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Bihar Politics: बिहार कांग्रेस में गहराता संकट, विधायकों के असहयोग से दरार, दो गुटों में बंटी पार्टी, केंद्रीय नेतृत्व का ध्यान बंगाल-असम पर, क्या बिहार में और सिमट जाएगी कांग्रेस?

Bihar Politics: बिहार की राजनीति में एक तरफ NDA की नई सरकार के गठन की तैयारियां चल रही हैं तो दूसरी तरफ विपक्षी दल कांग्रेस की स्थिति दिन-ब-दिन बेहद कमजोर और चिंताजनक होती जा रही है। 2025 बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस अभी तक उससे उबर नहीं पाई है। इसी बीच हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस विधायकों के कथित असहयोग ने पार्टी की आंतरिक कमजोरियों को एक बार फिर बेनकाब कर दिया है। पार्टी इस समय दो स्पष्ट गुटों में बंटी हुई है।

एक गुट प्रदेश नेतृत्व के समर्थन में है तो दूसरा गुट खुलकर विरोध कर रहा है और नेतृत्व परिवर्तन की मांग को लेकर सक्रिय हो गया है। सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का पूरा ध्यान इस समय पश्चिम बंगाल और असम के चुनावों पर केंद्रित है जिससे बिहार कांग्रेस पूरी तरह उपेक्षित महसूस कर रही है।

राज्यसभा चुनाव में विधायकों के असहयोग ने खोली पोल

Bihar Politics
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बिहार कांग्रेस का सबसे हालिया और बड़ा संकट राज्यसभा चुनाव के दौरान सामने आया। सूत्रों के अनुसार राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के कुछ विधायक अनुपस्थित रहे या उन्होंने पार्टी लाइन के अनुसार मतदान नहीं किया। इस असहयोग ने 2025 विधानसभा चुनाव की करारी हार के बाद पार्टी में जो दरारें पड़ी थीं उन्हें और गहरा कर दिया।

यह घटना इसलिए और भी गंभीर है क्योंकि इससे पार्टी के अनुशासन और एकजुटता पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। जब पार्टी के ही विधायक चुनाव में असहयोग करें तो यह संगठन की गहरी कमजोरी को दर्शाता है।

दो गुटों में बंटी बिहार कांग्रेस

बिहार कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या इस समय पार्टी के भीतर चल रहा गहरा गुटवाद है। पार्टी दो स्पष्ट खेमों में बंट गई है।

पहला गुट प्रदेश नेतृत्व यानी प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी के समर्थन में खड़ा है और उनके कार्यकाल को सही ठहरा रहा है।

दूसरा गुट खुलकर विरोध में उतर आया है। यह विरोधी खेमा नेतृत्व परिवर्तन की मांग को लेकर सक्रिय हो गया है। इस गुट के नेता प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी को हटाने की मांग पार्टी हाईकमान तक पहुंचाने की कोशिशों में जुटे हैं। इतना ही नहीं पार्टी में 43 नेताओं को नोटिस थमाए जा चुके हैं और कुछ नेताओं को 6 साल के लिए निष्कासित भी किया गया है। राज्य में कांग्रेस बचाओ अभियान भी चलाया जा रहा है।

केंद्रीय नेतृत्व की उपेक्षा से बढ़ा संकट

बिहार कांग्रेस के संकट को और गहरा करने में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की उदासीनता भी बड़ी भूमिका निभा रही है। कांग्रेस हाईकमान का पूरा ध्यान इस समय पश्चिम बंगाल और असम के विधानसभा चुनावों पर केंद्रित है जो आगामी महीनों में होने हैं।

इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की बड़ी सियासी महत्वाकांक्षाएं हैं। बंगाल में TMC के खिलाफ और असम में BJP के खिलाफ पार्टी अपना प्रदर्शन बेहतर करना चाहती है। ऐसे में बिहार को प्राथमिकता सूची में नीचे रखा गया है।

राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकता न मिलने से बिहार के असंतुष्ट नेताओं को अपनी आवाज बुलंद करने का मौका मिल रहा है। जब हाईकमान का ध्यान नहीं होता तो गुटबाजी और विद्रोह की आवाजें और तेज हो जाती हैं।

संगठनात्मक गतिविधियां ठप, कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा

बिहार कांग्रेस की जमीनी स्थिति और भी चिंताजनक है। संगठनात्मक गतिविधियां लगभग ठप हैं। जिला और प्रखंड स्तर पर पार्टी की बैठकें नहीं हो रहीं। कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा हुआ है और वे दिशाहीन महसूस कर रहे हैं।

विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कार्यकर्ताओं में जो निराशा आई थी वह अभी तक दूर नहीं हुई है। गुटबाजी के कारण कार्यकर्ता यह समझ नहीं पा रहे कि किस नेता के साथ जाएं। इससे जमीनी स्तर पर पार्टी और कमजोर हो रही है।

बिहार में कांग्रेस का राजनीतिक इतिहास और वर्तमान हालात

कभी बिहार में सत्ता पर काबिज रहने वाली कांग्रेस आज यहां लगभग हाशिए पर आ गई है। 1990 के बाद से बिहार में कांग्रेस का जनाधार लगातार सिकुड़ता जा रहा है। जनता दल की राजनीति, मंडल आंदोलन और फिर लालू प्रसाद के उदय ने कांग्रेस की जमीन छीन ली।

2005 में नीतीश कुमार के उदय के बाद बिहार में राजनीति के समीकरण पूरी तरह बदल गए। कांग्रेस को न तो सवर्ण वोट मिले न ओबीसी और न ही दलित वोट का बड़ा हिस्सा। पार्टी अल्पसंख्यक वोटों पर निर्भर हो गई लेकिन वहां भी RJD और JDU से कड़ी प्रतिस्पर्धा है।

क्या है समाधान और आगे की राह?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बिहार कांग्रेस के सामने कई गंभीर चुनौतियां हैं। इन्हें समझकर ही पार्टी आगे बढ़ सकती है।

सबसे पहले केंद्रीय नेतृत्व को बिहार पर ध्यान देना होगा। यदि हाईकमान बिहार को प्राथमिकता नहीं देगा तो प्रदेश इकाई अकेले संकट से नहीं निकल सकती।

दूसरा पार्टी को गुटबाजी खत्म करनी होगी। आंतरिक मतभेद सुलझाए बिना संगठन मजबूत नहीं हो सकता। एक मजबूत और सर्वस्वीकार्य प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति जरूरी है।

तीसरा पार्टी को जमीनी स्तर पर काम बढ़ाना होगा। केवल ऊपरी स्तर की राजनीति से जनाधार नहीं बनता। जिला और प्रखंड स्तर पर पार्टी को सक्रिय करना होगा।

चौथा युवा और नए चेहरों को मौका देना होगा। पुराने चेहरों से अब जनता में उत्साह नहीं है। नई पीढ़ी के नेताओं को आगे लाना जरूरी है।

Bihar Politics: INDIA गठबंधन में बिहार कांग्रेस की भूमिका

INDIA गठबंधन में कांग्रेस की भूमिका राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण है लेकिन बिहार में यह गठबंधन भी मजबूत नहीं दिख रहा। RJD के साथ सीट शेयरिंग पर विवाद और छोटे दलों के साथ समन्वय की कमी ने बिहार में INDIA गठबंधन को कमजोर किया है।

यदि कांग्रेस बिहार में अपनी स्थिति नहीं सुधारती तो INDIA गठबंधन की ताकत भी कमजोर होगी।

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Sanjna Gupta
Author: Sanjna Gupta

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