टी के संस्थापक से मिल रही है। बांकीपुर उपचुनाव में मिली जीत के बाद प्रशांत किशोर को विधानसभा में आवाज उठाने का मंच मिल गया है। उधर, विधान परिषद चुनाव से पहले जेडीयू और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के भीतर उठे असंतोष ने एनडीए की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

Bihar Politics 2026: बांकीपुर की जीत से बढ़ा सम्राट चौधरी पर दबाव

नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक दौर के बाद मुख्यमंत्री बने सम्राट चौधरी के सामने दोहरी जिम्मेदारी है। उन्हें अपनी अलग पहचान बनानी है और उस गठबंधन को भी संभालना है, जो लंबे समय तक नीतीश कुमार के नेतृत्व में चलता रहा। ऐसे समय में प्रशांत किशोर की सक्रियता उनके लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है।

जन सुराज पार्टी 2025 के विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। इसके बावजूद प्रशांत किशोर लगातार मुख्यमंत्री की शैक्षणिक योग्यता, आपराधिक रिकॉर्ड और पद के लिए उपयुक्तता पर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से भी कई बार सम्राट चौधरी को हटाने की मांग की है।

इस चुनौती को गंभीर बनाने वाली घटना बांकीपुर उपचुनाव रही। पटना की यह शहरी सीट करीब तीन दशक से भाजपा के कब्जे में थी और पार्टी का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई थी।

19,324 वोटों से जीते पीके, भाजपा के लिए बड़ा झटका

उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 19,324 वोटों के अंतर से हराया। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहला बड़ा चुनावी इम्तिहान था। नतीजे ने विपक्ष को उनके जमीनी राजनीतिक प्रभाव पर सवाल उठाने का मौका दे दिया।

जीत के बाद प्रशांत किशोर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की कि बिहार के लिए “काबिल और चरित्रवान” मुख्यमंत्री चुना जाए। उन्होंने इस उपचुनाव को एक तरह से जनमत संग्रह की तरह पेश किया। भाजपा ने इस हार को अलग-थलग चुनावी झटका बताया है।

हालांकि पार्टी की सफाई अपनी जगह है, लेकिन इस जीत से प्रशांत किशोर को विधानसभा के भीतर अपनी बात रखने का नया अवसर मिल गया है। एक विधायक वाली पार्टी के लिए यह मंच छोटा नहीं माना जा सकता।

एनडीए की अंदरूनी खींचतान का फायदा उठा रहे प्रशांत किशोर

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रशांत किशोर की रणनीति अब केवल सम्राट चौधरी पर निजी हमलों तक सीमित नहीं है। वह गठबंधन के भीतर पनप रहे मतभेदों को भी मुद्दा बना रहे हैं। एनडीए में भाजपा और जेडीयू के अलावा चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा शामिल हैं।

गठबंधन में असहमति का ताजा उदाहरण बिहार विधान परिषद के चुनाव हैं। 23 अक्टूबर को स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से उच्च सदन के आठ सदस्यों का चुनाव होना है। इसी चुनाव में जन सुराज के उम्मीदवारों को मिल रहे समर्थन ने सहयोगी दलों के तालमेल पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मोकामा से जेडीयू विधायक अनंत सिंह ने पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ जन सुराज प्रत्याशी अनुज कुमार सिंह का खुलकर समर्थन किया है। दोनों नेताओं के बीच पुरानी व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता है, जिसकी शुरुआत कम से कम 2015 के विधानसभा चुनाव से मानी जाती है।

अनंत सिंह का कहना है कि नीरज कुमार ने कई मौकों पर उनका विरोध किया था और अब वह उसका जवाब दे रहे हैं। उन्होंने यह भी साफ किया कि उनका विरोध नीरज कुमार से है, नीतीश कुमार या जेडीयू से नहीं। इसके बावजूद सत्तारूढ़ दल के विधायक का विपक्षी उम्मीदवार के लिए प्रचार करना एनडीए को असहज कर रहा है।

सम्राट चौधरी की बैठक भी नहीं सुलझा सकी विवाद

जेडीयू नेताओं ने अनंत सिंह को मनाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी पिछले सप्ताह पटना स्थित अपने आवास पर एनडीए विधायकों की बैठक बुलाई। उन्होंने गठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ प्रचार न करने की चेतावनी दी, फिर भी मतभेद दूर नहीं हुए।

प्रशांत किशोर ने इस विवाद को और हवा दी। उन्होंने नीतीश कुमार को चुनौती दी कि वह सार्वजनिक रूप से मतदाताओं से नीरज कुमार के समर्थन की अपील करें। साथ ही कहा कि अगर नीतीश कुमार कैमरे के सामने ऐसा करते हैं, तो जन सुराज अपना उम्मीदवार वापस ले लेगी।

इस घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री की चुनौती बढ़ा दी है। अब उनके लिए केवल विपक्ष के आरोपों का जवाब देना काफी नहीं है। सहयोगी दलों के बीच तालमेल बनाए रखना भी उतना ही अहम हो गया है।

उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी में भी बगावत

एनडीए की परेशानी केवल जेडीयू तक सीमित नहीं है। उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा में भी नेतृत्व को लेकर बगावत सामने आई है। पार्टी के चार में से तीन विधायक खुले तौर पर नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं।

आलोक सिंह, रामेश्वर महतो और माधव आनंद ने सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जेडीयू उम्मीदवार पुष्कर आनंद के खिलाफ निर्दलीय उम्मीदवार राम पुकार सिन्हा का समर्थन किया। विवाद बढ़ने पर राम पुकार सिन्हा को पार्टी से छह साल के लिए निलंबित कर दिया गया।

बागी विधायकों ने कुशवाहा पर परिवारवाद को बढ़ावा देने और कार्यकर्ताओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। उन्होंने उदाहरण के तौर पर कुशवाहा की पत्नी के विधायक होने और बेटे दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर होने का जिक्र किया। रामेश्वर महतो ने चेतावनी दी कि कार्यकर्ताओं की चिंताएं नजरअंदाज हुईं तो आगे और कदम उठाए जा सकते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि तीनों विधायकों ने यह भी कहा कि वे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का समर्थन करते हैं। फिर भी इन मतभेदों ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। प्रशांत किशोर को भी इन घटनाओं के बहाने सत्तारूढ़ गठबंधन के नेतृत्व पर सवाल उठाने का मौका मिल रहा है।

शिक्षा, रोजगार और पलायन पर घेराबंदी

प्रशांत किशोर की रणनीति में मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत छवि पर सवालों के साथ शासन और नीतियों की आलोचना भी शामिल है। वह शैक्षणिक योग्यता और आपराधिक रिकॉर्ड का मुद्दा उठाते रहे हैं। साथ ही यह भी पूछते हैं कि क्या सम्राट चौधरी बिहार का नेतृत्व करने के लिए उपयुक्त हैं।

जन सुराज ने अपने अभियान में शिक्षा, रोजगार और पलायन को प्रमुखता दी है। पार्टी ने वादा किया है कि जिन विधानसभा क्षेत्रों में उसके उम्मीदवार जीतेंगे, वहां 10,000 शिक्षित बेरोजगार युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार दिलाया जाएगा।

बिहार से बड़े पैमाने पर होने वाले पलायन के बीच रोजगार का मुद्दा किशोर को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने का अवसर देता है। इससे चुनौती व्यक्तिगत आरोपों से आगे बढ़कर सरकार के कामकाज और उसके नतीजों तक पहुंच जाती है।

दूसरी ओर, सम्राट चौधरी सरकार ने शिक्षा के विस्तार के लिए नए कॉलेज और मॉडल स्कूल खोलने की योजनाएं सामने रखी हैं। निवेश आकर्षित करने, बुनियादी ढांचे के विकास और जनता की शिकायतों के निपटारे की दिशा में भी पहल की बात कही गई है। इन योजनाओं का राजनीतिक असर इस पर निर्भर करेगा कि इन्हें जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है।

Bihar Politics 2026: एक विधायक की ताकत से आगे नेतृत्व की परीक्षा

फिलहाल प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी सरकार के इर्द-गिर्द अपनी मौजूदगी लगातार बनाए रखी है। बांकीपुर की जीत ने उन्हें विधानसभा में अपनी बात रखने का अवसर दिया है। एनडीए के सहयोगी दलों के मतभेद उनके हमलों को और धार दे रहे हैं।

सम्राट चौधरी के लिए असली कसौटी केवल आरोपों का जवाब देना नहीं है। उन्हें यह साबित करना होगा कि भाजपा के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर वह गठबंधन को एकजुट रख सकते हैं और सरकार के कामकाज से अपनी नेतृत्व क्षमता स्थापित कर सकते हैं।

जन सुराज के पास विधायी ताकत अभी सीमित है, लेकिन बांकीपुर की जीत और एनडीए की अंदरूनी खींचतान ने प्रशांत किशोर को अपनी चुनौती मजबूत करने का मौका दिया है। 23 अक्टूबर के विधान परिषद चुनाव इस सियासी रस्साकशी की अगली बड़ी परीक्षा होंगे। अब देखना यह है कि किशोर इस बढ़त को कितना आगे ले जा पाते हैं और सम्राट चौधरी गठबंधन की दरारें कैसे भरते हैं।

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Author: Sanjna Gupta

Sanjana Gupta Hindi Content Writer | New Media Kiran Sanjana Gupta is a Hindi Content Writer at New Media Kiran, creating accurate, engaging, and reader-friendly news and web content for digital platforms. She specializes in well-researched Hindi articles that keep audiences informed and interested.

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कवरेज: Sanjna Gupta, News Media Kiran

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