Top 5 This Week

Related Posts

एपिक्टेटस: वो गुलाम दार्शनिक जिसने सिखाया – सुख तुम्हारे कंट्रोल में है

वाराणसी: तुम सोचते हो कि दुख बाहर की चीज़ों से आता है – लोग, हालात, किस्मत। लेकिन 2000 साल पहले एक गुलाम दार्शनिक एपिक्टेटस ने सिखाया कि दुख बाहर नहीं, हमारे विचारों में छुपा है। वो खुद गुलाम थे, पैर टूटा हुआ था, लेकिन मन से सबसे आज़ाद इंसान थे। उनकी सीखें आज भी लाखों लोगों को सुकून दे रही हैं – क्योंकि वो बताती हैं कि सच्ची आज़ादी बाहर नहीं, भीतर होती है। “तुम्हें कोई दुखी नहीं कर सकता बिना तुम्हारी इजाज़त के।

वो गुलाम जिसने रोमन साम्राज्य को सोचना सिखाया

एपिक्टेटस गुलाम थे, उनके मालिक ने पैर तोड़ दिया। लेकिन वो कहते थे – “मेरा शरीर गुलाम है, मेरा मन आज़ाद है।” वो पढ़ाते थे – “तुम्हारे कंट्रोल में सिर्फ़ तुम्हारे विचार और फैसले हैं। बाकी सब बाहर की चीज़ें।”

एपिक्टेटस का सबसे बड़ा सूत्र – दो चीज़ें अलग करो

एपिक्टेटस कहते थे – ज़िंदगी में दो तरह की चीज़ें हैं –

  1. जो तुम्हारे कंट्रोल में हैं (विचार, फैसले)
  2. जो नहीं हैं (दूसरों की राय, सेहत, पैसा) “जो कंट्रोल में नहीं, उसके लिए चिंता मत करो। जो कंट्रोल में है, उसे सही करो।”

मनोविज्ञान भी आज यही कहता है – तुम्हारा नज़रिया सब बदल देता है

आज का CBT (कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी) एपिक्टेटस से ही निकला है। तुम्हारा दिमाग घटना को नहीं, उसकी व्याख्या को दुख देता है। “लोग तुम्हें दुखी नहीं करते, तुम्हारा उन पर विचार करता है।”

एपिक्टेटस का रोज़ का तरीका – सुबह उठकर क्या सोचो

वो कहते थे – सुबह उठकर खुद से बोलो – “आज लोग मुझे तंग करेंगे, धोखा देंगे, गलत बोलेंगे। मैं तैयार हूँ। मैं अपना मन नहीं खराब करूँगा।” “तैयारी वो है जो दुख को आने से पहले रोक देती है।”

दूसरों की राय का बोझ क्यों ढोते हो

एपिक्टेटस पूछते थे – “लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं, वो तुम्हारे कंट्रोल में है?” नहीं। तो फिर उसकी चिंता क्यों? “दूसरों की राय तुम्हारा बोझ नहीं, उनका बोझ है।”

एपिक्टेटस की वो बात जो आज भी सबसे ज़्यादा काम आती है

“जो हो रहा है, उसे बदल नहीं सकते तो उसे स्वीकार कर लो। स्वीकार करने से दुख खत्म हो जाता है।” ये आज की एक्सेप्टेंस थेरेपी का आधार है।

डॉ. सचिन चतुर्वेदी, एक न्यूरोसाइंटिस्ट, हमें सिखाते हैं कि न्यूरोसाइंस को सिर्फ़ लैब तक सीमित न रखें, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपनाएँ – जैसे सुबह उठकर 10 मिनट गहरी साँसें लेकर दिमाग को शांत करना, जो स्ट्रेस हार्मोन को कम करता है और दिन भर फोकस बढ़ाता है। वो बताते हैं कि जब हम किसी काम में पूरी तरह डूब जाते हैं (फ्लो स्टेट), तो ब्रेन में डोपामाइन रिलीज़ होता है जो खुशी देता है, इसलिए फोन स्क्रॉल करने की बजाय एक काम पर ध्यान लगाएँ। “न्यूरोसाइंस वो नहीं जो किताबों में हो, वो वो है जो तुम्हारी रोज़ की ज़िंदगी को बेहतर बनाए।” उनकी सीख सादी है – छोटे बदलाव जैसे पानी ज़्यादा पीना (दिमाग को हाइड्रेट रखता है) या शाम को डायरी लिखना (इमोशंस प्रोसेस करता है), से हमारा दिमाग मज़बूत और खुश रहता है। “तुम्हारा दिमाग तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त है – उसे समझो, वो तुम्हें समझाएगा।”

डॉ. चतुर्वेदी की बातें सुनकर लगता है जैसे कोई अपना भाई समझा रहा हो – न्यूरोसाइंस दूर की साइंस नहीं, हमारी रोज़ की ज़िंदगी का हिस्सा है। तुम भी आज ट्राई करो। एक छोटा बदलाव। और देखो फर्क।

आज रात सिर्फ़ एक छोटा सा प्रयोग कर लो –एक कागज़ पर दो कॉलम बनाओ –

  1. जो मेरे कंट्रोल में है
  2. जो नहीं है फिर दूसरा कॉलम फाड़ दो। और पहले पर फोकस करो। “जब तुम सिर्फ़ अपने कंट्रोल पर ध्यान देते हो, तो ज़िंदगी आसान हो जाती है।”

आखिरी बात – 

एपिक्टेटस गुलाम थे, लेकिन सबसे आज़ाद इंसान थे। उन्होंने कहा – “तुम्हें कोई गुलाम नहीं बना सकता बिना तुम्हारी इजाज़त के।”

PRAGATI DIXIT
Author: PRAGATI DIXIT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles